साधनाजी,उपासनाजी, उर्फ…

बाबाओँ का हल्ला है। बल्कि दिल्ली के बाबा भीमानंद का विकट कालगर्ली रैकेट देखकर यह नहीं समझ आ रहा है कि अब बाबाजी का कौन सा मुहल्ला है। सारे मुहल्ले ही उनके नजर आ रहे हैं। जिसे बाबा समझो वह काल गर्ल का एजेंट निकलता है। जिसे काल गर्ल का एजेंट समझो, वह विधायक निकलता है। जिसे विधायक समझो वह हथियारों का दलाल निकलता है। जिसे सिर्फ हथियारों का दलाल समझो, वह कालगर्ल्स का दलाल निकलता है। और जिसे कालगर्ल्स का दलाल समझो वह बाबा निकलता है, साईंराम कहता हुए मिलता है। एक नहीं दो बार।
बेटा बाबा कई प्रकार होते हैं-कक्षा में मैं बाबाओं के बारे में समझा रहा था।
जी मुझे पता है कि आजकल तीन तरह के बाबाओं का हल्ला है। कालगर्ल्स वाले ढोंगी बाबा, बहुत शादी करने वाले फर्जी बाबा और साऊथ में एक्ट्रेस के साथ सत्संग करने वाले बाबा। बाबागिरी का काम बहुत मुश्किल है। या तो कालगर्ल्स का कारोबार चलाये बंदा या फिर एक्ट्रेस के साथ ऱैट-पैट करना पड़ता है। साधना का मार्ग अत्यधिक ही मुश्किल है, यह बात ऐसे ही नहीं कही जाती-एक छात्र ने बताया।
नहीं बेटे, साधना की बात समझने की कोशिश करो। ढोंगी बाबा के केस में साधना और उपासना कालगर्ल्स के नाम हैं। मंत्र और तंत्र उन दलालों के नाम हैं, जो बाबा की कालगर्ल्स के लिए ग्राहक लाते थे। बाबा हर डील से पहले दो बार भगवान का नाम लेते थे। ये उनका कोड वर्ड था-करने की कोशिश की।
हां आपने बताया था कि हर महत्वपूर्ण काम से पहले दो बार भगवान का नाम लेना चाहिए, बाबाजी भी यही करते थे। बाबाजी आपके स्टूडेंट रहे थे क्या-दूसरा छात्र पूछ रहा है।
नहीं, कालगर्ल्स का कारोबार करने वाले मेरे छात्र नहीं रहे हैं-मैंने डांटते हुए कहा।
जी वही मेरी समझ में आता है। कालगर्ल्स का कारोबार करने वालों के तो अपने स्कूल, कालेज अस्पताल होते हैं। इस ढोंगी बाबा का भी अस्पताल बन रहा था। कालगर्ल्स कारोबार वाले तो पढ़ाने की हैसियत रखते हैं, वो कहीं आपसे पढ़ने के लिए क्यों आयेंगे-एक और स्टूडेंट ने बहुत समझदारीपूर्ण बात कही।
नहीं बेटे तुम बात को समझ नहीं पा रहे हो। बाबा ढोंगी था, बहुत बदमाश था-मैंने समझाने की कोशिश की।
सरजी कोई सीधी सच्चा बंदा कहां पहुंच पाता है बाबा के लेवल पर। मेरे चाचाजी बिलकुल सीधे सच्चे मास्टर हैं, चाची तक नहीं पूछतीं उन्हें। इधर बाबा के सत्संग में छह सौ कालगर्ल्स रहती थीं, उनकी बात सुनती थीं। बंदा हैसियत बनाये तो ऐसी-एक छात्र अपने चाचा की दुर्दशा की बात कह रहा है।
बेटा तुम बात को पूरे तौर पर समझने की कोशिश करो। जरुरी नहीं है कि कालगर्ल्स का कारोबार करने वाला हर बंदा बाबा के लेवल पर पहुंच जाये। कई तो विधायक या पार्षद के लेवल पर पहुंच कर रुक जाते हैं। इतना आगे जाने वाले कम ही होते हैं-मैंने अपनी तरफ से एक्सप्लेन करने की कोशिश की।
सर पहले क्लियर कीजिये कि आप बाबाओँ के बारे में बात कर रहे हैं या चोर उठाइगीरों के बारे में। बीच में आप विधायक, पार्षदों की बात भी छेड़ देते हैं-एक छात्र आबजेक्शन कर रहा है।
बेटा ठगों से बात शुरु करो, तो बाबाओँ तक पहुंच जाती है। बाबाओं की बात शुरु करो, तो कालगर्ल्स तक पहुंच जाती है। बड़े मिक्स मिक्स से मामले हैं इनके। तुम समझने की कोशिश करो ना-मैंने आगे समझाने की कोशिश की।
सर आप समझा ही कहां पा रहे हैं-छात्र नाराज होकर कह रहा है।
वैसे बताइये, वो गलत कह रहा है क्या।

बगैर उनके ज्यों नाली बगैर कूड़ा

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हाय हाय क्या चर्चा निकल पड़ी है कि दिल्ली से आटो वाले हटाये जायेंगे।

दिल्ली को अगर आटो वालों से अलग कर के देखें, तो दिल्ली बहुत ही चिरकुट टाइप का शहर है। यह शहर कितना चंट और बदमाश है, यह पता दिल्ली में आते ही कैसे लगता है, आटो वालों से डील करके। एक मेहमान ने आटो वाले के हाथों कटने के बाद कमेंट किया था, इस शहर के आटो वाले जब ये हैं, नेता जाने क्या होंगे। जब रात ही इतनी मतवाली, तो सुबह का आलम क्या होगा टाइप कमेंट के पीछे आटो वालों की तारीफ थी या कुछ और, उन्होने साफ नहीं किया।

आटो वालों के बगैर दिल्ली कुछ यूं है ज्यों मोर अपने पंखों के बिना, ज्यों नाली कूड़े के बगैर हो और सिगरेट तंबाकू के बगैर हो। ज्यों इंसपेक्टर तोंद के बगैर हो, और कवि अपनी कविता के बगैर हो। राखी सावंत नंगई के बगैर हों और मायावतीजी अपनी मालाओं के बगैर हों। मुशर्रफ और बुश एकदम सच बोल रहे हों, और क्लिंटन अपने को एकैदम चरित्रवान बता रहे हों।

दिल्ली आटो वालों के बगैर कुछ यूं ही टाइप लगती है, जैसे नादिरशाह बगैर लूटपाट के चुपैचाप निकल रहा हो। बल्कि इस खाकसार का मानना है कि ये आटो वाले अगर पहले दिल्ली में होते, तो दिल्ली कई बार बरबाद होने से बच जाती। नादिरशाह आकर दिल्ली वालों से लूटपाट करते, तो उन्हे जवाब मिलता कि आटो वाले तो पहले ही लूट कर ले गये हैं, अब लुटने को बचा क्या है, सारी। पानीपत की तीसरी लड़ाई में पानीपत में आटो वालों को भेज देते, तो नादिरशाह के सैनिक आटो में चलने की रेट सुनकर ही बेहोश हो जाते। नादिरशाह के तमाम सैनिक नादिरशाह से कह रहे होते-महाराज चलो वापस लौट लो, कोई फायदा नहीं है। दिल्ली में लाल किले से नेहरु प्लेस जाने का वह आटो वाला एक हजार अशर्फी मांग रहा है। इतनी रकम तो अफगानिस्तान से दिल्ली आने में खर्च ना हुई, जितनी लाल किले से नेहरु प्लेस जाने में खर्च हो जायेगी। क्या करेंगे, इत्ती लूटपाट मचाकर, हम तो उतनी रकम भी ना बचा पायेंगे, जितने में दरियागंज से कुतुबमीनार वाया आटो जाने का इंतजाम हो जाये।

आटोवाले भारत के भूगोल में पहले हुए होते, तो भारत का इतिहास कुछ और होता।

मैं आटो वालों को दिल्ली से हटाये जाने के सख्त खिलाफ हूं। आटो वालों के साथ डील करके चरित्र में कई गुणों का विकास होता है। पेशेंस क्या होती है, धैर्य क्या होता है, यह समझ में आ जाता है, आटो वालों से बात करके।

मानिये, आप आईटीओ से कनाट प्लेस जाने के लिए आटो वाले से बात कर रहे हैं, तो बातचीत इस प्रकार हो सकती है-

ऐ भईया कनाट प्लेस चल रहे हैं क्या।

ना हम तो नेहरु प्लेस जायेंगे।

जहां आपको जाना होता है, आटो वाले को नहीं जाना होता। आप ही उस जगह चले जाइये, जहां आटो वाला जा रहा है। यह गुण जो विकसित करने लगता है, उसमें अपार धैर्य का भाव विकसित अपने आप होने लगता है।

आप नेहरु प्लेस जाने के लिए तैयार हो जायें, तो आटो वाला बतायेंगे कि यहां से नेहरु प्लेस आठ सौ रुपये लगेंगे।

भईया ये मीटर काहे के लिए है।

इसके जवाब में आटो वाला हंसने लगता है कि चिरकुट इत्ता तक ना जानता यह आधुनिक कला का एक नमूना है, इसका सिर्फ इतना इस्तेमाल है कि इसे देखा जाये, यह क्या है और क्यों है, यह ना पूछा जाये। आटो वालों से लगातार डील करके हर बंदा अपने अंदर एक सौंदर्य दृष्टि, कला दृष्टि विकसित कर सकता है।

जी आपसे आईटीओ से नेहरु प्लेस जाने के आठ सौ लिये, आप तो सस्ते में निबट गये। हमसे तो डेढ़ हजार रुपये रखा लिये थे।

आपकी जेब से सिर्फ आठ सौ कटे हैं, औरों के इससे बहुत ज्यादा कटे हैं, यह भाव कित्ती तसल्ली देता है और बंदा खुद को बहुत स्मार्ट टाइप मानने लगता है। अब बताइये, जिसके आगे आप स्मार्ट फील करने लगें, सौंदर्य दृष्टि विकसित करने लगें, उसे शहर से बाहर निकाला जाये। ना भईया ना, आटो वालों संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।

संडे यूं ही-तब बजट किसलिए होता है

तब बजट किस लिए होता है आलोक पुराणिक कुछ दिनों पहले शरद पवारजी, केंद्रीय कृषि मंत्री जो कहते थे, उसका आशय यह होता था कि महंगाई में हमारा हाथ नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कारक जिम्मेदार हैं। पेट्रोलियम मिनिस्टर बताते थे कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा हो रहा है। इसलिए हमें भी महंगाई करनी पड़ेगी। हाल के बजट से पहले सबसे बड़ी समस्या रही है महंगाई की। हाल में पेश आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2010-11 में नौ प्रतिशत करीब की बढ़ोत्तरी होगी। मंदी से उबरने में लगी अर्थव्यवस्था की स्थिति पर उत्साहित आर्थिक सर्वैक्षण हालांकि यह चिंता व्यक्त करता है कि खाने पीने की चीजों की महंगाई दूसरे आइटमों तक भी जा सकती है। आर्थिक सर्वेक्षण में एक बात खुले तौर पर स्वीकार की गयी है, जिसके बारे में देश का आम उपभोक्ता बहुत दिनों से जानता है। वह यह बात है कि आर्थिक सर्वेक्षण में साफ तौर पर कहा गया है कि थोक मूल्यों के मुकाबले रिटेल मूल्य दस गुना ज्यादा तेजी से बढ़ते हैं। खाने पीने की चीजों में थोक मूल्य बढ़ोत्तरी करीब बीस प्रतिशत है। इसका दस गुना किया जाये, तो साफ होता है कि करीब दो सौ प्रतिशत का इजाफा एक साल के अंदर खाने पीने की चीजों में हो गया है। यानी सौ का माल तीन सौ का बिक रहा है। सर्वेक्षण में भारत सरकार की आलोचना करते हुए कहा गया है, “दिसंबर 2009 से खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि के संकेत दिख रहे हैं. इसी के साथ ईंधन की कीमत में वृद्धि और अन्य वस्तुओं के दाम पर असर से अगले कुछ महीनों में महँगाई बढ़ने के बारे में चिंता पैदा हो गई है। आर्थिक सर्वेक्षण देखकर साफ होता है कि सरकार गठबंधन की चल रही है। अपनी ही सरकार की आलोचना से साफ होता है कि कहीं न कहीं शरद पवार पर निशाना साधा गया है। यह भाव कम कैसे होंगे, गरीबों को इस संबंध में राहत कैसे दी जायेगी,इस बारे में आर्थिक सर्वेक्षण मौन है। पर महंगाई के भविष्य को लेकर आर्थिक सर्वेक्षण मौन नहीं है। इसमें चेतावनी दी गई है पहले से बढ़ रही महँगाई अगले कुछ महीनों में और बढ़ सकती है. इस सर्वेक्षण में खाद्य पदार्थों की प्रबंधन नीतियों, विशेष तौर पर चीनी जैसी खाद्य सामग्री के बढ़ते दाम की आलोचना की गयी है। यह आशंका अगले ही दिन सामने आ गयी, जब बजट 2010 ने पेट्रोल डीजल के भाव बढ़ा दिये और एक्साइज बढ़ने के बाद तमाम कंपनियों के ये बयान आ गये कि वे अपनी कीमतों में बढ़ोत्तरी करेंगी। यूं बजट ने कुछ कर छूटें भी हैं। पर यह कर छूटें सिर्फ उच्च श्रेणी के करदाताओं को मिलेंगी,जबकि महंगाई में भाव बढ़ेंगे सबके लिए। यानी राहत कुछ को, पर कष्ट सबको। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, “भारत के लिए ये पूरी तरह से संभव है कि उसकी विकास दर दस या उससे अधिक हो जाए और वह अगले चार साल में दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन सकती है.” और यह सब तेजी इसके बावजूद कि आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि 2009-10 में खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों में दशमलव दो प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी है। बजट ने कृषि विकास के लिए 400 करोड़ रुपये का आंकड़ा रखा है। इस आंकड़े से कृषि की बेहतरी हो पायेगी, इसमें सिवाय संदेह को कुछ नहीं किया जा सकता। अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र की दुर्गति के बावजूद भविष्य की तेजी के अनुमान आर्थिक सर्वेक्षण में बदस्तूर हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में एक बात साफ तौर पर उभरती है कि सरकार खाने पीने की चीजों की महंगाई को चिंताजनक जरुर मानती है। आर्थिक सर्वेक्षण यह फूड कूपनों के जरिये गरीब परिवारों को सीधे तौर पर खाद्य अनुदान देने का प्रस्ताव करता है।यह प्रस्ताव अमली जामा कैसे पहनेगा, यह सवाल बहुत ही महत्वपूर्ण है। राशन की दुकानों तरह व्यवस्था भी भ्रष्ट तत्वों द्वारा बरबाद न हो, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पर इस संबंध में आर्थिक सर्वेक्षण कोई आश्वासन नहीं दे सकता। कुल मिलाकर आर्थिक सर्वेक्षण और बजट अपनी जिम्मेदारियों को राष्ट्रीय और ग्लोबल कारकों पर डालते हुए दिखते हैं और उसी के अनुरुप आचरण करते हुए दिखते हैं। यह सही है कि ग्लोबल बाजार में कच्चे तेल के भाव लगातार बढ़ रहे हैं, पर इसकी प्रतिक्रिया सिर्फ यही हो कि भारत में भाव बढ़ा दिये जायें, तो फिर बजट और सरकार की क्या जरुरर है। सब कुछ बाजार को ही तय करना हो, तो बजट और सरकार की भूमिका खत्म हो जाती है। बाजारी शक्तियों के चलते आम आदमी परेशान ना हो, यह सुनिश्चित करना सरकार का काम है। पर सरकार वह काम करती हुई नहीं दिखती। प्रणव मुखर्जी से उम्मीद थी कि कुछ नये रास्ते निकालेंगे। विकास को पटरी लायेंगे, बिना महंगाई के। यही चुनौती थी। इस चुनौती को मुखर्जी पूरा नहीं कर पाये। आने वाले दिन विकट महंगाई के होने वाले हैं, इस बजट का यही संदेश है। यही संदेश तो बाजार से आ रहा है। अगर बाजार और बजट एक सी भाषा बोलने लगे, तो फिर बजट का अर्थ क्या रह जाता है। अब सबसे बड़ा सवाल इस बजट के बाद यह है कि आखिर बजट होता किसलिए है।

अंधेरे का समाजवाद


अंधेरा है, दूर तक अंधेरा है। ना जी, ये कोई कविता नहीं हो रही है। विशुद्ध यथार्थवाद है। बिजली गायब रहे, तो कवि जागृत नहीं होता। कविता लिखने की न्यूनतम जरुरतों में से एक बिजली की उपस्थिति है। यह तो व्यंग्यकार ही सख्त जान प्राणी है, जो बिजली जाने पर भी चिंतन कर सकता है। इधर बिजली जाने की स्थितियों पर चिंतन किया तो, ये कुछ सामने आया-

1- बिजली जाना समाजवादी स्थितियों की ओर ढकेलता है, सब एक से हो जाते हैं। हर घर के बल्ब, लाइटिंग अलग तरीके की होती है। कईयों की बहुत फूं फां टाइप होती है। कई की बहुत गरीब टाइप की होती है। उजाले सबके अलग अलग टाइप के होते हैं। पर अंधेरे सबके एक जैसे होते हैं। अंधेरा यूनिवर्सल है, एक जैसा ग्लोबल है। लाइटिंग के टाइप सब जगह अलग अलग हैं। कहीं ट्यूब हैं। कहीं बल्ब हैं। रोशनी के प्रकार तो दिल्ली में ही पचास तरह के हैं, पर अंधेरा अफ्रीका से लेकर अमेरिका तक एक ही जैसा है।

2- इससे साफ होता है कि उजाला अलग अलग टाइप का होकर लोगों को अलग अलग कैटेगरियों में बांटता है, पर अंधेरा एक जैसा होकर सबको एकता का संदेश सा देता है। यानी अंधेरा अपने चरित्र में समाजवादी होता है।

3- इससे यह भी साफ होता है कि बिजली की समस्या यह दरअसल सिर्फ इतनी सी है कि कुछ घरों में बिजली है, कुछ घरों में नहीं। किसी घर में न हो, तो किसी को शिकायत ना होगी। उजाला सबको नहीं मिल सकता तो क्या, अंधेरे का तो समान वितरण हो ही सकता है।

4- बल्कि अंधेरा उन घरों के हिस्से में ज्यादा आता है, जो बड़े हैं। पांच कमरों वाले घर के हिस्से में पांच कमरा भर के अंधेरा आता है, और एक कमरे वाले घर में एक कमरा अंधेरा ही आता है। इसे न्यायपूर्ण वितरण माना जा सकता है। कमरे ज्यादा हैं, तो अंधेरा भी ज्यादा। छोटे घर को कम अंधेरा झेलना पड़ता है। चाइस यह है कि या तो कमरे बड़े ले लो, या फिर अंधेरा बड़ा।

आइये अंधेरे की ओर चलें।

किससे बात करें


एक काम जो बरसों से होता रहा है, पर इधर कुछ ठप सा पड़ा हुआ है, वह है भारत पाकिस्तान की शांति वार्ता। जितनी भी हुई, उसमें शांति कम थी, वार्ता अधिक थी। पर अब वह भी नहीं है। सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान में वार्ता किससे की जाये ।

1- क्या राष्ट्रपति जरदारीजी से बात की जा सकती है। पाकिस्तान में पब्लिक का मानना है कि जरदारीजी से की जा सकती है, अगर बात नान सीरियस हो तो। पर भारत पाक शांति वार्ता नान सीरियस बात नहीं है। इसलिए जरदारीजी से बात करना बेकार है। जरदारी के मामले में एक बात और कही जाती है कि जरदारीजी को कोई सीरियसली नहीं लेता, खुद जरदारीजी भी खुद को सीरियसली नहीं लेते।

2- क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानीजी से बात की जा सकती है। गिलानीजी अपने सूट की वजह से सीरियस लगते हैं। पर अगर पर्सनल्टी में सीरियसनेस सिर्फ सूट के खाते में ही हो, तो फिर तो सिर्फ सूट से ही बात की जानी चाहिए। सूट चाहे जितने सीरियस हों, पर बोलते नहीं है। और गिलानीजी चाहे बोलते कितना ही हों, पर वह सीरियस नहीं हैं।

3- गिलानीजी को सीरियसली इसलिए नहीं माना जाता कि वह जरदारीजी के कैंडीडेट माने जाते हैं। जैसा कि बताया जा चुका है कि जरदारीजी को पाकिस्तान में उतना ही सीरियसली लिया जाता है, जितनी सीरियसता के साथ भारत में लाफ्टर चैलेंज देखा जाता है।

4- अफगानिस्तान से तालिबानियों से पाकिस्तान के बारे में सीरयसली बात की जा सकती है। जिस तरह से पाकिस्तान में जगह जगह धमाके हो रहे हैं, उसे देखकर तो लगता है कि पाकिस्तान में मुस्तैदी से दिल लगाकर काम तो सिर्फ तालिबानी ही कर रहे हैं। कर्मठ तालिबानियों से निवेदन किया जा सकता है कि अपना कर्मक्षेत्र पाकिस्तान तक ही सीमित रखें। पर तालिबानों से बात क्या हो सकती है। बम, बंदूक इन मसलों के अलावा तालिबानी कोई दूसरी बात नहीं कर सकते। इतने बम और उतनी बंदूकों से इलाका तबाह करना है,इसके अलावा दूसरा वाक्य तालिबानियों की समझ में नहीं आता है। तालिबानी तबाही के प्रति इतने कटिबद्ध हैं, कि कहीं दूसरे इलाके में तबाही नहीं मचा पा रहे हों, तो अपने ही इलाके में मचाना शुरु कर देते हैं। लाहौर और पेशावर के धमाके तो यही बताते हैं।

5- क्या पाकिस्तान के बारे में ओबामा से बात की जाये। ओबामा अकसर पाकिस्तान के बारे में बात करते रहते हैं। पर मसला यह है कि ओबामा को पाकिस्तान के नेता तब ही सीरियसली लेता है, जब ओबामा पाकिस्तान को डालर देने की घोषणा करते हैं। ओबामा की नान डालरीय घोषणा को पाकिस्तान सीरियसली नहीं लेता। पाकिस्तान में यूं ओबामा चाहें, तो जरदारीजी से बात कर सकते हैं, पर जरदारीजी के बारे में बताया जा चुका है कि उनकी चलती नहीं है। चलती तालिबानों की है, पर वो बात करने के लिए तैयार नहीं हैं।

6- बुश से बात करने का मतलब नहीं है। अमेरिका में हाल यह है कि अमेरिकी पत्रकार भी उनसे बात नहीं करते। अमेरिका में वाशिंगटन से रिटायर हुए नेता और हालीवुड से रिटायर हुई अभिनेत्री की गत एक सी होती है। दोनों सिर्फ संस्मरण सुनाने भर के रह जाते हैं।

अब आप ही बताइए कि पाकिस्तान में किससे बात की जाये।