Monday, March 2, 2009

जनाब प्रसून पर नहीं मुझे तों सवालों से भागने वालों पर एतराज़ है

बात सिर्फ प्रसून जोशी की नहीं गीतकारों की उस पीढ़ी की है या कहूं फिल्मी लेखकों की है जिन्होंने साहिर द्वारा दिलवाए सम्मानजनक स्तर को गिरा दिया। मैंने सवाल प्रसून की प्रतिभा पर और उनके गीतों पर नहीं उठाए न ही मुझे उनके किरदार पर कोई शक है, यहां तक की पिछली पोस्ट में मैंने उनका 'पाठशाला' जैसे ठेठ शब्दों के प्रयोग की सराहना की है। मेरा सवाल तो ये है कि आखिर इस दौर का स्थापित गीतकार (प्रसून जोशी), जो खुद कहता है कि अब वो काफी हद तक अपनी शर्तों पर काम करता है, तो वो जिस विधा का प्रतिनिधित्वत करता है उससे जुड़े सवालों से क्यों बचता है? क्या वो सिर्फ कैमरे के सामने आपनी मौजूदगी भर दर्ज करवाने तक सीमित रहेगा?

कई यादगार गीत देने वाले साहिर लुधियानवी की किसी फिल्म के लिए गीत लिखने की एक ही
शर्त होती थी, संगीतकार से एक रुपया ज्यादा लूंगा। सालों तक ये परंपरा चलती रही। बात सिर्फ एक रुपए या ज्यादा पैसे के नहीं थी, बात सम्मान और गीतकार के रुतबे की थी।
गुलज़ार का अपना अंदाज है और वो इस स्तर पर हैं कि बिना कहे ये शर्त खुद ब खुद पूरी हो
जाती है। आपने उन्हें कभी कैमरे के पीछे दौड़ते देखा है? नए दौर के बहुतेरे गीतकार पार्ट टाइम हैं, प्रोड्यूसर संगीतकार के इशारों
पर नाचते हैं, तभी तो खिट पिट जैसे घटिया दर्जे के गीत लिखे और गाए जाते हैं।


क्या आप उससे 'गेंदा फूल' की खुराफत के लिए जवाब नहीं चाहते?

-अगर नहीं तो आप भी उस गीत के असल रचैयता और उससे जुड़े समूह जिंदा और मरहूम लोंगों से नाइंसाफी में बराबर के भागीदार हैं।
-अगर हां तो आप मुझसे सहमत हैं। वो पत्रकार भी तो यही सवाल पूछ रहा था। फिर प्रसून को जवाब देने से एतज़ार क्यों था? क्या सिर्फ कैमरे के सामने ही सवालों के जवाब दिए जाने चाहिए?

सतीश चंद्र सत्यार्थी जी की बात से भी मैं पूरी तरह सहमत हूं, कैमरे के सामने आने का लोभ सब को होता है। सच तो ये है फिल्म/टीवी क्षेत्र में जाने का मकसद ही कैमरे के सामने आना होता है। प्रसून, मैं, सतीश, जसदीप हर कोई इस पोस्ट को पढ़ने वाला कहीं ना कहीं कभी ना कभी कैमरे के कीड़े से कटना चाहता है। कोई हर्ज़ भी नहीं मैंने कब कहा ये बुरा है। मैंने तो इतना कहा, कैमरा बंद होते ही कैसे एक 'जिम्मेदार पब्लिक फिगर' गैर जिम्मेदार हो जाता है। उसे इस बात पर पछतावा है कि एक गैर-कैमराधारी ने उनसे सवाल पूछे और वो जवाब देते रहे।

जसदीप भाई!!!फिल्म नगरी में तो चोरी होती रहती है, तो क्या इसे परंपरा मान कर बदस्तूर जारी रहने दे। आवाज़ ना उठाएं। आपकी जानकारी के लिए बता दूं हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म दोस्ताना के एक गीत के लिए करन जौहर ने करोड़ों देकर रिलीज़ से तीन दिन पहले जान छुड़ाई थी। वो बात अलग है कि दावा करने वाला एक बड़ा प्रॉडक्शन हाउस था और अदालत जा पहुंचा था। उसने अपनी रायलटी वसूल कर ली। वो छतीसगढ़ वाले भोले लोग बस प्यार से क्रडिट देने की इल्तजा कर रहे हैं तो किसके कान पर जूं रेंगती है।

आज छतीसगढ़ से एक गीत चुराया है तो इतना चर्चा है, पंजाब से हर रोज़ कितने गीत चुराते हैं बॉलीवुड वाले, रोज़ आवाज़ उठने लगे तो बॉलीवुड के आधे संगीतकार बेरोज़गार हों जाएं। सिंह इज़ किंग हो या हिमेश के कर्ज़ का 'सोहणिए जे तेरे नाल दगा मैं कमावां' सालों पहले हिट हो चुके पंजाबी गीत हैं। पूरा देश इन्हें चोरी होने के बाद गुनगुना रहा है। अब बताईए चुप रहूं, भागने देता रहूं इन नामी लोगों को सवालों से। ठीक है पत्रकारी भी अब धंधा है, लेकिन ज़मीर कैसे मार दूं। आप कहें तो...???

मेरी नज़र में तो सवालों से भागना चोरी से भी बड़ा गुनाह है। नेताओं का ये गुण संवेदनशील लेखकों में आना चिंतन का विषय है।आपको इस पर हैरानी नहीं होती मुझे इस बात का भी अफसोस है|

Sunday, March 1, 2009

प्रसून जोशी को 'कैमरा' कीड़े ने काटा

सबसे पहले तो आपकी याददाशत दरुस्त कर दूं, जी हां ये प्रसून जोशी गेंदा फूल वाले गीतकार ही हैं और सुनिए जनाब ये कीड़ा है ही इतना खतरनाक कि जितना इससे बचो ये उतना ही काट खाने को दौड़ता है, अब आप हस्ती हैं, बॉलीवुड के अरमानों की बस्ती हैं, तो ये कीड़ा आपको भी चट कर जाएगा। पर जनाब यहां तो हालात उससे भी बद्दतर हो चले हैं। अब आप ही बताएं कि गर कीड़ से कटने वाला ख़ुद ही कीड़े को चाटने लगे तो क्या?

जनाब अब पता चला जहरबुझे 'कैमरा' कीड़े का नशा इतना ख़तरनाक है कि एक बार चिपक गया तो लत छुटती नहीं। जानता हूं अभी तक बात पहेली ही बनी है, क्षमायाचना के साथ एक बात और कह कर असल मुद्दे पर आता हूं। कुछ दिन पहले मेरे एक क्रांतिकारी मित्र ने 'गेंदा फूल' सुनते हुए एक क्रांतिकारी विचार ही दे डाला। क्या प्रसून अगला गुलज़ार बनने जा रहा है। तभी ख़बर छप गई कि गेंदा फूल तो छतीसगढ़ी गाना है जिसे बड़ी सफाई से प्रसून ने अपने नाम गोंद लिया। अभी मैं सोच रहा था कि मुझे प्रसून जोशी से मुलाकात का दिन याद आया, जयपुर का लिट्ररेचर फैस्टिवल था पिछले महीने वहीं पर जनाब विचार चर्चा में क्षेत्रीए भाषाओं के काल का गाल होने पर खूब चिंता जता रहे थे और अपने गीतों में ठेठ शबदों के प्रयोग की भी काफी चर्चा कर रहे थे, सुनने में अच्छा भी लग रहा था। फिर वो मौका आया जब मुझे उनकी बीमारी का पता चला। परिचर्चा के पंडाल से बाहर निकले तो सामने से एक टीवी कैमरे ने घेर लिया, हम भी लपक लिए कि सुनें पर्दे के पीछे गीत रचने वाले प्रसून कैमरे के सामने कैसे बोलते हैं। लो जी सवालों का सिलसिला शुरू हुआ और अपने प्रसून भाई एक्सर्ट अंदाज़ में बाइट देने लगे। पास ही खड़े एक प्रिंट मीडिया के पत्रकार को भी अपने ज्ञान कौशल पर 'ज्यादा' ही 'ओवर कॉन्फिडेंस' था। अब भई उन्होंने पूछ लिया जनाब साहिर लुधियानवी ने गीतकारों को संगीतकारों से ज्यादा अहृम दर्जा दिलाया, ज्यादा मेहनताना दिलाया। आज वो संगीतकारों/प्रड्यूसरों के दिहाड़ीदार हो गए हैं। पहले गीतकार, गीतकार ही होते थे अब वो पार्ट टाईम हो गए हैं। जवाब था, क्यों कि अब गीतकारी में उतना पैसा नहीं। अगला सवाल था, तो इतना स्तर गिराया किसने की संगीतकार से 1 रुपया ज्यादा लेने के हक रख़ने वाले गीतकारों की कीमत कम हो गई। जवाब था, नए लोग सुधार ला रहे हैं। मैं भी अब काफी हद तक अपनी शर्तों पर काम करता हूं।

तभी बंटाधार हो गया। कैमरे वाले की टेप खत्म हो गई। कॉपी पैन वाले पत्रकार ने अभी अपना अगला सवाल पूछा ही था कि प्रसून साहब ने हाथ खड़े कर दिए। बोले अब काहे का सवाल कैमरा तो बंद हो गया। अरे जनाब सवाल तो सवाल है कैमरे को पूछ के थोड़ी आता है। वो कैमरे वाले की तरफ मुड़े, पूछाः क्या ये आपके साथ नहीं हैं कैमरे वाले ने जनाब दिया जी वो अलग हैं। प्रसून जी इतराए अरे मैं तो इन्हें आपके साथ समझकर जवाब देता रहा। इतना बोलते ही वो ऑटोग्राफ लेने वाली भीड़ के समंदर के साथ आगे बह लिए।

अब समझे जनाब ये 'कैमरा' कीड़ा कितना ख़तरनाक है। आप पीछे भागते रहो फोटो खिंचवाने के लिए उनके साथ, कभी नोट तो कभी हथेली पर ऑटोग्राफ लेने के लिए शायद आपके हाथ आ जाएं वो। कैमरे के सामने वो जरुर जुगाली करने रुक जाते हैं।

जानने वाले तो उस प्रिट वाले पत्रकार को भी पहचान गए होंगे। उसी वक्त मुझे जयपुर मेले में ही कही तहलका वाले तरुण तेजपाल की बात याद आ गई। कह रहे थे, मीडिया को बड़े नामों के ग्लैमर से निकलना होगा, उद्यौगपति हों या फिल्मी सितारे, इनके मोह जाल से निकलेंगे तभी सत्यत जैसे घोटाले उजागर होंगे। पत्रकार बंधुओ! सुन रहे हो ना!!!

Saturday, October 25, 2008

सफर...


मैं सुलझी हुई
अनसुलझी
पहेली हूं
ना सोना, ना जगना
ना रोना, ना हसना
ना दर्द है, ना ठीक हूं
ना जख़्म है, ना मरहम है
नज़र, ज़ुबान, सुनने की ताकत
जिस्म मे से घटा दी है
मैं उसमें हूं
लेकिन उसका हिस्सा नहीं
मैं बुरा नहीं
पर नापसंद हूं
रुका हूं, पर सफर में हूं

तलाश है
पर खोया कुछ भी नहीं
मंजिल रस्ते में बदल गई
और नदी का पानी कांच
आग ठंडी बर्फ हुई
ठंड में ठिठुरता प्यासा हूं
रुका हूं, पर सफर में हूं

हर्फ हैं,
पर लफ्ज़ और वाक्य ग़ुम हैं
कलम है, स्याही है
कोरे सफे नहीं मिल रहे

लिखूंगा
पेड़ों पर
फूलों पर
पत्तों पर
सूरज पर
चांद पर
धरती पर
अंबर पर
जिस्मों पर
रुहों पर

उस दिन लिखूंगा
जिस दिन ये सब कोरे मिलेंगे
फिलहाल रुका हूं, पर सफर में हूं

Thursday, October 9, 2008

जगजीत सिंह इन सर्च

अपने पसंदीदा गीतों, कविताओं के जरिए अपनी आवारगी के सफर को ज़ाहिर करता रहा हूं। जगजीत सिंह की इन सर्च जिंदगी की तलाश और फलसफे को बहुत गहराई से बयान करती है। इसकी गज़लें हर मौके, वक्त और हालात को समझने, राह दिखाने और मुश्किल हालात में मज़बूती देने में मदद करती हैं। सुन के देखिए शायद आपके काम भी आ जाएं

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Saturday, October 4, 2008

क्या आपने मनाई कभी ऐसी गांधी जयंती

आप और मैं हम सब कलमघिस्सू, दिमाग रगड़ और बातों के पीर दूसरों पर भड़ास निकालने के लिए न जाने क्या क्या लिखकर कागज़ और बिल गेट्स के सर्वर को काला करते रहते हैं। गांधी जयंती पर भी हम सब ने मिल कर उनके बारे में लिखने के नाम पर ब्लागवाणी पर भी ख़ूब बोझ डाला और अपने ब्लाग में भी एक और चिट्ठा जोड़ लिया। मैंने तो सोचा था कि मैं ऐसा कुछ न करुं 2 अक्तूबर को पूरा दिन मैं यही सोचता रहा और मैंने अपना कम्यूटर तक ऑन नहीं किया, लेकिन जैसी ही शाम ढलने के बाद करीब सवा 8 बजे जब मैंने अपना ईमेल चैक किया तो सुबह 8 बजे का एक ईमेल देखकर चौंक गया। यह एक आमंत्रण था, कवि,चिंतक और छाया चित्रकार मित्र जसवंत सिंह ज़फर का।
जसवंत सिह ज़फर मुस्कुराहट सच कर रही है बयान

जी हां वहीं जसवंत सिंह ज़फर जिनकी किताब पर चर्चा के साथ मैंने अपने ब्लॉग का शुभारंभ किया था। बस उस निमंत्रण को पढ़ते ही मेरे लिखने का कीड़ा जाग उठा। दरअसल उन्होंने लुधियाना में अपने चित्रों की प्रदर्शनी इन दिनों लगा रखी है, गांधी जयंती पर उन्होंने इस आयोजन को खास बनाने के लिए शहर के सीनियर सिटीजन होम में रह रहे बुजुर्गों को वहां आमंत्रित किया। यह तो हुआ आमंत्रण, अब जो हुआ वो सुनीए, ज़फर और उनके साथियों का काफिला अपनी अपनी कारों में सुबह 11 बजे सीनियर सिटीजन होम पहुंच गया और सभी को बड़े सम्मान के साथ आर्ट गैलरी तक लाया गया।
हम साथ साथ हैं, ज़फर की अर्धांगिनी बुजुर्गों का हाल चाल जानते हुए, पीछे उनकी बेटी भी नज़र आ रही है


सबसे पहले चाय पानी के साथ ही करीब एक घंटे तक जान पहचान और बातचीत का सिलसिला चला। उसके बाद जसवंत ने सभी को नाश्ते और दोपहर के खाने का मिलन यानि ब्रंच परोसा। फिर बुजुर्गों को अपनी मर्जी मुताबिक कुछ भी कहने या करने के लिए पूरी तरह आज़ादी देदी गई।
क्या कहना है क्या सुनना है...

फिर क्या था, बापू की शिक्षा पर अमल करते हुए बच्चों का एक 'तमाचा' पड़ने पर दूसरा गाल आगे करते ही घर से बाहर किए गए इन बुजुर्गों ने जो अपनी आप बीती सुनाई, उसे सुन कर शायद हरे लाल नोटों पर छपे बापू की फोटो की आंखें भी भर आती।
वो बीते लम्हें हमें जब भी याद आते हैं...

ये तो शुरूआत भर थी बीते लम्हों को हाशिए पर रख जब उन बुजुर्गों ने चित्रों में छिपे रंगों से अपने अतीत के खुशग्वार रंग तलाशे तो सबके चेहरे पर मुस्कान के फूल खिल गए। फिर हर पल दोस्ती, अपनेपन, खिलखिलाहट और रंगों के नाम गुज़रा। मौके पर मौजूद सभी कलाकार और कलमकार साथियों को इस बात की राहत थी कि उन्होंने बापू गांधी के वचनों को जिन्हे वो अपने रंगों और लफ्जों में के साथ जिंदगी में भी ढालने की हर पल कोशिश करते रहते हैं, पर खरे उतरते हुए उनकी जयंती पर इन महात्माओं के दिल में यह अहसास जगा सके, कि वो आज भी उसी भारत में रहते हैं, जिसे बापू का देश कहा जाता है।
दुनिया से बेख़बर रंगो की दुनिया में

जो पराई पीढ़ा के अहसास को समझने वाले थे। सवाल वही है क्या आपने कभी अपना जन्मदिन या कोई और त्योहार ऐसे मनाने के बारे में कभी सोचा है। ज़रा ग़ौर से सोचिए
ज़फर तुम्हें सलाम!!!

Tuesday, September 30, 2008

आखिर दिल्ली में लग गया दिल

शायद जब से मैंने जिंदगी में लिखने के रास्ते को अपना मकसद बना लिया तब से इसके सारे मोड़ मेरे दिल्ली की ओर मुड़ते रहे, ख़ाब खुली आखों में तैरता रहा कि दिल वालों की दिल्ली में दिल रम जाए। आज यही ख़ाब हकीकत है।
अभी कुछ ही दिन हुए हैं इस ख़ाब को पूरा हुए, पीछे मुड़कर देखता हूं तो वो सारे मंज़र याद आते हैं, जब मैंने इस खाब की पहली सीढ़ी पर एक एक ईंट रख कर हकीकत की दहलीज तक पहुंचाने वाले कई सारे पाएदान बनाए। खैर गिरते पड़ते चढ़ते चढ़ते मैं चढ़ ही आया हूं, जिस दिन चला था तो धमाकों ने स्वागत किया, जब से यहां हूं तो कभी गोलियों तो कभी धमाकों की गूंज आसपास ही सुनाई देती है। फिर अगर कहूं कि दिल्ली में दिल लग गया है, तो इसमें कोई बेदिली वाली बात नहीं होगी। इसमें उन सब लोगों का हाथ तो है ही जिन्होंने यहां तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन उन सब का बड़ा किरदार है जो अहसास कराते रहे कि ये सब ख़ाब की बातें हैं, लेकिन यहां पहुंचते ही जिन्होंने सब से पहले हाथ थामा शैलेस भारतवासी और सजीव सारथी वो इन सबसे अलग ख़ास जगह रखते हैं। बाकी पूरी दिल्ली दिल में सहेज के रखने लायक हो जाउं, कुछ ऐसा करने की सोच रहा हूं।

Friday, July 4, 2008

जाने तू या जाने न

रेटिंग ****
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आमीर खान युवाओं की नब्ज बखूबी पहचानते हैं और लेखक से निर्देशक बने अब्बास टायरवाला अभी खुद युवा हैं, इस लिए जाने तू या जाने न के जरिए उन्होंने टार्गेट ऑडियेंस को पूरी तरह से खुश कर लिया है।

स्टार कास्ट
इमरान खान
जेनीलिया
नसरुद्दीन शाह
रत्ना पाठक शाह
परेश रावल
सोहेल खान
अरबाज खान
डायरेक्टर
अब्बास टायरवाला

कहानी जय (इमरान खान) और अदिती (जेनीलिया) की है, जिनका पूरा फ्रेंड्स ग्रुप और पेरेंट्स मानते हैं कि वह एक दूसरे को प्यार करते हैं, लेकिन खुद उन्हें ही अहसास नहीं होता। फिर जय की जिंदगी में मेघना (मंजरी) और अदिती की जिंदगी में सुशांत (अयाज खान) आते हैं, तभी दोनों दोस्तों को दिल में छिपे प्यार का अहसास होता है। कहानी रुटीन है और क्लाइमेक्स भी कई फिल्मों में देखा हुआ। डिफरेंट है तो ट्रीटमेंट, सबसे बड़ी बात आमिर और अब्बास ने फिल्म को मेट्रो शहरों के आम युवा से सहजता से जोड़ा है। लव स्टोरी में पेरेंट्स-बेटी, मां-बेटा, भाई-बहन के रिश्ते पिसे नहीं हैं। यही वजह है कि हर युवा खुद को कहानी से रिलेट कर सकता है। इमरान पहली ही फिल्म में अदाकारी की पुख्तगी का अहसास करवाते हैं। जेनेलिया भी गहरी छाप छोड़ती हैं। दोस्तों के ग्रुप में अनुराधा पटेल, जयंत, अलिशका, निरव, कर्न, सुगंधा, प्रतीक, रेणुका सबने अपने किरदार को बखूबी जिया है। रत्ना पाठक शाह और नसरूद्दीन की केमिस्ट्री हम पांच की याद दिलवाती है। दोनों ही शानदार हैं। परेश रावल छोटे से किरदार में जोरदार हैं। सोहेल और अब्बास जरुर इरीटेट करते हैं। एआर रहमान के दो गाने पप्पू को डांस नहीं आता और कहो न कहो पहले ही हिट हो चुके हैं।
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रेटिंग चिन्ह---*पैसा बर्बाद/ **बस ठीक ठाक है/ *** पैसा वसूल/ ****जरूर देखें/ ****बेहतरीन

लव स्टोरीः आधी 2008 बाकी 2050

रेटिंग ***
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हवा में उड़ती कारें, उंगली के इशारे पर काम करती घरों की दीवारे, आगे पीछे घूमते और हुक्म बजाते रोबोट और मीशीनी जिंदगी में कहीं पनपती एक लव-स्टोरी। यही है लव स्टोरी 2050 की कहानी। भई फिल्म का नाम 2050 है, लेकिन आधी फिल्म तो 2008 में ही गुजर जाती है।

स्टार कास्ट
हरमन बवेजा
प्रियंका चोपड़ा
बोमन इरानी
अर्चना पूर्ण सिंह
डायरेक्टर
हैरी बवेजा
शूटिंग लोकेशन
आस्ट्रेलिया, न्यू यार्क, मुंबई
वो भी मौजूदा मुंबईया स्टाइल लव स्टोरी में जिसमें प्रेमी हर रोज 'होने वाली प्रेमिका' के घर के चक्कर लगाता है, वो रोज डेट पर जाने के लिए मना करती है और फिर मान जाती है। लेकिन हैरी बवेजा ने इस बात को दो-तीन बार रिपीट करके तेजी से शुरू हुए पहले हाफ को कुछ ही देर बाद धीमा और बोर बना देता है। फिर भी अच्छी ओपनिंग, खास कर तेज़ रफ्तार पसंद करने वाले युवाओं को बांधने में कामयाब रहे हैं। हरमन बवेजा की एंट्री भी ठीक ठाक रही है। फिल्म की कहानी रुटीन लव स्टोरीज जैसी है, जिसमें पहले जन्म में प्रेमिका की मौत के बाद प्रेमी उसे ढूंढता फिरता है। बस इसमें नया ये है कि इस बार पुर्नजन्म की बजाए प्रेमी टाइम मशीन में बैठ कर 42 साल आगे चला जाता है। लेकिन घबराइए मत पहले हाफ से निराश होकर सिनेमा हाल छोड़ कर मत जाइए, दूसरे हाफ में फिल्म सब को चकित करती है। खास कर 2050 में कल्पित रोबो वल्र्ड हवा में उड़ती कारें, आसमान से उलटी लटक कर चलती ट्रेंन, वर्चुयल नियोन साइन बोर्ड और बोलते यूनीपोल, हवा में तैरती स्टेज के साथ ही मुंबई में हजारों मंजिली इमारतों के साथ ही समंदर में बनाए गए शीशे के घर आपको जरुर अकर्षित करेंगे। एडवांस दौर में हर काम में मदद करते रोबोट आपको काफी क्यूट लगेंगे। खास कर प्रिंयका चोपड़़ा का नन्हां पिंंक रोबो, जो उसके दिल में पनपते प्यार को न सिर्फ बखूबी समझता है, बल्कि हीरो के रोबो से सारी बातें शेयर भी करता है। हैरी बवेजा ने अपने बेटे को स्थापित करने के लिए स्क्रिप्ट और सक्रीन प्ले पर खास ध्यान दिया है। यहां तक कि खतरनाक ताकतों वाला विलेन उस पर हावी न हो उसके चेहरे को नकाब में ही रखा गया है। एक्टिंग की बात करें तो विभिन्न इमोशंस को एक्सप्रेस करने में हरमन काफी हद तक सफल रहें हैं, फिर भी उन्हें काफी मेहनत करनी होगी। जो लोग उनके चेहरे को ऋतिक रोशन से मिला रहे हैं, उन्हें हरमन में कुछ डिफरेंट देखने को मिलेगा। डांस, एक्शन, रोमांस, इमोशनल, ट्रेजेडी और कॉमेडी हर तरह के सीन फिल्म में उनके लिए खास तौर पर रखे गए हैं, शायद पापा हैरी साबित करना चाहते थे कि जूनियर बवेजा में पूरा फिल्मी मैटिरियल है। प्रियंका एतराज के बाद एक बार फिर काफी हॉट और सेक्सी लगी हैं। चाहे ड्रेसेस हों या सेकेंड हॉफ में 2050 की स्टाइल उनकी हर चीज में गलैमर देखने को मिला है। बोमन इरानी भी अपने किरदार को जी गए हैं। अर्चना पूर्ण सिंह भी ठीक ठाक लगी हैं। म्यूजिक के मामले में अनु मलिक इस बार भी निराश ही करते हैं। मीलों का फासला खास कर सैड वर्शन जरुर प्रभाव छोड़ता है। खैर सभी चीजों का गुलदस्ता सजा हैरी बवेजा का निर्देशन लोगों को बांधने में सफल रहा है, अगर वह पहले हाफ में थोड़ी कैंची चलाने का साहस दिखाते तो सक्रीनप्ले में और कसाव आता। विजय अरोड़ा और किरण दियोहंस की सिनेमेटोग्राफी भी फिल्म का साकारात्मक पक्ष है। खास कर आस्ट्रेलिया के समंदर के आस पास की लोकेशंस को उन्होंने खूबसूरती से फिल्माया है। ग्राफिक्स के पीछे नजर आता मुंबई भी उनके कैमरा वर्क को बखूबी दिखाता है। ग्राफिक्स के मामले में लव स्टोरी 2050 को बॉलीवुड में क्रांति कहा जा सकता है। अगर ऐसी फिल्में बनने लगे तो बॉलीवुड का हॉलीवुड करन होने में देर नहीं लगेगी। फिल्म युवाओं को तो जरुर आकर्षित करेगी, लेकिन उससे पहली पीढ़ी को दूसरे हाफ में वीडियो गेम्स पर आधारित फाइटिंग सीन्स शायद ही समझ आएं। फिल्म में एक और चीज काबिले जिक्र है वनिता उमंग कुमार का आर्ट, 2050 की तकनीकी दुनिया को उभारने में उनका आर्ट वर्क खास भूमिका निभाता ही है, उसमें भारतीय संस्कृति की छाप भी नजर आती है। खास कर प्रियंका चोपड़ा द्वारा कमरे का रंग गुलाबी करने वाले सीन में दीवारों पर लिखे श्लोकों में इसकी झलक मिलती है। पिक्चर अभी बाकी है दोस्त एक और सरप्राइज फिल्म में हरमन बवेजा का क्लोन भी देखने को मिलेगा, सो कम ऑन दोस्तो हरमन को हरमन से लड़ते देखते हैं।
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रेटिंग चिन्ह---*पैसा बर्बाद/ **बस ठीक ठाक है/ *** पैसा वसूल/ ****जरूर देखें/ ****बेहतरीन