16.7.10

सायबर चला टीवी की चाल

विनीत, तुमसे सार्वजनिक रूप से ईर्ष्‍या व्‍यक्‍त करता हूं. इतना और बेहतर न लिख पाने का मलाल हमेशा रहता है. तुम उस अवधारणा का घनघोर अपवाद हो जो ज्‍़यादा लिखने पर उल-जुलूल लिखने लगता है. इतनी ऑथेंटिसिटी के साथ लिखा कम ही मिलता है. लोग लिखते हुए झालमुढी बनाने लगते हैं. वहीं हो जाता है तेल.

बढिया लिखे. एक भी महत्त्वपूर्ण बात न छूटने दिया. दरअसल, बहस कायदे से हो, इसके लिए तथ्‍यों का होना ज़रूरी है. सबसे पहले और एक्‍सक्‍लूसिव बनाने के चक्‍कर में मीडिया (तमाम प्रजातियों की) जिस तरह से ख़बरों की वाट लगाते हैं, उसका असरदार असर इन डॉटकॉमों पर दिखने लगा है. लगने लगा है कि लोकप्रियता के फिराक में ये बाज़ार के आगे खोलकर बिछ जाने को तैयार हो चले हैं.

'किसी भी बहस की पूर्वपीठिका क्‍या होती है, शायद मैं जान नहीं पाया हूं या जो जाना है वो ग़लत है. मुझे लगता था/है कि किसी भी बहस में एक ही व्‍यक्ति चित और पट, दोनों की तरफ़दारी नहीं करेगा/ी. कम से कम आयोजकों का कोई न कोई पक्ष और नज़रिया ज़रूर होगा. न जाने क्‍यों, मुझे इस बार ज्‍़यादा ज़ोर से यह महसूस हुआ कि बहस में प्‍वायंट स्‍कोर करने वाली भावना ज्‍़यादा हावी रही. मुख्‍यधारा की मीडिया के बारे में सभागार में सुत्रधार से लेकर वक्‍ताओं और श्रोताओं तक ने जो चिंताएं व्‍यक्‍त की, जो सवाल उठाए क्‍या वो मीडिया की किसी और प्रजाति के संदर्भ में जायज़ नहीं होगा?

मुख्‍यधारा के मीडिया से जो क़ायदे का काम न कर पाने का दर्द लिए बाहर हुए, या न्‍यूज़ रूम में घुसते ही जिनका माथा टनकने लगता है, या जिनको नोजिया और बदहज़मी की शिकायत होने लगती है; वे कम-से-कम बाहर आकर वैसी आब-ओ-हवा का निर्माण तो नहीं ही करेंगे जिससे पिंड छुड़ाकर वे आए हैं.

कल सूत्रधार आनंद प्रधानजी ने सुमित अवस्‍थी को आमंत्रित करते हुए एसपी वाले आजतक के इंडिया टीवी के साथ क़दमताल करने पर अपनी निराशा व्‍यक्‍त किया था, पर उसके लिए सुमित को जिम्मेदार नहीं ठहराया था. बिल्‍कुल सही किया था. दिलीप मंडल और प्रॉन्‍जय गुहा ठकुराता को सुनने के बाद लगा कि सुमित की औक़ात तो इस पूरे खेल में एक प्‍यादा से ज्‍़यादा नहीं है. वहां तो बड़े-बड़े लाला और घाघ नौकरशाह अंगदी पांव जमाए जमे पड़े हैं. सूत्रधार महोदय के साथ-साथ मणिमाला तथा मंडल और ठकुराता मोशाय ने अपने-अपने ढंग से स्थिति में बदलाव के प्रति उम्‍मीद जतायी थी. विनीत की रपट में इसका विस्‍तार से उल्‍लेख है. लगभग चारो दिग्‍गजों ने वैकल्पिक मीडिया के प्रति उम्‍मीद जतायी. ये ज़रूर माना उन्‍होंने कि सायबर मीडिया की पहुंच फिलहाल सीमित है और निकट भविष्‍य में इसके दायरे में विस्‍तार की कोई संभावना नहीं है. फिर भी उम्‍मीद सायबर प्रजाति से ही है.

यहां, जब सायबर जगत में देखता हूं तो लगता है टीवी वाले क्‍या लड़ेंगे! उनसे ज्‍़यादा टीआरपी तो इस ऑल्‍टरनेटिव मीडिया को चाहिए. वही तिकड़म, वही प्रपंच जोते जा रहे हैं जिसे छपासगंज और वाह्यप्रसारण वाहन वाले अभ्‍यास करते हैं. वश चले तो पट्टा भी चला दें ब्रेकिंग न्‍यूज़ का. टीकर-पीकर टाइप की चीज़ तो दिखने ही लगी है. काहे, आपको काहे एक्‍सक्‍लूसिव ख़बर की ज़रूरत पड़ने लगी? हम जो आपको दें वो और किसी को न दें, पर बताइए तो क्‍यों?

बहरहाल, सवाल तो है ही कि मीडिया किसके पक्ष में काम करेगा, लोकतंत्र की मजबूती में इसकी कोई भूमिका अब होगी?

4.6.10

ग़ैरबराबरी को बढावा देते आश्रम

नरेश गोस्‍वामी अपने पुराने मित्र हैं. 'धर्म और बाज़ार' के संबंधों की पड़ताल कर रहे हैं दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में. धांसू लिखाड़ हैं. हिंदी और अंग्रेज़ी में समान रूप से लेखन करते हैं. तनाव की स्थिति में खूब लिखते हैं, बढिया लिखते हैं. पेश है नरेशजी का यह आलेख जो श्री श्री रविशंकर जी पर हमले के अगले रोज दैनिक भास्‍कर में छपा था. लेखक और प्रकाशक दोनों को आभार.


गुरु परंपरा केंद्रित एक धार्मिक समुदाय के उत्तर

भारत के लगभग हर शहर में आश्रम हैं। इन

आश्रमों में हर सप्‍ताह भक्‍तजन या संप्रदाय के

अनुयायी जुटते हैं। परिसर की फसलों और बागवानी की

देखरेख सेवादार करते हैं। इस काम को श्रमदान कहा

जाता है। इस काम का कोई मेहनताना नहीं होता। यह एक

स्वैच्छिक कार्य होता है। इस बेहद नपी-तुली व्यवस्था के

प्रभामंडल के चलते कोई अनुयायी यह नहीं जानना चाहता

कि इतनी जमीन खरीदने और उस पर भवन निर्माण करने

के लिए पैसा कहां से आता है।


इन आश्रमों के जलसों में भक्‍तजन गुरु की झलक

पाने भर के लिए बेताब रहते हैं। गुरु स्वर्ग का मार्ग दिखाने

के अलावा रोजमर्रा के जीवन और सामाजिक संबंधों को

मधुर बनाने के लिए कोई नुस्खे तजवीज नहीं करते। वे

कभी-कभी एक भीतरी रोशनी की बात करते हैं, लेकिन

उस रोशनी से सामाजिक संबंधों में पसरे अंधेरे कोने

प्रकाशित नहीं हो पाते। इधर, बढ़ते बाजार और

उपभोक्‍तावाद की ललक ने समाज से मिलने वाले

आश्वासनों को जबसे छिन्न-भिन्न कर दिया है, तबसे इन

संप्रदायों और आश्रमों में अनुयायियों की भीड़ बेतहाशा

बढ़ी है। हाल में ऐसे ही एक आश्रम में भगदड़ मचने से

कई महिलाओं की मौत भी हो गई थी।

यहां हमारी मंशा किसी संप्रदाय या आश्रम की निंदा

करना कतई नहीं है। सवाल बस इतना है कि अपने

अनुयायियों को स्वर्ग और समृद्धि का रास्ता बताकर क्‍या

ये संप्रदाय लगातार अराजकता और अव्यवस्था की तरफ

बढ़ रहे समाज को बेहतर या वैकल्पिक जीवन दर्शन दे

सकते हैं? क्‍या ऐसे धार्मिक समागमों से समाज का जीवन

सचमुच शांतिपूर्ण, सार्थक या उदात्त हो पाता है? अगर

प्रार्थना भवन में कुछ विशिष्ट लोगों को बैठने के लिए नर्म

गद्दियां दी जाती हैं और बाकी लोगों को सूत की साधारण

दरियों पर बैठाया जाता है, तो इसका मतलब साफ है कि

वहां भी एक तरह की वर्ण-व्यवस्था लागू है।

आध्यात्मिकता का अर्थ यदि मनुष्य के होने मात्र को गरिमा

प्रदान करना है, तो फिर इस श्रेणीकरण को किस तरह

जायज ठहराया जा सकता है?

आम तौर पर ऐसी संगतों के अवसर पर गुरु के आसन

के एकदम पास वाला क्षेत्र लगभग वीआईपी जोन होता है।

वहां खास हैसियत के लोगों को जगह दी जाती है। जैसे

आम जीवन में लोग झूठ बोल कर, वास्तविक पहचान के

बजाय खुद को विशिष्ट व्यक्‍ित बताकर अपना काम

निकालते हैं, लगभग ऐसा ही कुछ यहां भी होता है। इस

जगह में प्रवेश पाने के लिए कोई अगर खुद को कहीं का

एमएलए या प्रोफेसर बता दे, तो उसे तुरंत माफीनामे के

साथ अंदर दाखिल कर लिया जाता है। ऐसे में यह सोचना

जरूरी हो जाता है कि अगर इन नए संप्रदायों में भी

सनातनी श्रेणियों के हिसाब से व्यवहार किया जाएगा, तो

मनुष्य की मूलभूत बराबरी के आदर्श का क्‍या होगा?

अगर इन संप्रदायों के सामाजिक आधार पर नजर

डाली जाए, तो मौटे तौर पर यह बात सामने आती है कि

इन संप्रदायों का प्रभाव मुख्‍यत: उन वर्ग, समुदायों और

समूहों के बीच है जिन्हें धर्म की शास्त्रोक्‍त व्यवस्था में

सम्‍मान, गरिमा और बराबरी का हकदार नहीं माना जाता

था। लेकिन उदार अर्थव्यवस्था के इन दो दशकों में समाज

के दस्तकार और कारीगर वर्ग के लिए धर्नाजन के कुछ

नए रास्ते खुले हैं। निर्माण में आई तेजी और शहरीकरण

की प्रक्रिया में आए उछाल से उन जातियों और समूहों को

निश्चय ही कुछ आर्थिक लाभ पहुंचा है, जो हरित क्रांति

के बाद लगभग बेकाम और बेरोजगार हो गए थे।

स्वरोजगार या फिर निजी उद्यम के दम पर वृहत्तर समाज

में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाले इन समूहों का

विश्वबोध आधुनिकता में पगे शिक्षित वर्ग का विश्वबोध

नहीं है।

असल में, तकनीक, पूंजी और राजनीतिक सत्ता की

अराजकता से जन्मे अनिश्चय के बीच हर व्‍यक्ति किसी

निश्चित या स्थिर सहारे की तलाश में है। मिसाल के तौर

पर, आधुनिक विचारों में पले-बढ़े और संपन्न लोग

कृष्णमूर्ति की ओर चले जाते हैं तथा जिन्हें पूंजीवाद का

उत्सव मनाते-मनाते किसी तरह का अपराध बोध सताने

लगता है, वे ओशो की लीक पकड़ लेते हैं। इनके बरक्‍स

जिन लोगों को संपन्नता, पैसा, सुख के आधुनिक

उपकरण, सुंदर घर जैसे प्रतीक हाल फिलहाल हाथ लगे

हैं, वे सिर्फ स्वर्ग चाहते हैं या दूसरी तरह से कहें तो नरक

के दंड से बचना चाहते हैं। क्‍या गुरु केंद्रित संप्रदाय इस

देशी मध्यवर्ग को स्वर्ग का भरोसा देकर एक तरह की

सामाजिक गैर-बराबरी को बढ़ावा नहीं दे रहे?

3.6.10

ढेबरी में तेल नइखे, मड़ई अन्‍हार बा


छह महीने से ब्‍लॉलिखी से बाहर था. कई मर्तबा मन हुआ कि घोषणा ही कर दिया जाए कि अब हफ्तावार का शटर डाउन कर रहा हूं. पर लगा, न ऐसा न किया जाए. दुकान रहेगा तो सामान तो आता-जाता रहेगा. मंदी और तेज़ी तो शाश्‍वत सत्‍य है. देखिए, तब विवेक से काम लिया. ठीहा जमाए रखा. आज सामान भी ले आया हूं. मित्रों, छात्र आंदोलन के ज़माने में अपने रुम मेट भूषणजी के साथ मिलकर कुछ लिखा था. लिखते वक्‍़त ही गुनगुनाकर धुन भी निकाल ली थी हमलोगों ने. अगले रोज़ भोजपुरी गीत के तौर पर दोस्‍तों को सुनाया. 'सांस्‍कृतिक मंडली के साथियों ने फैसला सुनाया, 'कुछ भी हो, पर हमारा लिखा गीत नहीं है'. हमारे अंदर का रचनाकार मर ही गया, समझिए. बाद में कुछ मित्रों ने बताया कि झारखंड के बीड़ी पत्ता मजदूरों में हमारी ये पंक्तियां बेहद लोकप्रिय है... बहरहाल, फिर से याद्दाश्‍त बटोरकर पंक्तियों को जोड़-जाड़ कर आपके लिए लाया हूं. अपनी राय दीजिएगा. और हां, कोशिश रहेगी कि अब थोड़ा नियमित हो जाउं.

सुनी पंचे सुनी पंचे बड़ी-बड़ी बात बा
ढेबरी में तेल नईखे मड़ई अन्हार बा

कॉलेज के हालत देखीं बढ़त जाले फिसिया
कइसे पढाइब लइका सुझे ना जुगतिया
शिक्षा के नाम पर केसरिया बुखार बा
ढेबरी में तेल नइखे, मड़ई अन्हार बा

राउर लइका डिग्री लेके खोजता नौकरिया
नौकरी न पावे बीतल सगरी उमरिया
नौकरी पर उनकर बपौती अधिकार बा
ढेबरी में तेल नइखे, मड़ई अन्हार बा

खेत में के बीया सुखल सुख गइल धनवा
कान्हे कुदाली ले के रोवता किसानवा
अब त पेटेंटो एगो नया जमीदार बा
ढेबरी में तेल नइखे मड़ई अन्हार बा

घर में से निकलल दूभर छूटल पढ़इया
हाथे थमावल गइल कलछुल कढ़हिया
सीता के नाम पर गुलामी ठोकात बा
ढेबरी में तेल नइखे मड़ई अन्हार बा

उठी भइया उठी बहना फेरे खातिर दिनवा
आयीं साथे चली तबे बदली कनूनवा
इनन्हीं से बात कइल बिलकुल बेकार बा
ढेबरी में तेल नइखे मड़ई अन्हार बा


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25.11.09

चैनलों की फुसफास

बंबई में लियोपोल्‍ड कैफे में शिवसेना की हुड़दंग पर विनीत ने आज एक पोस्‍ट लिखा है. कुछ तकनीकी दिक्‍कत की वजह से मेरी राय वहां पोस्‍ट नहीं हो पा रही है, लिहाज़ा यहां आपके साथ साझा कर रहा हूं:

क्‍या कहते हो भैया इसी एनडीटीवी को किसानों का प्रदर्शन शहर में अव्‍यवस्‍था फैलाता दिखता है! भाई शिवसेना या किसी भी सेना द्वारा भड़काए जाने वाले दंगे-फसादों का मैं भी घोरविरोधी हूं. पर कम से कम अपने विवेक को खुला रखता हूं कि अंध शिवसेना विरोध या अंध मनसे विरोध के चक्‍कर में बेहद महत्तवपूर्ण मसलों पर निगाह डालने से मेरी आंखें इनकार न दे.

किसानों के प्रदर्शन से शहर में अव्‍यवस्‍था फैलने के पीछे तर्क ये दिया गया कि प्रदर्शनकारियों ने जमकर शहर में उत्‍पात मचाया, सरकारी और निजी संपत्तियों को नुक्‍शान पहुंचाया, आदि-आदि. मैं उनकी बातों से इस बात से सहमत हूं कि हां, प्रदर्शनकारियों ने वैसा किया. पर सवाल ये है कि क्‍या सारे प्रदर्शनकारी हुड़दंग में शामिल थे? चलिए, इससे भी क्‍या हो जाएगा ... पर क्‍या उनकी मांग नाजायज़ थी, क्या देश के दूर-दराज़ से लोग बड़ा खुश होकर आते हैं दिल्‍ली में प्रदर्शन करने, जब प्रदर्शनकारी लाठी खाकर दर्द सहलाते जाते हैं तब कौन अव्‍यवस्‍था फैला रहा होता है और कौन निरंकुश? पंकज पचौरी और उनके सानिध्‍य में पत्रकारिता करने वालों को ज़रा इन बातों पर भी विचार करना होगा.

'हमलोग' वाले शीर्षस्‍थ पत्रकार साहब ये बता पाएंगे कि अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान जिस जंतर-मंतर पर 'उत्‍पात' मचा रहे थे वहीं देश भर के ग़रीब-गुर्बा और आदिवासी जमा होकर अपने ज़मीन पर अपने हक़ के लिए प्रतिरोध सभा कर रहे थे, उनकी नेता मेधा पाटकर भी कम कद्दावर नहीं थी, क्यों नहीं उस पर अपना कैमरा घुमवा लिए?

'आइबीएन लोकमत' के दफ़्तर में जब लंपटों ने हमला किया था तब कैसे छाती पीट-पीट कर लोकतंत्र को बचाने की गुहार कर रहे थे, पंकज बाबु ने कहा था कि ब्रॉडकास्‍ट एडिटर्स गिल्‍ड (या एसोशिएशन ने मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा इस वक्‍त) ने यह तय किया था कि मीडिया वालों को बुला कर की जाने वाली कार्रवाई को कवर नहीं किया जाएगा. बड़ी अच्‍छी बात है, कितनी बार पालन किया आपने!

भैया, यही लोग हैं जो 'राष्‍ट्रीय महत्त्‍व' की शिल्‍पा-कुंदरा की शादी को हेडलाइन बताते हैं और उस पर स्‍पेशल पैकेज लेकर आते हैं.

भैया, काहे भोलेपन से भारी सवाल की ओर इशारा करते हो. ये चैनल-वैनल एक बड़ी साजीश का हिस्‍सा हैं. वैसे किसी मसले या वैसी किसी नीति की तरफ़ ये इशारा नहीं करेंगे जिससे लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है. पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसान या हों या विदर्भ के या फिर बलिया या सीतामढ़ी के, या देश भर के आदिवासी: उनके सवालों में किसी भी मीडिया की दिलचस्‍पी नहीं है. प्रतीक के तौर पर महंगाई का जिक्र करते कभी इनके लोग ओखला या आज़ादपुर मंडी से आलू-प्‍याज़ के भाव बताते दिख जाएंगे, कभी-कभार किसी मध्‍यवर्गीय कॉलोनी की इटालियन मार्वल ठुके किचेन से किसी महिला का बिगड़ता मासिक बजट सुना देंगे. बस. खुर्जा, सोनीपत, धुल्‍लै, सहारनपुर, शाहजहांपुर, पासीघाट, डिमापुर, कोकराझार या डेहरी ऑन सॉन में इस महंगाई से पहले भी कैसे लोगों की कमर टेढी हो रही थी - कभी न बताया न बताएंगे.

चाहिए मसाला, चटपटा मसाला. ऐसा कि डालें तो चना जोर गरम बन जाए. ग़रीब, ग़रीबों की समस्‍याएं और उनकी जद्दोजहद को आज का मीडिया और खासकर कोई चैनलवाला कभी स्‍टोरी का प्‍लॉट नहीं बनाता. अपवाद और मिसाल भले गिना दें, गिना ही सकते हैं. बस.

आतंकवाद, शिवसेना, ठाकरे फैमिली, फिल्‍म, फैशन, लाइफ़-स्‍टाइल, बाज़ार, राहुल बाबा, यु-ट्यूब, चमत्‍कार, बाबा-ओझा से इतर सोचना भी इन्‍हें पहाड़ लगता है.

आतंकवाद और पाकिस्‍तान न होता तो 24 घंटे वाले चैनलों की कैसी दुगर्ति होती, कल्‍पना की जा सकती है. ऐसे में भावनाओं, संवेदनाओं, हत्‍याओं, कुर्बानियों और संबंधों का बाज़ारीकरण बड़ा सहारा देता है.

मैं तो अब भी इस 'भ्रम' में रहूंगा कि नागरिक हूं, और स्‍कूलिया ज्ञान पर भी अभी भरोसा क़ायम है. इसलिए उम्‍मीद है कि शायद कभी अंगूलीमाल से इनकी भेंट होगी और ये मरा-मरा से राम-राम में बदलेंगे. गलत कहा?




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16.11.09

सफ़र के कार्यक्रम में आ रहे हैं यश मालवीय

सफ़र के अनियमित श्रृंखला आमने-सामने में इस दफ़ा यश मालवीय अपने कुछ गीत सुनाएंगे और फिर प्रख्‍यात कवयित्री अनामिका के सानिध्‍य में श्रोता उनसे सीधी बातचीत करेंगे.
सफ़र द्वारा पिछले साल आरंभ किया गया यह कार्यक्रम सचमूच नायाब है, इसलिए कि इसके तहत कोई भी रचनाकार न केवल समय‍ निकाल कर फूर्सत से अपनी पसंदीदा रचनाएं सुनाते हैं और फिर लोगों को उनसे उनकी रचनाओं के साथ-साथ उनके रचना कर्म और जीवन के विभिन्‍न पहलुओं पर भी बातचीत करने का मौक़ा होता है. कोशिश यह है कि इसके ज़रिए लोग न केवल रचनाओं के मार्फ़त उन्हें जानें बल्कि उनके व्‍यक्तित्‍व और व्‍यवहार को भी जानें. सफ़र को यह ख़ुशी है कि इस श्रृंखला की शुरुआत समकालीन पसंदीदा रचनाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव जी द्वारा लघुकथाओं और उनकी कुछ चुनी हुई कविताओं के पाठ के साथ हुआ था और साथ में थीं अर्चना वर्मा. वज़ीराबाद की संकरी गलियों से गुज़र कर राजेंद्रजी, अर्चना जी और उनको जानने-सुनने के इच्‍छूक चालीस-पैंतालीस लोग सफ़र के दफ्तर में इकट्ठा हुए थे. उसी सफलता से प्रेरित हो कर सफर ने इस बार अपने ज़माने के पसंदीदा नवगीत लेखक तथा लोकप्रिय कवि श्री यश मालवीयजी को आमंत्रित किया है. यश मालवीय ने उदयप्रकाश के उपन्‍यास पर आधारित फिल्‍म 'मोहनदास' के लिए बड़े सुंदर गीत लिखे हैं. मेरे खयाल से अपने जमाने में शायद ही कोई कवि या गीतकार होंगे जो अका‍दमियों या सभागारों से बाहर जाकर कविता पाठ करते होंगे, यश भाई उस लिहाज़ से बहुत बड़े अपवाद हैं. इलाहाबाद में लगने वाला माघ मेला का पंडाल हो, या दिल्‍ली में अंबेडकर जयंती पर सामुदायिक पार्क में खुले आसमान के नीचे होने वाले कार्यक्रम: उनकी गीतें लोगों को थम कर सुनने को मजबूर करती रही हैं.
उम्‍मीद है दिल्‍ली में रहने वाले साहित्‍यप्रेमी और सृजनशील लोग इस मौक़े का लाभ ज़रूर उठाएंगे.

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9.11.09

हिंदी और क्षेत्रीय चैनलों के संबंधों की पड़ताल हो

महुआ पर भोजपुरी के पहले रियल्‍टी शो 'सुरसंग्राम' के फिनाले के बाद मैंने अपनी राय भोजपुरी में लिखने की कोशिश की थी. उस पर ब्‍लॉगर मित्र विनीत ने फेसबुक पर लगाए हमारे लिंक पर अपनी राय कुछ इस तरह ज़ाहिर की है. उनकी राय पर गंभीरतापूर्वक विचार होना चाहिए. क्‍योंकि टेलीविज़न, भाषा और उससे उपजती संस्‍कृति पर विनीत लगातार लिख पढ़ रहे हैं. हाल के दिनों में विभिन्‍न मंचों से भी उन्‍होंने यह प्रश्‍न उठाना शुरू किया है. भारत में टीवी को लेकर गंभीर लिखापढ़ी इतनी कम हुई है कि अकसर लोग उनकी बात सुन कर भौंचक रह जाते हैं या फिर 'टीवी ने सर्वस्‍व लूट लिया है'वाले अंदाज में खीस निकालते हुए आपे से बाहर हो जाते हैं. और तो और बुद्धिजीवियों की एक जमात भी इसमें शामिल है. मैं विनीत की उस टिप्‍पणी को यहां आपसे साझा करते हुए यह उम्‍मीद करता हूं कि इस सवाल पर चर्चा आगे बढ़ाने में आपका योगदान मिलेगा.

माफ कीजिएगा,भोजपुरी में लिखी पोस्ट का जबाब हिन्दी में दे रहा हूं। मैं नहीं जानता इसमें लिखना। अच्छी लगा कि आपने महुआ चैनल के जरिए एक बनती संभावना को पहचानने की कोशिश की है। मैंने नया ज्ञानोदय के अगस्त अंक में इसी मिजाज को लेकर एक लेख लिखा- टेलीविजन विरोधी आलोचना और रियलिटी शो। आपकी महुआ की इस संभावना को हिन्दी के तमाम रियलियी शो में देखने की कोशिश की थी और कई लोगों के बहुत ही उत्तेजित फोन आए। जाहिर सी बात है आप जिस रुप में महुआ को देख रहे हैं,इसी तरह से वो हिन्दी के रियलिटी शो देखने-समझने के पक्ष में नहीं थे। एक सवाल आपसे भी पूछना चाहता हूं कि क्या जिस नजरिए से आपने महुआ के इस रियलिटी शो को देखा और विश्लेषित किया है क्या हिन्दी रियलिटी शो को भी इसी रुप में भी विश्लेषित किया जा सकता है? क्योंकि सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर वहां भी कई ऐसे ही रेफरेंस मिल जाएंगे।
पोस्ट पढ़ते हुए लगा कि आप चैनल के एफर्ट को शायद इसलिए सपोर्ट कर रहे हैं कि वो भोजपुरी में है। कहीं-कहीं आपके बचपन का लगाव और नास्टॉल्जिक एटीट्यूड। नहीं तो हिन्दी चैनलों की तरह इसमें भी फूहड़ता,एक किस्म का सस्तापन है। मैं इसे किसी भी रुप में गलत या वकवास नहीं मानता लेकिन इस पर बात किया जाना इसलिए जरुरी है क्योंकि यही हिन्दी रियलिटी शो के आलोचना का आधार बनता है। इसलिए मुझे लगता है कि इस पोस्ट के जरिए क्षेत्रीय भाषाओं के कार्यक्रमों और चैनलों और हिन्दी चैनलों के बीच एक तुलनात्मक अध्ययन की गुंजाइश बनती है.

6.11.09

जीत गइल भोजपुरिया

भाई मोहन राठौर आ आलोक कुमार के ढेर सारा बधाई! आज भोजपुरिया समाज आपन दू गो सितारन पर ठप्‍पा लगा देहलस. उत्तर प्रदेश के भाई मोहन राठौर आउर बिहार के आलोक कुमार संयुक्‍त रूप से विजेता घोषित कइल गइलन महुआ चैनल के सुर सग्राम कार्यक्रम में. हम त भोजपुरी आउर मैथिली के बीच बज्जिका नामक बोली में पैदा भइल बानि लेकिन अड़ोसी पड़ोसी आ संगी साथी के जौरे रह के भोजपुरी से हमार परिचय भइल. जब से महुआ चैनल शुरू भइल तबे से हमार इ कोशिश रहे कि कम से कम सुर संग्राम जरूर देखिं. आउर आज गांधी मैदान पटना से जब लाइव टे‍लीकास्‍ट भइल सुर सग्राम के फिनाले के, त दारू पिनाई बीचे में छोड़ के टीवी के आगे आ गइनि.
हमरा नइखे मालूम के जे हम लिख S तानि उ भोजपुरी ह कि ना, बाकी एतना जरूर कहेब कि महुआ के इ प्रोग्राम अपना किसिम के अलग कार्यक्रम रहे आउर बहुत मजेदार रहे.
हां, इ जरूर कहेब कि आज ग्रेंड फिनाले के नाम पर बंबइयो लटका झटका जरूर भइल., मजेदार बात इ कि अंतिम दुनो विजेता में से कौनो नामचीन ना रहस आज से पहिए. दिलदारनगर, यू पी के निवासी मोहन के बाबूजी कपड़ा के फेरी लगावलन जबकि लक्‍खीसराय, बिहार के रहे वाला आलोक कुमार के परिवारो के आज से पहिले कोई खास ररूख ना रहे. पर आज से इ दुनु जना और इनकर परिवार के समाज में एगो स्‍थान तय हो गइल. हमरा पूरा विश्‍वास बाटे कि दुनो जना भोजपुरी समाज के काफी आगे ले जइहन, विशेष करके भोजपुरी संगीत के.
हमार खयाल बा कि भारतीय रियल्‍टी शो के इतिहास में शायदे कबहुं अइसन होइल होखे कि एक के जगह दू जना के विजेता घोषित कइल गइल हो. कार्यक्रम के संचालक रवि किशन कार्यक्रम के समापन वेला में कहलन कि दुनो कंटेस्‍टेंट के पक्ष में आइल वोट में ढाई प्रतिशत के मार्जिन रह गइल, आउर एह बात के ध्‍यान में रख के महुआ चैनल के मालिक श्री तिवारीजी इ तय कइलन कि दुनो जना के विजेता वाला रकम मिली, माने दुनो जना के पचीस- पचीस लाख. केतना सुंदर विचार, केतना सुंदर प्रस्‍थापना. आज एह बजार के जमाना में जहां चवन्‍नी खातिर मार हो जाला, लूट मचल बा चारो तरफ; मनोरंजन त छोडिं, खबर देखावे-सुनावे के नाम पर धंधा करे वाला चैनल आधा घंटा के पैकेज में से लगभग आधा समय विज्ञापन पर खर्च करके माल कमावे के 'धर्मसूत्र' में लागल बाड़न, इ महुआ चैनल एगो मिशाल कायम कर दिहलस. पचीस लाख कौनो छोट रकम नइखे. आज तक के इतिहास में अइसन ना भइल.
सुर संग्राम के आपन अनुभव के आधार पर कहे के चाह S तानि कि मनोज तिवारी भोजपुरिए के ना बल्कि समस्‍त कला विरादरी में अद्भूद हवन. तत्‍काल, तत्‍क्षण कौनो विषय पर गीत बना के सुनावे के अद्भूद क्षमता के मालिक हवन मनोज. उन कर विचार, उन कर रहन-सहन से हो सकेला कि हम सहमत ना होखिं, बाकी उनकर इ गुण्‍ा के हम कायल हो गइनि.
आज के प्रोग्राम पटना के गांधी मैदान में भइल. उहे गांधी मैदान जहां जेपी के लोकनायक के उपाधि से नवाजल गइल, जेकरा बड़का बड़का आंदोलन के आरंभ के गौरव हासिल बा; आज ओह मैदान पर लालू प्रसाद यादव आउर रामविलास पासवान जैसन विभूतियन के सामने इ कार्यक्रम भइल. फेर कहेब कि इ पोलिटिशियन के काम-धंधा आउर आचरण से बहुत लोगन के दिक्‍कत होई बाकी इ हो सांच बा कि इ लोग के हिंदुस्‍तान के राजनीति में आउर समाज में एगो हैसियत बा. लोग एक आवाज पर आजो ओहिं गई दौड़ जाला जइसे गांधी और जेपी के आवाहन पर कबहूं दउड़ जात रहे. दुनो जना बैठल रहलें कार्यक्रम के समापन तक. बहुत शा‍लीनता से, कौने हबड़-दबड़ के बिना. ओ‍हु से ज़्यादा ध्‍यान देवे वाला बात इ कि कउनो तरह के अगधड़-भगदड़ ना भइल. सब शांति से निबट गइल. आउर देस-दुनिया के सामने अब इ एगो मिशाल बन गइल. बाकी मुखिया नितीशोजी के आबे के घोषणा भइल रहे मंच से, बाकी अंतिम समय में पता चलल कि तबियत ढीला होए के वजह से उ ना पहुंच सकलन. हो सकता कि तबीयत साचो में ठीक ना रहल होई, लेकिन लालूजी और रामविलासजी के उपस्थिति के वजह से अगर उ ना आइल होखस त हमरा विचार से आपन मा‍टी के साथ इ उनकर न्‍याय ना कहल जा सकेला. उनकरो मालूम होई कि पटना कौनो बंबई चाहे दिल्‍ली नइखे जहां रोजे अइसन कार्यक्रम होला. ओहू में कौनो बोली, कौनो संस्‍कृति (मनसे आउर ठाकरे वाला ना) के लेके अगर कुछ सुगबुहाट हो रहल बा त ओमे जरूर साथ रहे के चाहिं, इ हमार विचार बा.
हमार विचार से इ बहुत निमन शुरुआत कहल जा सकेला जहवां आपन माटी, आपन समाज से लोगन के इ मौका मिलल और कोई सितारा निकल के देस-दुनिया के सामने आ सकल.
टीवी पर देखाए जाए वाला कार्यक्रम, विशेषकर हिंदी मनोरंजन आउर समाचार चैनल के रंग ढंग के लेके हमरा मन में कोई विशेष श्रद्धा नइखे. जहां, नाग-नागिन, सांप-संपेरा, भू‍त-प्रेत से लेके यू ट्यूब तक से उधार लेहल प्रोग्राम आउर रियलिटी शो से पूरा के पूरा पैकेज देखावल जाला, उहां महुआ चैनल में काफी कुछ ओरिजन माल मिलेला देखे के. सुर संग्राम के अलावा 'भौजी नं. 1' जइसन कार्यक्रम शुरू कर के महुआ भोजपुरी समाजे में ना बल्कि बिहार-यूपी आउर ओकर प्रभाव वाला क्षेत्रन में आपन एगो विशेष जगह बना लेले बा. आउर इ प्रयास के जेतना सराहना आउर प्रशंसा कइल जाव, कमे होई.
अंत में फेर एतने कहे चाह S तानि कि सुर संग्राम के मार्फत महुआ चैनल बिहार-यूपी के देहात के लडिकन-लइकिन में आपन हुनर के लेके एगो आत्‍मविश्‍वास जगावे के काम कइलस ह. तारीफ होए के चाहिं. हर रियलिटी शो बहुत सुंदर और रियल ना होखेला. तनि उ 'लिटिल चैंप्स' के याद करिं, आउर याद करिं के जे दुनो बच्‍चा-बच्‍ची ओहमें एंकरिंग करत रहें उनकर बचपनाकहां हेरा गइल रहे. हम एहूं भ्रम में नइखिं कि महुआ में सब ठीके होई. काहे भइया, बजार के नियम त S सब पर बराबरे नूं लागू होई! हां, इ जरूर सवाल बाटे कि बजार के एहिं गई छूट्टा सांढ नियर हरहराए दिहल जाई कि ओके काबू में लावे के उपायो पर विचार होए के चाहिं. इ हमार जमाना के एगो बड़ा सवाल ह, आउर एकरा पर विचार होखे के चाहिं. लेकिन एह बजार में रह के भी अगर कहीं इंसानी मूल्‍य दिखाता, तS ओकर सराहना करे में कौनो हरज बाटे!! मोहन आउर आलोक भाई के बहुत बहुत मुबारकबाद आउर जीवन में सफलता खातिर हमार शुभकामना. सुर संग्राम कार्यक्रम से जुड़ल तमाम कलाकर, टेक्निशियन, सहयोगी, आयोजक, प्रायोजक आउर महुआ चैनल के तमाम स्‍टाफ के धन्‍यवाद.
भोजपुरी में लिखे के पहिला प्रयास बा, गलती-सलती क्षमा करेब.
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