स्वजनों से मुख मोड़ जो,
करते सुख का भोग.
जीवन में क्या चैन से,
रह पाते वे लोग ??
---oxo---
- विजय तिवारी " किसलय "
HINDI SAHITYA SANGAM JABALPUR, MP, INDIA

इस अवसर पर ज्ञान जी ने साहित्य की निरंतरता की गति के सन्दर्भ में कहा कि परसाई के बाद स्थिति सोचनीय है. साहित्य की लगभग सभी विधाओं का यही हाल है. प्रो. अरुणकुमार ने साहित्यकार से जनप्रिय साहित्यकार और फिर जनता का साहित्यकार के रूप में परसाई जी को प्रस्तुत किया. पूर्व सांसद श्री रामेश्वर नीखरा ने अपने विद्यार्थी कालीन संस्मरण सुनाते हुये बताया कि वे उनका कालम " सुनो भाई साधू " अक्सर पढ़ा करते थे. विवेचना के हिमांशु राय ने परसाई की कृतियों पर आधारित अनेक संस्मरणों का उल्लेख किया प्रो. हनुमान वर्मा ने अपने मित्र परसाई की विभिन्न व्यक्तिगत बातों का उल्लेख करते हुये उन्हें जनता की आवाज को उठाने वाला और जनता के दुःख-दर्द को लेखन और अखवार के माध्यम से उजागर करने वाला सचेतक बताया.