Friday, September 3, 2010

जीवित हूँ मैं, मुर्दा नहीं....

तूफ़ान उठे,
बिजली गिरी,
झुकी नहीं,
पर नज़र मेरी....

बढ़ता चला,
मैं राहें बना,
गढ़ता गया,
सपना नया....

धरती थकी,
पर कदम नहीं,
पा लूंगा मैं,
मंजिल नयी...

बेदम नहीं,
बेबस नहीं,
जीवित हूँ मैं,
मुर्दा नहीं....

जयंत चौधरी
माँ दुर्गा को समर्पित
१२ भद्र / ०२ सितम्बर 2010
(बैठे बैठे एक ख्याल आ गया ऑफिस में...)



जय राधा कृष्ण


हमारी प्रिय बेटी मेहर राधा रानी के रूप में।
दादी के दिए वस्त्र और नानी के दिए श्रृंगार और सबके प्यार से बनी-ठनी...



हमारी बेटी मलिका अपने प्रिय भगवान् कृष्ण के रूप में।




अनुपम जोड़ी...

Saturday, August 28, 2010

मातृभाषा - 1

माननीय श्रोताओं, आप सब को मेरा नत-मस्तक प्रणाम,

आज का विषय बहुत सामयिक है।
भाषा किसी भी प्राणी की मूलभूत आवश्यकता होती है।
इसी से हम और आप अपने भावों और विचारों को व्यक्त कर सकते हैं।
सबसे अहम् बात तो यह है कि, मानवों की प्रगति भाषा विकास के कारण ही संभव हो सकी है।
यह तो सब जानतें हैं कि ज्ञान और विज्ञान को भाषा के बिना बढ़ाया ही नहीं जा सकता।

भाषा के महत्त्व को स्थापित करने के बाद आइये इस विषय पर विचार करे कि मातृभाषा क्या है।
सर्वप्रथम मैं कहना चाहता हूँ कि, मातृभाषा, मात्र भाषा ही नहीं है, किन्तु उससे भी बढ़ कर है।
मातृभाषा शब्द दो विभिन्न शब्दों से मिल कर बना है... मातर और भाषा....
याने कि मातर या दूसरे शब्दों में माँ या माता की भाषा...

हमारे जीवन में माँ का कितना बड़ा स्थान है, यह व्यक्त करने कि आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि, उसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता, और वैसे भी हर इंसान इस बात को अच्छी तरह से जानता है।
माँ से जुड़ी हर चीज़, एक विशेष स्थान पर होती है। मातृभाषा उसमें से सर्वप्रथम है।

हमारे जन्म लेने के बाद, माँ हमसे जिस भाषा में बात करती हैं, वोही तो माँ की भाषा होती है, वही मातृभाषा होती है।
वो भाषा शिशु की प्रथम भाषा होती है।
पहली बार जिन शब्दों को शिशु सुनता है, जिस भाषा में माँ उससे अपना प्यार और स्नेह व्यक्त करती है, उस भाषा का स्थान कोई और भाषा कैसे ले सकती है??

मातृभाषा -२

लेकिन क्या मातृभाषा का महत्त्व केवल माँ के कारण ही है?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और उसे समाज में रहने के लिए भाषा की आवश्यकता होती ही है।
बिना भाषा के समाज का निर्माण हो ही नहीं सकता। पशु पक्षी भी भाषा की सहायता से ही समूह में रहते हैं।
उसके बिना समाज या समूह का निर्माण, पालन और पोषण संभव ही नहीं है। हमारी एकता में भी यही सहायक है।

आम तौर पर हमारी मातृभाषा हमारे आसपास के लोगों की भी भाषा होती है। किन्तु कभी कभी स्थान परिवर्तन के कारण मातृभाषा और स्थानीय भाषा अलग अलग हो सकती हैं। उस अवस्था में तो मातृभाषा का ज्ञान और उपयोग और भी महत्व पूर्ण हो जाता है। क्योंकि यही एक चीज हमें अपने परिवार, पूर्वजों, संस्कार और सभ्यता से जोड़े रखती है. उस समय मातृभाषा कम उपयोग के कारण पलती डोर जैसी भले हो जाए, किन्तु हमें पराये आसमान में उड़ते पतंग से लगी डोर की तरह अपनी धरती से बांधे रखती है।

इसके अलावा मानव की भावनाएं जगाने का सबसे अचूक उपाय उसकी मातृभाषा ही है। इस संसार में हजारो भाषाएँ हैं, और अनेको बार हमें दूसरी भाषायों का उपयोग भी करना पड़ता है, दूसरों से बात करने के लिए। किन्तु जब हम अपनी भाषा, मातृभाषा सुनते हैं तो हमारा ना केवल मस्तिषक, किन्तु ह्रदय भी उसे सुनता है। हमें उस व्यक्ति के प्रति अधिक प्रेम और विशेष झुकाव हो जाता है जो हमारी मातृभाषा में बात करता है. शायद यही कारण है की बहु-राष्ट्रीय कंपनियां भी, अपने सामान का विज्ञापन उस स्थान की 'मातृभाषा' में ही कराती हैं.

एक और ध्यान देने लायक बात है की हर व्यक्ति विशेष परिस्थितियों में, जैसे अत्यधिक प्रेम, क्रोध, दर आदि में अपनी मातृभाषा में ही बात करता है... क्योंकि वो उसके मन की आवाज होती है। याने किसी के मन तक सीधे बात करनी हो तो उसकी मातृभाषा में ही करना चाहिए। यह नुस्खा बड़े बड़े व्यापारियों को भी आता है।

मातृभाषा ज्ञान अर्जित करने के लिए भी उपयोगी हो सकती है। आज के विज्ञान और तकनीक के जमाने में भी कई देश, जैसे फ्रांस, जर्मनी, जापान, चीन और रूस अपनी मातृभाषा में ही विज्ञान और तकनीक पढ़ते, सीखते और विकसित करते हैं॥ और ये देश किसी भी द्रष्टि से संसार में पीछे नहीं हैं।

आखिर में यह भी याद दिलाना चाहूँगा कि अपनी जड़ों, याने अपने परिवार और संस्कार पर हर इंसान को गर्व होना चाहिए, बिना उसके इंसान अधूरा रह, कटी पतंग जैसा भटकता है। उस जड़ तक पहुँचने कि डोर केवल मातृभाषा है.....

जीवन में जितनी महवपूर्ण माँ हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण है उसकी भाषा, याने कि मातृभाषा...

Wednesday, July 7, 2010

~ कबहू बुरा ना बोलिए... ~ जयंत


बुरा ना कबहूँ बोलिए, चाहे क्रोध ताप चढ़ जाय
वाणी ऐसन बाण है, जो कबहूँ व्यर्थ ना जाय

(चाहे कितना भी क्रोध जाए, बुरे वचन नहीं बोलने चाहिए। वाणी के बाण, कभी व्यर्थ नहीं जाते। ये बोलने वाले और सुनने वाले दोनों को चोट पहुचाती है। बोलने वाला इसलिए, क्योंकि उसके जो भी अच्छा किया वो उसके बुरे वचनों से नष्ट हो जाता है,॥ और सुअने वाला तो घायल होता ही है॥)

हिरदय को वाणी बिंधे, नहि बाणन में वो घात॥
अवसर पे ना रोके तो, बरसन रहे पछतात॥
(वाणों में ह्रदय को आघात पहुंचाने की वो शक्ति नहीं होती, जो वाणी में होती है॥ वाणों का घाव समय आने पर ठीक हो जाता है... किन्तु वाणी काप्रहार समय समय पर चुभता रहता है.. यदि समय रहते उन शब्द-वाणों को ना रोका गया, तो उसने होने वाले चोट/अनिष्ट के कारण, वर्षों तकपछताना होता है...)

वाणी से जो मन छिदे, धागा नहि सिल पाय
पंख कटे फिर से सिले, पाखी उड़ नहीं पाय
(जो मन वाणी से छिद गया हो, उसे धागा भी नहीं सिल पाता। उसकी उमंग, प्रेम और प्रसन्नता उस पंख कटे पक्षी की जैसी हो जाती है, जो उन पंखों केसिले दिए जाने के बाद भी जो उड़ नहीं पाता॥)

~जयंत चौधरी
१३ आसाढ़ / जुलाई
(माँ सरस्वती की प्रेरणा से, मेरे मित्रों अर्चना और मनीष को एक भेंट..)



Sunday, July 4, 2010

* सीने में जब आग जलेगी *

सीने में जब आग जलेगी,
फौलाद तभी पिघलेगा...

भट्ठी में जब लपट उठेगी,
नस नस में फिर वो बहेगा...

मन में वो द्रढ़ता लाएगा,
बाहों की शक्ति बनेगा...

पर्वत भी आकर टकराएँ,
उनका विध्वंस करेगा...

अग्नि पथ पर बढ़ने वाले,
कदमों को ना रुकने देगा...

कठिनाई की तूफानी बारिश में,
यदि
उस आग को ना बुझने देगा ...

(तो,)
जल
कर, तपकर, चलकर, लड़कर,
एक दिन, लक्ष्य
को तू पा लेगा...


* माँ दुर्गा को समर्पित *
~ जयंत

Wednesday, June 16, 2010

** काँपते हाथों में **

है यकीन मुझे,
जानता हूँ, कि
तेरे काँपते हाथों में,
जान अभी बाकी है...

माना बहुत है,
पर, तू भार उठा,
जोर लगा, कि
अरमान एक बाकी है....

यह जिंदगी,
एक प्याला है,
और मौत,
तेरी साकी है...

पीता चल,
चलता चल,
जब तक,
जाम एक बाकी है....

मधु बहती है,
कविता उड़ती है,
पंखों में थोड़ी
उड़ान अभी बाकी है....

अरमान अभी बाकी है..
थोड़ी जान अभी बाकी है...


जयंत

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