सुदर्शन

(हास्य व्यंग्य पर आधारित ब्लॉग) अब सुदर्शन www.kmmishra.tk पर भी उपलब्ध है .

क्या आप बोर हो रहे हैं ?

Posted by K M Mishra on अगस्त 7, 2010

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मेरा अच्छे से अच्छा मित्र भी दो मिनट बाद दरवाजे की तरफ देखने लगता है जब मैं उसको अपनी ताजी व्यंग्य रचना सुनाने बैठता हूँ या फिर वह मेज के नीचे से अखबार निकाल कर पढ़ने लगेगा या फिर पास बैठे भाई से उसकी पढ़ाई के बारे में पूछने लगेगा । मैं उसका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करूंगा तो एक मिनट बाद कंबख्त को जंभाईयाँ आने लगेंगी । क्या कारण हो सकता है । दो कारण हो सकते हैं । पहला – या तो मैं इतना उच्च, उत्कृष्ट, क्लिष्ट और गंभीर साहित्य का सृजन करता हँ, मतलब कि इतना घटिया लिखता हँ कि सामने वाला बोर हो जाता है या फिर सामने वाले का साहित्य, कला, संगीत से दूर दूर तक कोई नाता ही नहीं है । इस वजह से वह वाकई में मेरी व्यंग्य रचनाओं को नहीं समझ पाया है जो कि गलती से अच्छी लिख दी गई हैं । समाज का कितना ह्रास हो गया है । लोग साहित्य से दूर हो रहे हैं । मैं साहित्य का सन्नाटा तोड़ने के लियेएक बढ़िया व्यंग्य लिखता हूँ और सुनने वाले की जंभाईयों से जितना सन्नाटा टूट सकता है टूट जाता है ।

जब से सभ्यता का विकास हुआ है आदमी ने बोरियत का अनुभव किया है । बंदर और चिंपाजी बोर होते हैं यह मुझको नहीं मालूम । मैं उनकी भाषा नहीं समझता । फिर वह केबल टी.वी. भी तो नहीं देखते हैं । पुराने समय में जब राजा दरबार, रानियों और नाच गानों से ऊब जाता था तो वह जंग लड़ने चला जाता था । जब जंग से ऊब जाता था तो वापस आकर रानियों और नाच गानों में व्यस्त हो जाता था ।

खैर, बड़ा ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि इंसान बोर क्यों होता है ? क्या कारण है ? क्या निदान है ? कम से कम अगर कोई ऐटीबोरियत गोली बन जाये तो यह बहुत बड़ा उपकार होगा साहित्य और साहित्यकारों पर । कोई सुनने वाला मिलता ही नहीं । कारण मनोवैज्ञानिक हैं और इसके कई मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं । एक उदाहरण देता हूं जो कि आपके साथ भी घटता है । मैं क्लास में बैठा फिजिक्स का लेक्चर सुन रहा हँ पर ध्यान पीरियड बाद होने वाले क्रिकेट मैच पर है । विमल नालायक वाईड बाल बहुत फेंकता है । इसको ओवर दिया तो हरवाये बिना नहीं मानेगा ।मन घूरपुर तन सैदाबाद । अब चाहे दुर्रानी सर हलक फाड़ कर बतायें कि इस्केप वेलासिटी के लिये 11.2 मी/से की रफ्तार जरूरी होती है पर मैं मुँह फाड़ कर जम्हाई लूंगा और सोचूँगा कि राधेश्याम की गेंद में वह रफ्तार नहीं जो इस्केप वेलास्टी में है । तो पहला कारण यह है कि जो घटना आपके सामने घट रही है हमारा ध्यान उसमें न लग कर कहीं ओर लगा हुआ है । किसी मजबूरीवश या बंधनवश हम वहाँ विराजे हुये हैं । मजबूरी है जो इस्केप वेलास्टी झेल रहे हैं और पलायन करने के लिये वेग नहीं जुटा पा रहे हैं । इस लिये जंभाईयाँ आ रही हैं ।

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दूसरा कारण और दूसरा उदाहरण । अगला लेक्चर है केमिस्ट्री का । केमिस्ट्री में पिछली बार नंबर पता नहीं कैसे अच्छे आ गये थे । या तो मैं पढ़ कर आया था या उपाध्याय । क्योंकि दोनो ने एक दूसरे की कॉपी टीपी थी । इसलिये मैं केमिस्ट्री का लेक्चर अटेंड करने लगा हँ । पर चतुर्वेदी सर इतना धीरे बोलते हैं कि कुछ पल्ले नहीं पड़ता है । क्या पढ़ा रहे हैं । क्या बोर्ड पर लिख रहे हैं खुद एक पहेली है । मैं बीस मिनट तक दिमाग पर जोर डाले उन्हें वाच कर रहा हँ पर पच्चीसवें मिनट में उदासी का हमला हो जाता है और मैं जंभाईयां लेने लगता हूँ । अर्थात सामने वाली घटना इतनी ढ़ीली है कि वह ध्यानाकर्षक नहीं है और उस पर दिमाग केंद्रित करना एक दिमागी कसरत है जिससे दिमाग थक जाता है और निद्रा की शुरूआति स्थिति का प्रादुर्भाव होता है । झपकी आने लगती है । बोरियत का अनुभव ।

उदाहरण नंबर तीन । मैं अपने तीन मित्रों क्ष,त्र,ज्ञ के साथ बैठा हुआ हूँ । हम चारों अभिन्न मित्र हैं । क्ष,त्र,ज्ञ दर्शनशास्त्र के प्रेमी हैं । अभी भी नालायक दर्शनशास्त्र के किसी सिध्दांत पर भेजा भिड़ाये हुये हैं । पर मेरी यह मुसीबत है कि फिलासफी के दर्शन मात्र से ही मुझे पसीना आता है । पर मैं क्ष,त्र,ज्ञ के प्रेम की वजह से उठ कर जा भी नहीं सकता हूँ । बैठा हूँ और दर्शनशास्त्र के पत्थर सर पर पीट रहा हँ और थोड़ी देर में बोरियत का शिकार हो जाऊंगा अर्थात सामने धटित होने वाली घटना ऐसी है जिसमें आपकी कोई दिलचस्पी नहीं है पर आप उठ कर जा भी नहीं सकते हैं फिर आप क्या कर सकते हैं । कुछ नहीं, आप एक छोटी सी नींद ले लीजिये । खर्र-खर्र ।

कभी-कभी बोरियत एक ही घटना के या क्रिया के बार बार दोहराव के कारण हो जाती है जिसकी वजह वह क्रिया उतनी चित्ताकर्षक नहीं रहती है जितनी की पहली बार थी । एकसी समस्या या एक ही फिल्म को 3 या 4 बार देखने पर या एक ही काम रोज रोज करने पर बोरियत पैदा होती है ।

बोरियत आदमी को अच्छी चीजों से भी हो जाती है । आदमी हर रोज रसगुल्ला खाये तो हफ्ते भर बाद वह रसगुल्ला देख कर भागेगा । केबल टी.वी. के 60-70 चैनल बदलते बदलते बोरियत होने लगती है । बोरियत खाली बैठने से भी होती है । इस प्रकार की बोरियत रिटायर्ड आदमियों को बहुत होती है । अगर उनके पास करने को कोई काम नही होता है या उन्होंने अपने आप को कहीं बिज़ी नहीं रखा तो वे बोरियत का शिकार हो जाते हैं ।

इस प्रकार बोरियत कई प्रकार की होती है । लैक ऑफ कन्सन्ट्रेशन, घटनाओं का दोहराव, खाली बैठना, किसी ऐसी क्रिया में भाग लेना जिसमें आपकी रूचि न हो और अरूचि के कारण दिमाग थकने लगे । या सामने वाली क्रिया इतनी ढ़ीली और बोझिल है कि उसको झेलना एक सजा हो ।

बोरियत से बचने के तरीके क्या हो सकते हैं ?

पहला – कन्सन्ट्रेट हो कर घटनाओं को वाच कीजिये । अधूरे मन से देखने पर बोरियत होगी ।

दूसरा – घटनाओं को और चीजों को इन्जॉय करना सीखिये ।

तीसरा – अपना दायरा बढ़ाइये । उन चीजों में भी रूचि लीजिये जिनसे अभी तक आप दूर थे ।

चौथा – अपने आप को अधिक्तर व्यस्त रखिये और उन क्रियायों में ज्यादा वक्त दीजिये जिन्हें आप पसंद करते हो । जैसे किताबें, कुकिंग, संगीत वगैरह ।

पांच – इसके बाद भी अगर कुछ परिस्थितियाँ या लोग ऐसे हैं जो कि बोरियत के पर्यायवाची है तो तुरन्त चप्पल पहनिये और फूट लीजिये ।

sssssssहाssss (जंभाई) । बहुत बोर किया । अब खत्म करना चाहिये ।

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मैडम का कुत्ता । व्यंग/कार्टून

Posted by K M Mishra on जुलाई 26, 2010


मैडम ने एक बड़ा ही धाकड़, खुंखार, कटखना, नया कुत्ता खरीदा है मगर नाम को लेकर परेशान हैं । टाईगर, शेरू, पैंथर जैसे नाम वो नहीं रखना चाहती हैं । उनको नये जमाने का खुंखार नाम चाहिये । मैं तो कहता हूं इसकी स्वामिभक्ति को देखते हुये सी.बी.आई. नाम बिल्कुल ठीक रहेगा ।=V
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रोजगार के नये अवसर : ज्योतिषी बनिये

Posted by K M Mishra on जुलाई 22, 2010

रोजगार के नये अवसर के पहले भाग को अपने सराहा था और आदेशनुमा निवेदन किया था कि तत्काल दूसरे भाग को प्रकाशित किया जाये जिससे देश में बेरोजगारी की समस्या को व्यक्तिगत स्तर पर दूर किया जा सके । आपका आदेश मानने में मुझे थोड़ी देरी हुयी क्योंकि उसके दूसरे दिन ही एक महत्वपूर्ण घटना घट गयी । जागरण जंक्शन ने मुझे दो नंबर का ब्लागस्टार घोषित कर दिया । अभी कल ही खालिस 24 कैरेट सोने वाले, ओल्ड इज गोल्ड चाचा खुराना जागरण जंक्शन पर ब्लागपति का ताज हासिल करने में सफल हुये हैं । चाचा को बहुत बहुत बधाई लेकिन इस चक्कर में उन्होंने डाट भी खूब खाई । चाची और भतीजी दोनो को चाचा के अभिभावक होने का गौरव प्राप्त है । अमूमन हर शादीशुदा पति की अभिभावक उसकी पत्नी होती है । इट इज द मैटर ऑफ ट्रांसफर ऑफ पावर फ्रांम पैरेन्ट्स टू वाइफ । खैर बात हो रही थी नये रोजगारों की ।

पहले भाग में मैंने आपको होमवर्क दिया था कि अखबार में प्रकाशित होने वाले सभी ज्योतिषियों और तांत्रिकों के विज्ञापनों पर एक नजर दौड़ायें । कई उत्साहित पाठक न सिर्फ विज्ञापन बल्कि उन ज्योतिषियों और तांत्रिकों के दफ्तर तक भी दौड़ लगा चुके हैं । अच्छी बात है । कोई नया धंधा डालने से पहले सर्वे जरूरी होता है ।

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तो मित्रों, यह धंधा चकाचक है । यह टोटली आपकी प्रतिभा पर निर्भर करता हैं कि आप सड़क पर बोर्ड लगाकर हाथ देखते हैं या फिर हवाई यात्रा करके किसी मंत्री के बेडरूम में पसर कर स्कॉच पीते हुये उसकी जन्मकुण्डली बांचते हैं । इधर फुटबाल के महाकुंभ में आपने आक्टोपस बाबा पाल की भविष्यवाणियों और बढ़ते यश का हाल तो देखा ही होगा । बेजानदारू वाला तक उनकी भविष्यवाणियों के आगे बेजान हो गये और दारू में डूब गये । बाबा पाल भविष्यवाणी करते करते इतने थक गये कि उन्होंने रिटायरमेंट की घोषणा कर दी । अच्छा ही किया । अपने देश जर्मनी को सेमीफाइनल में हरवा कर रिटायरमेंट ले लिये वर्ना जर्मनी की फुटबाल टीम वापस लौट कर उनके एक भी बाजू सलामत न छोड़ती ।

मित्रों, कोई नया धंधा स्टार्ट करने से पहले सर्वे जरूरी होता है । आप भी दो चार ज्योतिषियों या तांत्रिकों के ऑफिस जाकर देख आओ । न जा सको तो कोई बात नहीं मैं तफसील से समझाये देता हूँ । आफिस में दो कमरे होने चाहिये । एक रिसेप्शनिस्ट का कमरा दूसरे बाबा मस्तकलंदर का कमरा (एक गुप्त कमरा भी होना चाहिये जिसमें एक बेड पड़ा हो । इस कमरे में पुत्रवती होने का आशीर्वाद प्राप्त करने आयी सुघड़ महिलाओं को गुप्तरूप से दीक्षा दी जायेगी) । रिसेप्शन पर एक हसीन रिसेप्शनिस्ट रखो या फिर मुच्छड़ गैंडे जैसा पहलवान ये आपकी सोच पर निर्भर करता है । अनुभवी बाबा लोग जिनको अपनी प्रतिभा और ज्ञान पर पूरा भरोसा होता है (अपनी छठी इंद्री से जाना जाते हैं कि अब यह ग्राहक लौट कर दुबारा नहीं आयेगा) अपनी फीस काउंटर पर ही जमा करा लेते हैं । फीस आप 100 रू0 से लेकर 1100 रू0 तक रख सकते हैं । काउंटर पर बैठी वह चंचल हसीना अपनी शोख अदाएं दिखाते हुये ग्राहक से कुछ गैर जरूरी सवाल पूछेगी जैसे आपका नाम, कहां से आये हैं, क्यों आये हैं, क्या तकलीफ है, किसको तकलीफ है और किससे तकलीफ है – बेटे, बेटी, पत्नी, सास, साले, साली, सरहज, भाई, भतीजा, रखैल, महिलामित्र इत्यादि । यह सारी जानकारी एक फाईल मे नोट करके वह फाईल बाबा नोटानंद तक आपके पहले ही भेज दी जाती है । कभी-कभी यह जानकारी आपके बगल में ग्राहक बन कर बैठे बाबा श्मशानानंद के पालतू भक्त आप से बात ही बात में पूछ लेते हैं और बाबा जोगियानंद को जाकर बता देते हैं । अब आप अपना नंबर पुकारे जाने पर उठ कर दरवाजे के उस पार जैसे ही पहुंचोगे बाबा त्रिशूलानंद जी सूअरों जैसी हंसी हंसते हुये कहेंगे ”पधारिये देवकीनंदन खत्री जी, क्या हुआ बेटी फिर घर से भाग गयी ! कोई बात नहीं । सब मालूम है मुझे । पहले यह काम एन. सी. आर. में हम भी किया करते थे । अब वो काम अपने चेलों को सौंप दिया है और आप लोगों की सेवा के लिये इस धंधे में उतर आये हैं ।” आप फटी ऑंखों से बाबा करैतनाथ को देखोगे और तड़ से उनके चरणों में दण्डवत । बाबा को तो बिना बताये ही दिल का हाल मालूम है ।

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देखिये मित्रों जितना बड़ा इन्वेस्टमेंट उतना बड़ा प्राफिट । बाबा त्रिपुंडानंद का कमरा ए.सी. होना चाहिये और बाबा को लैपटाप पर पिट पिट करना भी आना चाहिये । असर पड़ता है । फर्स्ट इम्प्रेशन इज दी लास्ट इम्प्रेशन । चाचा खुराना को लैपटाप इनाम में मिल रहा है वो चाहें तो यह धंधा आजमा सकते हैं । चाचा चेहरे से अनुभवी भी दिखते हैं । मैं स्मार्ट फोन लेकर उनको भक्तों की पोलपट्टी देता रहूंगा । आजकल दोनो का समय अच्छा चल रहा है । जब तक पब्लिक की ऑंखे खुलेगी तब हम दोनो 25-30 लाख का नफा समेट चुके होंगे । वो सब बाद की बात है । देखते हैं चाचा की क्या प्लानिंग है ।

अब थोड़ा ज्ञान की बात । दो-चार किताबें ज्योतिष और हस्तरेखाशास्त्र की पढ़नी होंगी । और एक किताब रत्नों के बारे में । ग्राहक को डराने के लिये शनी, राहू-केतू, नीच का मंगल और कालसर्प दोष का उच्चारण्ा बार बार करते रहना होगा । ग्रह शांति के लिये 5000 रू0 से लेकर 51000 रू0 तक की स्कीमें लैपटाप पर तैयार रखनी होंगी । इसके अलावा थोड़ा रत्नों की जानकारी भी होनी चाहिये । जयपुर से कौड़ियों के भाव रद्दी पत्थर थोक में खरीद लीजिये और हर ग्राहक को कम से कम एक पत्थर टिपाने की कोशिश कीजिये । पत्थर के मामले में एक बात मजेदार है कि आम आदमी इसकी कीमत का अनुमान भी नहीं लगा सकता है । पचास पैसे का लाल पत्थर मूंगा बता कर आप 5000 रू में बेच सकते हैं । यकीन नहीं आता । टीवी पर टेलीशापिंग वाले जो नवग्रह पत्थरों की माला या एक पत्थर की अंगूठी 2500 रू से 5000 रू तक में बेचते हैं उसका वास्तविक दाम 50 रू भी नहीं होता है । एक टोटका आप और कर सकते हैं । पहाड़ों से एक बोरा रूद्राक्ष मंगवा लीजिये । एक मुखी से लेकर चौदहमुखी तक के रूद्राक्ष आप चाहे तो भक्तों को फ्री में बांट दे या फिर 1100 से 5100 रू में बेच दें ।

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मित्रों इस लेख में जो ज्ञान में आपको दे रहा हूँ इसकी रिसर्च करने में मेरा अब तक 20,000 रू0 खर्च हुआ है । आपको फ्री में दे रहा हूँ । आपको अगर मुफ्त की चीजों से घृणा टाईप कुछ है तो मेरी कंसलटेंसी फीस के रूप में आप जो भी चाहे 1100 रू0 या 2100 रू0 दे सकते हैं । मैं मना नहीं करूंगा ।

इस धंधे में किसी डिग्री की जरूरत नहीं है । बस अंधविश्वासी और कामचोर पैसेवाले भक्तों की जरूरत है जो सोचते हैं कि फला ग्रह की पूजा कराने से या फला पत्थर पहनने से उनके बिगड़े काम बन जायेंगे । असल में कर्म ही पूजा है । अब बस आप इस व्यंग लेख को पढ़ो और काम पर लग जाओ । अगली कड़ी में एक नये रोजगार की बारीकियों के साथ फिर मुलाकत होगी । टिप्पणी करने मे कंजूसी मत दिखाईयेगा । बोलो बाबा व्यभिचारानंद की जय ।

नोट: बाबा मस्तकलंदर, नोटानंद, श्मशानानंद, जोगियानंद, त्रिशूलानंद, करैतनाथ, त्रिपुंडानंद, व्यभिचारानंद आदि नाम आपकी सहूलियत के लिये दिये गये हैं । धंधा शुरू करने पर आप इनमे से कोई भी नाम अपना सकते है।

Shiva img1100310026_1_1 =>घबरा मत बच्चा । क्या हुआ जो बीवी दोस्त के साथ भाग गयी । अभी वशीकरण मारता हूं, दोस्त की बहन जहां कहीं भी होगी आकर तेरे पांव पर गिर पड़ेगी ।

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रोज़गार के नये अवसर – 1

Posted by K M Mishra on जुलाई 20, 2010

वित्त मंत्री प्रणव दा ने इस बजट में एक करोड़ बीस लाख नये रोज़गार पैदा करने की बात कही है । कारपोरेट सेक्टर कहता है कि ये सारे रोज़गार नरेगा या आंगनबाड़ी जैसी योजनाओं के लिए है जो ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 100 दिन के ही रोज़गार की गारंटी देते हैं । शहरी और शिक्षित युवकों के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं है जबकि आज देश में 20 करोड़ रोज़गार की जरूरत है । तो दोस्तों वित्त मंत्री ने तो बजट संसद में रख कर अपने हाथ झाड़ लिये । अब आप जानो, आपका काम जाने । कांग्रेस तो युवाओं का वोट लेकर पांच साल के लिए तगड़ा रोज़गार पा गयी ।

युवा मित्रों, ये तो आप जानते ही हो कि अपना हाथ, जगन्नाथ । माफ कीजिएगा टाईम पास की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि आपको स्वरोज़गार के नये क्षेत्र बता रहा हूं । हालांकि ये स्वरोज़गार के क्षेत्र नये नहीं हैं लेकिन इनमें नोट कूटने की अपार संभावनाएं हैं और साथ ही ये समाजसेवा से भी जुड़े हुए हैं । स्वरोज़गार के अपने मजे हैं । कोई ससुरा बॉस नहीं होता । जब मन किया काम किया जब मन किया तब बाल-बच्चों को (अगर ये कष्ट आपके ऊपर नहीं पड़ा है) तो बाजूवाली भाभीजी को, पड़ोसी की लड़की को, अपनी हसीन सेक्रेटरी को स्कूटर की पिछली सीट पर बैठाया और सिनेमा देखने या इडली-डोसा के बाद आइसक्रीम खाने निकल गये । जिंदगी का मजा तो इसी में है । जब मन किया काम किया जब मन किया तफरी कर डाली । न किसी के बाप से लेना, न किसी के बाप को देना यानी न लेना एक, न देना दो ।(यह फलसफा गर्ल फ्रैण्ड पर लागू नहीं होता)

तो दोस्तों मैंने इस बढ़ती हुयी बेरोज़गारी पर गंभीरता से विचार किया और इस कारण मुझे एक झपकी भी आयी (दिमाग पर लोड डालते ही थोड़ी देर के लिए दिमाग की एम.सी.वी ट्रिप कर जाती है) । काफी देर तक विचारने (झपकने) के बाद ये लाखों का आइडिया दिमाग में लपलपाया । हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा वाला आइडिया था । ढेर सारे नये स्वरोज़गार के क्षेत्र हैं जिनपर सरकार की नजर नहीं पड़ी है हालांकि सरकार बहुत कुछ इन्हीं तरीकों और सिद्वांतों पर चला करती हैं । इस श्रंखला के अन्तर्गत मैं आपको इन्हीं तरीकों की जानकारी दूंगा । इसमें बहुत ज्यादा इन्वेस्टमेन्ट की जरूरत नहीं है, हां, अपने स्किल डेवलप करना जरूरी है । आप इनको प्रोफेशन का दर्जा दे सकते हैं जैसे डाक्टर, वकील, सी.ए. वगैरह होते हैं । अगर आप गौर से देखेंगे तो हर प्रोफेशनल आदमी मूल रूप से इन्हीं सिध्दांतों की मदद लेता है । चलिए अब ज्यादा आपकी दिमाग का दही नहीं करूंगा और शुरूआत करते हैं इस श्रंखला की पहली कड़ी की ।

रोज़गार नं0 एक – हाईटेक तांत्रिक या ज्योतिषाचार्य बनिये ।

मित्रों, मुंह न बनाओ । कुन्टलों संभावनाएं हैं इस क्षेत्र में और बोरा भर कर नोट भी हैं । घर बैठे आमदनी । पैर छूने वालों की भीड़ । कैश और काइंड में इंकम । बलभर यश । अफसर और नेता चरणों में लोटन कबूतर । बाबा बन कर ठाठ से गद्दी पर विराजो । समाजसेवा की समाजसेवा और खूबसूरत औरतों से संपर्क बढ़ाने के मौके । मैं कहता हूं क्या कमी है इस धंधे में । पैसा ही पैसा और ग्लैमर के साथ नाम भी । कोई आई.ए.एस या किसी मल्टीनेशनल का सी.ई.ओ क्या खा कर तुम्हारी बराबरी करेगा । चलो अब धंधे की बारीकियां भी समझा दूं और ट्रेनिंग कैसे लेनी है वो भी बता दूं । ध्यान से सुनना । हास्य, व्यंग्य समझ कर हंसी में मत उड़ा देना । जीवन बदल जायेगा ।

पहले तो अख़बार पढना सीखो । काहे कि ये सारे चऊचक धंधेबाज रोज अखबारों के वर्गीकृत पन्ने पर छपते हैं और इनकी कोई जांच भी नहीं होती । विज्ञापन इस तरह का होता है – विवाह में अड़चन, प्रेमविवाह, मोहनी वशीकरण, यंत्र हाथ पर रगड़िये प्रेमी-प्रेमिका भाग आयेंगे, धनवान बनें, व्यापार, विदेश यात्रा, नौकरी, लॉटरी, सौतन, गृहक्लेश, तलाक, अदालत, शिक्षा, संतान न होना, आदि एक यंत्र सौ काम । मिलिए पहाड़ वाले बाबा से । पुराने डॉट के पुल के बगल में, मसाले वाली गली, मिंया की सरांय, अलीगढ ।

इस तरह के विज्ञापन रोज अख़बार में छपते हैं । जाइये पहले वो विज्ञापन पढ़ कर आइये फिर धंधे की बात बताता हूं ।

जारी…………

=>पुत्र तुम्हारे हाथ में कालसर्प योग स्पष्टरूप से दिखाई पड़ रहा है । राहु-केतु ने तुम्हारा जीवन नर्क बना रखा है ।

=>हां महाराज, आप सही कहते हैं । मेरी पत्नी और मेरी सास ही मेरे लिए साक्षात राहु-केतु का अवतार हैं । इनसे मेरे प्राणों की रक्षा का कोई उपाय बतायें ।

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रामायण बैठी है

Posted by K M Mishra on जुलाई 16, 2010

मित्रों, रामचरितमानस का पाठ अपके अगल-बगल में कभी न कभी तो हुआ ही होगा । आपके घर में भी हुआ हो या प्लानिंग चल रही होगी इस नवरात्र में पीट देने की । हे रामचंद्र जी! मुझको माफ कर दो । मैं तुम्हारे भक्तों पर व्यंग्य करने जा रहा हूँ । फिलहाल मेरे पड़ोस में बालकाण्ड बोहनी कर चुका है । मुझको समझ में नहीं आता कि भोंपू का अविष्कार होने के पहले रामायण पाठ और अजान किस तरह से की जाती थी । केंद्र से 100 मीटर की दूरी तक के सभी मकानों के खिड़की दरवाजे पूरी कुशलता के साथ बंद होंगे । उनमें रहने वाले कानों में रूई ठूँस कर बैठे होंगे । उनको श्री राम 24 घंटे तक लगातार याद आयेंगे । साथ ही याद आयेंगे भयानक राक्षस और उत्पाती शोर मचाते उद्दंड वानर । ”प्रभू तुम्हारी फोटो के सामने ही तो इतना शोर हो रहा होगा । क्या तुम्हारा सिर दर्द से नहीं फटता ?”

रामायण बैठाने के दो दिन पहले से ही तैयारीयाँ शुरू हो जाती है । उन विशेषज्ञों की लिस्ट बनाई जाती हैं जो ढ़ोलक, मंजीरा पीटने में और हरमोनियम क्यां-क्यां करने में सिध्दहस्त हैं । ”अरे राकेश के साले सुरिंदर को फोन किया कि नहीं । टॉप की रामायण गाता है । ” सुरिंदर भाई कॉलेज में ”मेरी पेंट भी सेक्सी” गाते हैं और रामायण में चौपाई भी उसी धुन पर रगेद देते हैं । चाहे दशरथ हा राम! का विलाप कर स्वर्गवासी हो रहे हों या सीता जी रावण को तिनका दिख कर धमका रही होती हैं पर सुरिंदर भाई ”गोरे गोरे मुखड़े पर काला काला चश्मा” गा रहे होते हैं । तुलसीदास जी ऊपर बैठे सोचते होंगे थोड़ा लेट पैदा हुये होता तो बालीवुड में अच्छा चांस था । या फिर हाथ जोड़ कर रामचंद्र जी से माफी मांगते ”प्रभू मुझको माफ कर दो । मुझको नहीं पता था कि आपकी कथा की कभी ऐसी दुर्गती भी हो सकती है ।”

”चुन्नु बेटा, तुम्हारे दोस्तों को खबर कर दी कि नहीं । तुम लोग अभी सो जाओ, रात को तुम्ही लोगो को खींचना है ।” एक एहसान है रामजी पर । तुम्हारी कन्वेसिंग कर रहे हैं रघुपति और क्या चाहिये तुम्हें । एक महात्मा के प्रवचन में सुना था कि जहां कहीं श्री राम कथा होती है, बजरंगबली वहाँ एक बार जरूर पहुँचते हैं । गलत है । जहाँ कहीं भी लाउडस्पीकर बांध कर राम कथा हो रही होगी, बजरंगबली क्या जो भी देवता आस-पास होगा सिर पर पैर रख कर भागेगा । इतनी चिल्लहटों और ध्वनि प्रदूषण में सिर्फ पूड़ी-पंजीरी की आस वाले रूकेंगे और कोई नहीं ।

रामायण पाठ का जब इतना प्रभाव है तब श्री राम ने फालतु में ही रावण से इतना लंबा युध्द किया । बानरी सेना की भी जरूरत नही पड़ती । अयोध्या से एक दर्जन रामायण पाठ करने वाले गवैये बुलाकर लंका के सामने अखंड रामायण शुरू करवा देते । रावण पगला जाता । दौड़ा चला आता और निवेदन करता । हे राम! ये चिल्लहटो बंद करवाओ, ये रही तुम्हारी सीता ।

रामयण बैठाना एक यज्ञ है । बड़ी मुश्किल से गाने वाले मिल पाते हैं । वो भी एक-दो घंटा काट कर चल देतें हैं । दिन तो कट जाता है पर रात में क्या किया जाये । स्पेशल इंस्ट्रक्शन दिये जाते हैं । जगदीश, गिरीश, बब्लू और कल्लू आज घर पर ही रूकेंगे। रात के एक बज रहे हैं । घर की एक महिला की डयूटी चाय पर लगी है । हर आधे घंटे पर चाय आ रही है । सौंफ, इलायची, गरी का बुरादा प्लेट में रखा है । बब्लू रामायण पकडे पकड़े ही लेट गये हैं और जगदीश आधे घंटे से पेशाब करने गये हैं । बहुत बड़ी जिम्मेदारी है बिना खंडित हुये रामायण पाठ । दोनो योध्दा इस तेजी से चौपाई का पाठ कर रहे हैं मानो सुग्रीव, जामवंत गदा लेकर निशाचरों की सेना में कूद पड़े हैं । चारों तरफ हाहाकार मच गया है । पर बस आधे घंटे तक । फिर नल, नील यानि बब्लू, जगदीश की बारी आयेगी ।

एक घटना बताता हूँ । एक बार हमारे पड़ोस में एक सज्जन के यहाँ लड़का पैदा हुआ तो उन्होंने सभी देवी देताओं के मंदिरों में जा कर उनके दर्शन किये, सबको धन्यवाद ज्ञापित किया और घर लौटकर रामचरित मानस के अखंड पाठ का संकल्प भी लिया । निश्चित दिन पर लाउडस्पीकर आदि टांग दिये गये । निश्चित समय पर पंडित जी ने आकर पूजा पाठ की और गवैयों ने रामचरितमानस का पाठ शुरू किया । दिन भर भक्तों की टीम आती रही और पूरा मुहल्ला श्री राम कथा में डूबा रहा । रात में स्पेशल भक्तोंकी टीम आयी । स्पेशल भक्त वे होते हैं जो कि पैसा लेकर राम चरित मानस का पाठ करते हैं । इनकी आव भगत भी विशेष तरह से करनी पड़ती है ।

रात के एक बज रहे थे । जिन सज्जन को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी थी वे सपरिवार निद्रा देवी की अराधना में लग गये । स्पेशल भक्तों को हर आधे घंटे में चाय की जरूरत पड़ती है । उन्होंने देखा कि घर का मालिक सपरिवार सो रहा है और उन लोगों के चाय पानी का इंतजाम भी किसी के मत्थे नहीं है तो उन लोगों को काफी दुख हुआ । दुख की मात्रा इतनी अधिक थी कि वे भावुक हो गये । भावना में बह कर उन्होंने एक काण्ड का पत्ता ही साफ कर दिया । बजरंगबली से प्रेरणा ले कर उन्होंने एक लंबी छलांग लगाई और अयोध्या काण्ड के बाद सीधे किष्किन्धा काण्ड पर जा कर लैंड किया । अरण्यकाण्ड का आधी रात में अपहरण हो गया और किसी को पता भी नहीं चला । आम तौर पर रामचरितमानस का पाठ 24 घंटे का समय लेता है पर उस दिन मानस का पाठ 16 घंटे में ही समाप्त हो गई । सभी लोग खुश । चलो जल्दी खत्म हो गया । पंजिरी चरणामृत बांट कर छुट्टी करो । दूसरे काम-धाम देखो । इस बात की खबर किसी को नहीं लगती पर उसी स्पेशल टीम के एक खिलाड़ी ने दूसरी जगह डींग हांकते हुये ये बात कही कि अगर हमारी आव भगत में कोई कमी रह जाती है और घर का मालिक नादारद रहता है तो हम इसी तरह से रामयण गाते हैं । जब मालिक को ही फिक्र्र नहीं है तो हम कहे फिक्र्र करें ।

सवेरे से रामायण पाठ चित्रहार का मजा दे रहा है । जिस उम्र की टीम आ रही है उस दौर के गाने सुनने को मिल रहे हैं । पिताजी बता रहे हैं ”ये मधुमती फिल्म का गाना है । ये नया दौर का । इस गाने पर तो शम्मी कपूर बहुत उछला था ।” छोटा भाई बता रहा है ”ये गाना वीर का है । ये धुन काइट्स की है ।” ”प्रभू मुझको तुमसे पूरी हमदर्दी है । कल में प्रसाद में दो पत्ते एनासिन के जरूर चढ़ाऊंगा । तुम्हारा सिर दर्द से फटा जा रहा है न । भक्तो के लिये तुमको हमेशा से ही कष्ट सहना पड़ा है । पर इतना तो कभी नही सहे होंगे । फोटो में राम जी सीता जी से कह रहे हैं । ”मैं रावण से सौ बार युध्द कर सकता हूँ पर अब यहां नहीं बैठा जाता है ।”

कोई पॅूछने जाये, भइया ये लाउडस्पीकर क्यों लगा रखा है । रामायण पाठ करो पर अपने घर में करो । पूरे मुहल्ले को क्यों एहसान के तले दाब रहे हो । हम दूसरे काम नहीं कर पा रहे हैं । तो उत्तर मिलेगा ”अनायास ही सही सबके कानों में प्रभू की कथा जा रही है, पुण्य मिलेगा ।” यार हमारे पुण्य के लिये तुम क्यों खट रहे हो । इस वक्त पुण्य नहीं चाहिये अगले हफ्ते से बच्चों के इम्तिहान हैं । नंबर चाहिये ।

ऐसा नहीं है कि मैं रामायण पाठ का विरोधी हँ । बचपन में किस्से कहानियाँ पढ़ने का इतना शौक था कि घर में रखे सारे धार्मिक ग्रंथ, रामचरितमानस, प्रेमसागर, पुराण इत्यादि कक्षा 5 में ही पढ़ डाले थे । कितनी अखंड रामायण में हम माईक प्रेम की वजह से बालकाण्ड से उत्तरकाण्ड तक चिल्लाते रहते थे । लेकिन इस तरह रामायण पाठ से कुछ नहीं मिलने वाला । अपना टाईम तो खराब ही करो ध्वनि प्रदूषण से आस पड़ोस में भी परेशानी खड़ी कर दो ।

श्री राम कथा बिना अर्थ जाने तोते की तरह पढ़ जाओगे तो तोता ही रहा जाओगे । अर्थ समझोगे तो भाव उत्पन्न होंगे । भाव उत्पन्न हुआ तहां बेड़ा पार समझिये । पभू तो भाव के भूखे हैं, कन्वेसिंग के नहीं । रामचरितमानस इतना लोकप्रिय और प्रसिध्द ग्रंथ है क्योंकि इसमें श्रीराम कथा के माध्यम से सामाजिक रहन सहन और स्वच्छ जीवन के असंख्य फार्मूले भरे पड़े हैं । पुरनियाँ लोगों को मानस की ढेरों चौपाइयाँ याद रहती हैं । कोई काम फंसा तो फला चौपई सुना कर मार्गदशन कर दिया गया । मानस तो मर्यादा पुरोषोत्तम की कथा है, जो अवतार ही आदर्श प्रस्तुत करने के लिये लिये थे । इसको एक बार भाव से पढ़िये । भक्ति के सागर में न डूबते उतराते मिलें तो कहिये । अहा! ऐसा वर्णन तो सिर्फ एक भक्त, संत ही कर सकता है । किसी पुराण, वेद, उपनिषद में ऐसा आनंद कहां जो मानस में है । भक्ति की चासनी में लिपटा यह ग्रंथ तो बजरंगबली को भी इतना प्रिय है कि उनको एक बार उस जगह आना ही है जहां राम कथा हो रही है । रामचरितमानस का आनंद लेना है तो किसी भक्त की वाणी से सुनिये । वो स्वंय तो आनंद, भक्ति के सागर में डूबेगा ही आपको भी वह लहरें नहला देंगी ।

भय प्रकट कृपला दीन दयाला कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अदभुत रूप बिचारी ॥

प्रभू एक बार और प्रकट हो जाओ । प्रेस कांफ्रेस बुलवाओ और अपने भक्तों से अपील करो कि लाउडस्पीकर न लगाया करें । डिस्टर्ब होता है । बोलो सियावर रामचंद्र की जय । राम कथा समाप्त होती है । सब लोग आरती ले लें और थाली से छुट्टे पैसे न उठायें ।

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दर्द देकर इलाज करनेवाले

Posted by K M Mishra on जून 30, 2010

ऐसा तो नहीं है कि आप कभी बीमार नहीं पड़े होंगे । (अरे भाई बदुआयें नहीं दे रहा हँ ।) छीकें होंगे । कभी बुखार चढ़ा होगा । मलेरिया, टाइफाईड, कॉलरा, टी.वी., शुगर । अरे डरिये नहीं बड़ी आम बिमारी हैं । मेरे कहने का मतलब है कि दवा कौन सी लेते हैं । एलोपैथ या होम्यापैथ । इन पैथियों का अर्थशास्त्र भी भिन्न भिन्न होता है । भिन्न भिन्न तरीका होता है । अब अगर आपको कोई बिमारी हो गई है (माफ करें । कभी न हो । सिर्फ उदाहरण के लिये) और आपकी बिमारी का खर्च आपका विभाग उठा रहा हो तब एलोपैथ चलेगी । इसका स्टैंडर्ड थोड़ा ऊंचा होता है । मेडिकल इक्ज़ाम में भी चे ऊंची चीज होती है । अगर आप नगदऊ को स्वास्थ्य से कम चाहते हैं तो एलोपैथ की शरण में जायेंगे । इसके बारे में एक नकारात्मक तथ्य यह है कि ये बिमारी के साथ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी नष्ट कर देती है । इसलिये बुध्दिमान व्यक्ति सलाह देते हैं कि इमरजेंसी में ही इसको सेवा का अवसर दिया जाये ।

मीठी गोलियाँ । होम्योपैथ । इसका अर्थशास्त्र थोड़ा आम आदमी के लेवल का होता है । बस डाक्टर साहब फीस ऊंची न लें । दवा दारू वाली उक्ति को इन्होंने ज्यादा तत्परता से ग्रहण किया है । इसलिये इनकी अधिक्तर दवाएं एलकोहल होती हैं  । दो बूंद दारू दवा है । दो पैग मस्ती है । उससे ज्यादा पीने पर पीने वाला रोता है और दुनिया हंसती है । इसके बारे में एक खास बात यह है कि यह मर्ज को दबाती नहीं है बल्कि उसका समुचित उपचार करती है ।

एक है अपनी खास चिकित्सा पध्दति, आयुर्वेद । देशी चीज । ये सस्ती भी होती है और मंहगी भी । अगर आपको गैसटिक ट्रबुल है तो त्रिफला  फांक लीजिये या हींग, अजवाइन और भी बहुत से देशी मसाले हैं । और अगर आप शाही इलाज चाहते हैं तो फिर ये दस तोला सोना भी जला कर खिलवा सकते हैं पर ये गैस के लिये नहीं हैं । इसकी खासियत यह है कि इसके लिये घर में ही काफी कुछ उपलब्ध होता है और अगर ज्यादा प्रभाव चाहिये तो किसी वैद्य जी के निकट जाइये । ये ऐसी ऐसी जड़ी बूटियों का नाम गिना देंगे कि खोजे न पाइयेगा । मिलती है पर शहर की किसी खास दुकान पर जिसकी आपको जानकारी नहीं होगी । सी.आई.डी. वाले खोजने में मदद कर सकते हैं यदि उनको भी कोई बिमारी  आयुर्वेद से ही दुरूस्त करनी हो या उनका कोई मुजरिम अपना हाजमा ठीक करने के लिये उस दुकान पर आता हो ।

अब एक ऐसी चिक्तिसा पध्दति की बात करने जा रहा हँ जो की फ्री फंड की है । एक्यूपंचर और एक्यूप्रेशर पध्दति । इस पध्दति में कोई दवा-सवा खाने की जरूरत नहीं है बस शरीर का या हाथ का ही कोई हिस्सा दबा कर बैठ जाओ । ज्यादा तेज आराम चाहिये तो सुईयां खरीद लो और अपने को पंचर करवा लो । इसके अनुसार हमारे शरीर के जितने भी मुख्य अंग हैं उन सबका कनेक्शन कुछ नसों के द्वारा होता है जो कि पूरे शरीर में फैली होती हैं । हर तरह की बिमारी, जुकाम से लेकर कैंसर तक आप इससे ठीक कर सकते हैं । (बताने वाले ने तो यही बताया । )

fakir2 आपने कभी ऐसे साधुओं को देखा होगा जो कि सुई के बिस्तर पर या कांटो की झाड़ पर  लेटे होते हैं । मुझको लगता है कि एक्यूप्रेशर या एक्यूपंचर की शुरूआत ऐसे ही हुयी होगी । चीन वाले तो झूठ बोलने में माहिर ही हैं । कह दिया हमने खोजा है । झूठे, धोखेबाज कहीं के (चीन के) । हां तो मैं कह रहा था कि कांटों के बिस्तर पर कोई बीमार साधु बेहोश हो कर गिर गया होगा । कुछ देर में उसकी सारी नसें तड़ाक फड़ाक ठीक हो गई होगी । बुध्दि हरी हो गई होगी । सटाक से उसने चिलम निकाली होगी । गांजा भरा होगा । एक सुट्टा खींचा होगा और जोर से चिल्लाया होगा ‘यूरेका’ ‘यूरेका’ मतलब फ्री फंड का इलाज ।

आधुनिक एक्यूप्रेशर में भी यही होता है । अब आप बबूल के दस फिट के झाड़ को घर में तो रख नहीं सकते हैं इसलिये प्लास्टिक की कांटेदार प्लेट चलन में हैं । उस पर खड़े हो जाइये और स्वस्थ अनुभव कीजिये । टोटल यौगिक आनंद ।

अब चलिये एक्यूपंचर की तरफ । साइकिल में पंचर हो तो हवा निकलती है । शरीर में पंचर हो तो खून निकलता है । ज्यादा बढ़िया फायदा चाहिये हो तो दस ठो सुई  खरीद लो और किसी विशेषज्ञ से ठुंसवालो । दर्द नहीं होता है । बस चींटी सी काटती है । कभी कभी खून निकल आता है पर इससे ज्यादा रक्तदान तो आप हर रात मच्छरों को कर देते हैं । खबराने की कोई जरूरत नहीं है सब ठीक हो जायेगा । इससे भी तेज फायदा चाहिये तो विशेषज्ञों में विशेषज्ञ, सयाने (कसाई) विशेषज्ञ बिजली का भी इंतजाम किये रहते हैं । एक से बारह वोल्ट का करंट सुईयों में प्रवाहित कर देंगे । कुछ नहीं होगा बस हल्का सा चुनचुनायेगा । ज्यादा तेज होगा तो आप खुद ही ”सी” की ध्वनि करते हुये हाथ हटा लेंगे । पर घबराइये नहीं फिर से कोशिश कीजिये ।

ये पध्दति हमारे आम जीवन में भी बहुत कारगर है । अब जैसे सासू मां का सिर दर्द कर रहा है तो बहू गले पर एक्यूप्रेशर का प्रयोग कर सकती है । यदि आपके सिर में दर्द किसी ‘ण’ नाम के आदमी ने उत्पन्न किया हो तो आप एक्यूपंचर विधी अपनायें । इसमें आप सुई की जगह चाकू या कोई भी लंबा नुकिला डंडा ले लीजिये और ‘ण’ के शरीर में कहीं भी जैसे सिर, छाती या पेट में घुसेड़ दीजिये । ‘ण’ खत्म, दर्द खत्म ।

एक्यूप्रेशर और एक्यूपंचर में आधे मरीजों का दर्द सुई, करंट और विशेषज्ञों की निमर्म तत्परता देख कर ही भाग जाता है । बाकी आधा मर्ज भी चला ही जाता है क्योंकि जो भी हो चिक्तिसा पध्दित तो है ही ।

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घरेलू पुष्पक विमान (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on जून 11, 2010

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मित्रों, अभी एक धांसू खबर पढ़ी है । पढ़ते ही कान में हवाई जहाज की आवाज गूँजने लगी । खबर इतनी ज्यादा किफायती है कि आप भी बैंक की पासबुक खोजने लगोगे । अभी सुबह का अखबार बांच रहा था । एक खबर थी कि अब कार की कीमत में मिलेंगे विमान । खबर पढ़ते ही मुझे अपनी टुटही साइकिल का ध्यान आया जो कि मेरे स्व. दादा जी की है । उस ऐतिहासिक साइकिल पर चढ़ कर मैं रोज सुबह पप्पू को स्कूल छोड़ने जाता हँ और वापस लौटते वक्त पराग का पैकेट पॉलिथीन मैं लटका कर घर वापस आता हँ । मेरी यह हार्दिक इच्छा है, सच्ची यह हवाई जहाज वाली खबर पढ़ने के बाद तो हार्दिक महत्वकांक्षा है कि राष्ट्रीय संग्रहालय मेरी खानदानी साइकिल को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दे और बदले में मुझको 5-10 लाख रूपये मुआवजा दे दे क्योंकि वह साइकिल पप्पू को स्कूल छोड़ने के अलावा मुझे दफ्तर ले जाती है, शाम को सब्जी ढ़ोती है, उसके जर्जर हो चुके कैरियर पर बिठा कर मैं अपनी फैमिली को पिक्चर दिखाने भी ले जाता हँ । सो एक तरह से वह हमारी मर्सडीज है । अब मर्सडीज तो 25 लाख के ऊपर आती है पर मैं सरकार से सिर्फ 10 लाख की ही इच्छा रखता हँ । सरकार इस पर जल्दी गौर करे क्योंकि अभी वह जहाज 5 लाख के अंदर आ जायेगा । बाकी 5 लाख का मैं पेट्रोल भरवा लँगा । अगर जहाज की कीमत इस बीच बढ़ गई तो फिर मेरे मुआवजे की राशि भी बढ़ जायेगी ।

मित्रों अब पूरी खबर भी पढ़ लीजिये क्योंकि ऐसा सस्ता, हल्का, मजबूत और टिकाऊ जहाज तो आप भी खरीदना चाहेंगे । लातविया के कुछ वैज्ञानिक ये सस्ता टू सीटर विमान बना रहे हैं । (भइया मेरे पप्पू के लिये भी एक छोटी सी सीट लगा देना वर्ना वो बेचारा स्कूल कैसे जायेगा ।) इस विमान की कीमत 6500 डालर पड़ेगी यानि करीब साढ़े तीन लाख रूपये । भारत में बेचेंगे तो हो सकता है थोड़ा मँहगा बेचें सो आप पांच लाख का इंतजाम करके रखो । ये जहाज फाइबर और डयूरालोमिनियम से बनेगा । भइया चाहे अलमूनियम से बनाओ या डयूरालोमिनियम से उड़ना चाहिये बस । इस हवाई जहाज के लिये छोटी सी हवाई पट्टी की जरूरत पड़ती है । सो इसके लिये मेरे घर की छत से काम चल जायेगा । मकान मालिक थोड़ा बड़बड़ायेगा तो एकाध बार उसको भी उड़वा देंगे । छत पर एक छोटी सी फूस की मड़ई है । अपना पुष्पक विमान वहीं पर रात को विश्राम करेगा । इस विमान में दो इंजन लगेंगे । हलांकि वह उड़ेगा एक से ही पर टेक ऑफ के लिये दो की जरूरत होगी । अच्छा है एक से उड़ेगा तो पट्रोल की बचत होगी । कंबख्त वैसी भी 50 रू. लीटर है । चलो इसी बहाने पेट्रोलपंप का भी मुंह देख लेंगे क्योंकि अपनी साइकिल में तो सिर्फ बरासत बाद ही ऑयलिंग ग्रीसिंग होती है ।

मित्रों, इस विमान में सुरक्षा के भी बेहतरीन इंतजाम हैं । अब जैसे आप का उड़ते वक्त तेल खत्म हो जाये तो जहाज सटाक से जमीन की तरफ लपकेगा । आप सोचोगे कि इस पुष्पक विमान के साथ साथ आप भी राम जी को प्यारे होने वाले हो पर ऐसी हालत में बिल्कुल न डरे । दिल को कड़ा करें । जान है तो जहान है । जहाज का बीमा आपने जहाज खरीदते वक्त ही करवा लिया था और नीचे जमीन पर रहने वालों को बचाने से ज्यादा जरूरी है कि आप अपने आप को बचायें । यह पानी का जहाज नहीं है कि जहाज के साथ साथ कप्तान भी डूब मरे । यह हवाई जहाज है । अब ज्यादा सोचने का टेम नहीं है पागल । सीट के नीचे पैराशूट है जिसका पैसा कंपनी वाले आपसे पहले ही वसूल चुके हैं । पीठ में बांध कर कूद पड़ पर क्योंकि पतंगे अब नजदीक आ गई हैं ।

इस तरह आप पुष्पक विमान का भी मजा ले लोगे और बजरंगबली की जरह सेफ लैडिंग भी कर लोगे । इस जहाज को लेकर और सब तो खुश हैं पर हवाई प्रशासन परेशान है । जहाज सस्ता हो जायेगा तो हर आदमी मारूती छोड़ कर जहाज ही खरीदेगा । आसमान में ट्रैफिक बढ़ जायेगी तो ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था करनी पड़ेगी । ट्रैफिक सिंग्नल और लाईटें लगानी पड़ेंगी । सो खर्चा बढ़ेगा । अगर कोई जहाज ट्रैफिक के नियम तोड़ कर भागेगा तो ट्रैफिक पुलिस वाला बुलेट से चहेट कर चालान काट नहीं सकता । इसलिये कुछ हवाई जहाज उड्डयन प्रशासन को भी खरीदने पड़ेंगे । कोई आदमी दारू पीकर न विमान उड़ाये इसके लिये भी व्यवस्था करनी पड़ेगी । ये खतरनाक बात है, क्योंकि दारू पीकर चलाने वाले एक्सीडेंट ज्यादा करते हैं । तो ऊ लोग किसी की भी खोपड़ी पर जहाज गिरा सकते हैं । दुर्घटना होने का डर है । मेरा कंपनी वालों को एक सुझाव है । वो जहाज के अंदर हैंडिल के पास एक मशीन लगा दे जो कि पायलट की नाक सूंघ कर ही जहाज स्टार्ट करने दे । जहाज का कंप्यूटर घुसते ही चेतावनी दे दे कि नशा पत्ती करने वाले, पान बीड़ी, सिगरेट, दारू, चरस, गांजा पीने वाले नशा उतरने के बाद ही जहाज पर चढ़ें । नहीं तो मरें ।

मित्रों यह जहाज एक साल बाद बन कर तैयार होगा सो अभी सरकार के पास काफी टाइम है मेरी ऐतिहासिक साइकिल खरीदेने के लिये, पर ज्यादा देर न करें । जरूरी हो तो केबिनेट की मीटिंग भी बुलवा लें । एक साल अभी बाकी है और बरसात भी आ गई है सो सालाना सर्विसिंग भी करवा लेता हँ । आप लोग भी सेविंग एकाउंट खोल लो । पांच लाख इकट्ठे करने हैं । मैं चलता हूं । पप्पू के स्कूल का टाइम हो गया है और वह बस्ता लेकर मेरे सामने खड़ा है ।

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सभी प्रदूषणों का बाप । (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on जून 8, 2010

पर्यावरण दिवस के अवसर पर ।

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मित्रों, चारों तरफ बढ़ता हुआ प्रदूषण एक मुसीबत है । चाहे वह वायु प्रदूषण हो, जल प्रदूषण हो, या फिर ध्वनि प्रदूषण । मृदा प्रदूषण को भी मत भूलियेगा क्योंकि ये भी एक प्रकार का प्रदूषण होता है । हालांकि इन सब से बड़ा और सभी प्रदूषणों की जड़, जो सबसे बड़ा प्रदूषण है उस पर किसी की निगाह अभी तक नहीं गई है । जब निगाह ही नहीं गई है तो उसको प्रदूषण भी नहीं मानेंगे । फिर उस प्रदूषण को हटाना, खत्म करना किसी के बस की बात भी नहीं है । इस सबसे बड़े प्रदूषण को तो वही हटा सकता है जिसने इस प्रदूषण को फैलाया है । आप लोग सोच रहे होगे कि ये सबसे बड़ा प्रदूषण क्या बला है जिस पर अब तक हमारी नजर ही नहीं पड़ी । मित्रों, वह सबसे प्रदूषण, सभी प्रदूषणों का बाप, और सारे प्रदूषण जिसकी उंगली पकड़ कर चलना सीखते हैं, वह है इंसान, मानव, ह्ययूमन बींग, सबसे विवेकशील प्राणी, सभी प्रकार के प्रदूषणों की जड़ यानि की हम । हम से मतलब आप लोग सिर्फ कृष्ण मोहन मत लगा लीजियेगा । क्योंकि अगर आप ये सोच रहे हैं कि कृष्ण मोहन को हटाने भर से सभी प्रदूषणों से निजात मिल जायेगी तो आप गलत सोच रहे हैं । क्योंकि ये बिचारा कृष्ण मोहन सिर्फ ध्वनि प्रदूषण और विचारों के प्रदूषण के सिवाये और दूसरे प्रदूषणों को नहीं फैलाता है । धूम्रपान ये करता नहीं कि हर तरफ कार्बन मोनोआक्साइड का फैलाव करे और पान भी ये नहीं खाता कि जहाँ देखो तहाँ ये चित्रकारी करता फिरे । ध्वनि प्रदूषण भी तब फैलाता है जब उसे आकाशवाणी में विनोद वार्ता के लिये बुलाया जाता है । इस लिये ये आदमी उतना प्रदूषण नहीं फैलाता जितना कि दूसरे आदमी फैलाते हैं । हम का मतलब है हम सभी, इस पृथ्वी नामक ग्रह पर निवास करने वाले साढ़े छ: अरब इंसान । प्रकृति के बनाये हुये सबसे विवेकशील प्राणी, जिसने अपने विवके से दूसरे जीव जंतुओं का तो जीना हराम कर ही दिया है और प्रकृति की भी नाक में भी दम कर रखा है । कहाँ कहाँ नहीं हम ने गंदगी फैलाई है । चाहे वह माउंट ऐवरेस्ट हो या फिर प्रशांत महासागर । चांद पर भी हो आये हैं तो जाहिर है वहाँ भी कुछ न कुछ गंदगी फैलाई होगी । अगर गंदगी नहीं फैलायेंगे तो फिर इंसान कैसे । जिसको कहते हैं पर्यावरण उसका हमने सत्यानाश बल भर किया है । चारों तरफ एक महान प्रदूषण फैला हुआ है (यानि कि इंसान) और इसके द्वारा फैलायी हुयी गंदगी । धरती माता अपने इस लाल की करतूत देख कर सोचती होंगी कि तेरी वजह से आज न जाने कितने जीव-जन्तु, पक्षी और वनस्पतियाँ या तो खत्म हो चुके हैं या फिर लुप्त होने के कगार पर हैं । तू इस कोख से जन्म न लेता तो ही ठीक था । ये दुनिया तेरे बिना ज्यादा सुंदर और शांत होती ।


तो मित्रों ये तो बात हो गई जितने भी प्रकार के प्रदूषण होते हैं उन सबके पिताजी की, यानि की इंसान की । अब आईये उन प्रदूषणों पर निगाह दौड़ाते हैं जो कि इसके द्वारा पैदा किये गये हैं । सबसे पहले लेते हैं वायु प्रदूषण को । वायु प्रदूषण वह प्रदूषण होता है जो कि वायु में फैलाया जाता है । जिसकी वजह से वायुमंडल दूषित होता है । हाँ हाँ भाईया, पेट में वायु विकार के कारण कुछ मानव गर्जना के साथ थोड़ी मात्रा में गैस भी बाहर निकालते हैं लकिन उतनी गैस से वायु प्रदूषण नहीं फैलता है । फिर वह ज़हरीली भी नहीं होती है। वायु प्रदूषण फैलता है बड़े पैमाने पर ज़हरीली गैसों के वायुमंडल में फैलने पर । जैसे कि बड़े बड़े कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला काला धुआं वायु प्रदूषण फैलाता है । जनरेटरों और बढ़ती हुयी वाहनों की संख्या भी वायु प्रदूषण को फैलाती है । इस वायु प्रदूषण के कारण ओजोन परत का क्षरण होता है और ग्रीन हाउस इफेक्ट की भी समस्या उत्पन्न होती है । मेरी साईकिल से किसी प्रकार का वायु प्रदूषण नहीं फैलता और नहीं मैं धूम्रपान का शौकीन हँ इसलिये पर्यावरण रक्षा के लिये अगर आप कोई पुरस्कार मय लाख, दस लाख की राशि देना चाहते हों तो देर न करिये । मैं इंतजार में बैठा हुआ हूं ।

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अब बात करते हैं जल प्रदूषण की । जल ही जीवन है । एक दिन भी अगर बंबे में पानी न आये तो तिवारी जी के हैंडपंप पर पहले बाल्टी लगाने के लिये वो किच किच होती है कि कई बार दिल करता है कि आज पुलिस बुला ही ली जाये । एक बार तो मैं तिवारी जी के हैंड पंप पर शाम के वक्त लोटा बाल्टी लिये दिन भर की थकान उतारने के लिये नहा रहा था, क्योंकि 36 घंटे हो चुके थे नल से पानी टपके । अभी दो ही लोटा पानी सिर पर डाला था कि रोजी के पापा तमतमाते हुये आ पहुंचे । उन्होंने रौद्ररूप धारण कर के बताया कि कक्षा 7 में पढ़ने वाली उनकी बेटी रोज़ी अब युवा हो गई है और अब मैं अपने शरीर का प्रदर्शन आइंदा सार्वजनिक तरीके से इस हैंडपंप पर नहीं किया करूं क्योंकि इससे उनकी युवा हो रही बिटिया के मन पर बुरा असर पड़ेगा और ये मेरे शारीरिक स्वास्थ्य के लिये भी हितकर नहीं होगा । जल ही जीवन है और इसके कारण मेरा जीवन उस शाम संकट में पड़ा था ।


पानी हमारे लिये उतना ही जरूरी है जितनी की हवा । लेकिन हम अपने विवेक से दोनों का ही सत्यानाश करने पर तुले हुये हैं । औद्योगिक कारखानों के रसायनिक अवशिष्ट, विभिन्न कीटनाशकों का प्रयोग जैसे डी.डी.टी., आर्सेनिक लवण आदि, घरेलू कूड़ा करकट, खेतों में इस्तमाल किया गया नाइट्रेट उर्वरक जो कि बह कर कुओं या तलाबों में चला जाता है जिससे गंभीर बिमारियाँ होती है, नदी तट पर शवदाह, या अधजले शवों को नदी में प्रवाहित करना इन सबसे मीठे पानी के दोनों स्रोत प्रदूषित होते हैं । जमीन के नीचे भी और जमीन के ऊपर भी ।


आइये अब चर्चा करते है ध्वनि प्रदूषण के बारे में । ध्वनि प्रदूषण के अंतर्गत आता है विभिन्न वाहनों से पैदा होने वाला शोर, आतिशबाजी का शोर, चुनाव प्रचारों और धार्मिक प्रचारों का शोर, दशहरा होली के दिन बजने वाला कान फाडू संगीत या आज कल शादी ब्याह में चला डी.जे. का नया शौक । अभी कुछ ही दिन हुये मैं एक सज्जन की शादी में गया था । उनकी बारात एक छोटे से गेस्ट हाउस में समाहित थी । उस गेस्ट हाउस के ग्राउंड फ्लोर में बने एक मात्र हाल में खाने का, बारातियों के बैठने का और युवाओं के लिये डी.जे. का भी इंतजाम था । उस 30 बाई 60 फिट के हाल में उन बड़े बड़े स्पीकरों ने वो कहर ढाया कि आधे से अधिक बाराती तो बिना खाना खाये ही भाग खड़े हुये । मैं ठहरा पंडित आदमी । चार कचौड़ियों के लिये जान पर खेल गया । आखिर व्यौहारी के 51 रू. भी तो वसूलने थे । दूसरे दिन खबर मिली कि वो बेचारा दूल्हा जो कि दूल्हन के चक्कर में नहीं भाग सका, रात दो बजे उसे भी घबड़ाहट होने लगी थी । दूल्हे मियां दवा खाने के बाद ही 7 फेरे ले पाये थे ।


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ध्वनि प्रदूषण की वजह से हृदय की धड़न बढ़ना (हांलाकि दिल की धड़कन सुंदर लड़कियों के सामने आ जाने पर भी बढती है), रक्त संचार मे कमी, चिड़चिड़ापन, अत्यधिक मानसिक तनाव व स्थाई बहरापन आदि दिक्कते होती हैं ।


मृदा प्रदूषण अत्यधिक उर्वरकों का खेतों में प्रयोग करने के कारण और औद्यिक अवशिष्टों को भूमि पर बहाने के कारण होता है । इन रसायनों की वजह से खाद्यान्न, सब्जियाँ और फल इत्यादि जहरीले हो जाते हैं जिनकी वजह से हम सभी को तमाम पेट की और रक्त सम्बन्धी बीमारियाँ होती है और डाक्टरों की ऐश हो जाती है ।


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तो मित्रों कुल मिलाकर सारे प्रदूषणों की जड़ है इंसान । जाहिर है हम अपनी परेशानी खुद है । बढ़ती हुयी जनसंख्या, न सिर्फ पर्यावरण को प्रदूषित करती है बल्कि बेरोजगारी और अपराध को भी बढ़ावा देती है । देश की अर्थव्यवस्था और कानून व्यवस्था की ऐसी तैसी होती है सो अलग । आज हमारा देश विकासशील देश है तो इसके जिम्मेदार हम हैं क्योंकि हम आज भी अपनी आबादी पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं। जाहिर है ज्यादा आबादी यानि कि ज्यादा प्रदूषण । ज्यादा दिक्कतें । इसलिये आप लोगों से मेरा हाथ जोड़ कर सविनय निवेदन है कि कृपया करके आप लोग दो से ज्यादा शादी मत करिये । ज्यादा जरूरत पड़ जाये तो तीसरी शादी बहुत है । (दो पत्नियां तो दहेज में जलाने में ही खर्च हो जाती हैं) और बच्चों के मामले में आपसे कुछ नहीं बोलूंगा । कम से कम चार बच्चे तो चाहिये ही जनाजे को कंधा देने के लिये । है कि नहीं ।

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मौसम बड़ा बेइमान है (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on जून 7, 2010

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लीजिये साहब बरसात आ गई । अब की बार वक्त पर आ गई । अखबार वाले कह रहे थे कि पिछली बार तो बेवक्त भी नहीं आई थी । आनी भी चाहिये अगर सर्दी, बसंत और गर्मी, ठीक वक्त पर आ सकते हैं तो बरसात को भी टाईम का पाबंद होना चाहिये । पाबंदी जरूरी है । हमारे बॉस का भी यही कहना है कि हर काम टाइम पर होना चाहिये, हालांकि प्रात: स्मरणीय श्री बॉस को दशकों हो गये प्रात: काल में बिस्तर छोडे हुये । छोड़िये उनका क्या । वे तो बॉस हैं । बरसात आ गई है । बाहर झमा झम पानी बरस रहा है और धर्म पत्नी का आग्रह है कि ‘आज आफिस मत जाईये, पहली बरसात है, इसका आनंद लेना चहिये । कहीं घूमने चलते है । मौसम बड़ा ही सुहावना है, यानि की बेइमान है । प्लाजा में नई भोजपुरी फिल्म लगी है ‘सावन में साजन’ और पड़ोस वाले पांडे-पड़ाईन उसकी बड़ी तारीफ कर रहे थे ।’ एक बार तो मुझे अपने श्री बॉस का श्रीमुख याद आया फिर याद आया कि आज तो संडे है और आज के दिन अगर मैं आफिस न भी गया तो कोई पहाड़ नहीं टूट पडेग़ा । और फिर याद आयी मेरी सेकेंड हैंड साइकिल जिसका कुत्ता पिछले दो सप्ताह से फेल हैं और दोनो ब्रेक टकराने के बाद ही आज कल लग रहे हैं । उनको दुरस्त करवाने का सुनहरा अवसर इतवार होता है । इस लिये फिल्म केंसिल क्यों कि धर्म पत्नी जिस कैरियर पर बैठेंगी उसका भी नट बोल्ट गिर गया है ।


‘फिल्म न सही तो फिर बेसन ही ले आओ । बरसात में गरमा गरम पकौड़ों का अपना ही आनंद है । प्याज, अदरक, हरी मिर्च वगैरह घर में हैं ही ।’ इतना कह कर उसने झोला और छाता पकड़ा दिया । हम बरसात का आनंद लेते हुये खरमा खरमा पनसारी की दुकान पर पहुचे । उसे घुन रहित बेसन का ऑर्डर दिया, लिफाफे में पाव भर बेसन लिया और जनता पान भंडार कि तरफ बढ़ लिये । इतनी देर में हमे यह पता चल चुका था कि हमारा छाता भी रिपेयरिंग मांग रहा है क्योंकि हमारी बुशर्ट पीछे से गीली हो चुकी थी ।


जनता पान भंडार वाले से हमारा पुराना याराना है इसलिये वो हमको देखते ही ज़र्दे वाला पान बनाना शुरू कर देता है और उसका हिसाब अपने रजिस्टर में हमारे नाम के आगे चढ़ा देता है । क्योंकि हमारा आग्रह सदा से यही रहा है कि भइया अपने पान का हिसाब तुम महीने महीने कर लिया करो । ये रोज रोज की अठन्नी चवन्नी हमसे नहीं दी जायेगी ।


पान खाकर, एक हाथ में झोला, झोले में बेसन और दूसरे हाथ में छाता लेकर हम घर की तरफ बढ़े । बुशर्ट पीछे से पूरी तरह भीग चुकी थी और जीभ भी जरा सी कट चुकी थी क्योंकि जनता पान भंडार वाले ने चूने का प्रयोग इफरात से किया था । अपनी किस्मत को कोसते हम घर की तरफ लपके जा रहे थे कि तभी पीछे से पांडे ज़ी की आवाज सुनाई दी । पलट कर देखा तो वो भी एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में ब्रेड लिये चले आ रहे थे । हमने इस बरसात में निकलने का कारण पूछा तो उन्होंने भी वही पत्नी परायणता का नारा बुलंद किया जिसके मारे हम भी टुटहे छाते में भीगते फिर रहे थे ।


आते ही उन्होंने समाचार दिया कि बरसात में कभी चप्पल पहन कर नहीं निकलना चाहिये क्योंकि उससे उछलने वाले छींटों से पैंट या पाजामा गंदा हो जाता है, जैसे कि मेरा पाजामा गंदा हो चुका है । मैं हतप्रभ और दुखी हो कर पीछे पलटा और अपने पाजामे का मुआयाना करने लगा । पांड़े जी ने हमारे चप्पल को घटिया बताया और हमने पांड़े जी का समर्थन किया । हमने बातचीत के विषय को बदला और प्लाजा में लगी हुयी भोजपुरी फिल्म की बात उठायी । पांड़े जी ने बताया कि फिल्म हाउस फुल जा रही है और टिकट का इंतजाम उन्होंने ब्लैक में किया था । हमने महसूस किया कि ब्लैक वाली बात पर उनका सीना कुछ ज्यादा ही फूल गया था और उनके शब्दों से रईसी टपकने लगी थी । इसी बीच एक लंबी कार हमारे बगल से सर्र से निकल गई जिसके पहियों से उछला कीचड़ हम दोनों के कपड़ों को तरबतर कर गया । पांड़े जी ने उस लंबी कार वाले को गला फाड़ कर गरियाया और हमने उनका समर्थन किया । उस लंबी कार वाले का बहुत बहुत धन्यवाद जिसने समाजवाद का कीचड़ उछाल कर पांड़े जी को मेरे स्तर तक पहुंचा दिया था। अब हम दोनों के कपड़े एक जैसे, एक ही रंग में, और एक जैसी गंध वाले हो गये थे । इन कपड़ों में हमारा स्वागत हमारी पत्नियों के सिवाय और कोई कर भी नहीं सकता था इसलिये हम घर की तरफ तेज चाल से चल दिये ।


हमारा गेटअप देख कर धर्मपत्नी ने आश्चर्य प्रकट किया और फिर बेसन सही सलामत देख कर संतोष की सांस ली । धर्मपत्नी ने आग्रह किया कि आप कपड़े बदल कर हाथ मुंह धो लें क्योंकि कीचड़ सिर्फ कपडों पर ही नहीं मुंह पर भी लगा है । इतना कह कर वे प्याज काटने चली गयीं और मैं गुसलखाने में हाथ मुंह धोने चला गया । अब बस पकौड़ों का इंतजार था । मैं हाथ मुँह धोकर, कपड़े बदल कर ड्राइंग रूम में बैठा पकौड़ों का इंतजार करने लगा । थोड़ी देर में पत्नी ने सूचना दी कि नमक भी घर में नहीं और अगर बिना नमक के पकौड़ों नहीं खाने हैं तो जा कर प्लीज दुकान से नमक ले आईये । हमारे लिये ये सूचना कतई सुखद नहीं थी क्योंकि हम उस प्रक्रिया को दोबारा नहीं भोगना चाहते थे ।


बाहर पानी झमा झम बरस रहा था और मैं सोच रहा था कि ऐसी बरसात से जेठ की लू भली। इतना सब भोगने के बाद हमारा मिजाज काफी हद तक बिगड़ चुका था क्योंकि बिजली भी जा चुकी थी।

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पत्नी के बाद पेंशन पर बेटी का हक । (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on जून 1, 2010

=>अम्मा अब कुछ दिनों के लिये सुधा के यहां भी रह आओ । जीजाजी का फोन आया था कि सासू मां की बड़ी याद आ रही है, कुछ हम भी मम्मी की सेवा करलें ।

न्यूज: पत्नी के बाद बेटी को भी मिलेगी पेंशन । केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के 37 लाख कर्मचारियों के परिजन लाभान्वित होंगे । 1 जनवरी 1990 के बाद के सभी कर्मचारी और पेंशनभोगियों को मिलेगा नियम का लाभ ।

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विश्व तंबाकू निषेध दिवस, 31 मई (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on मई 30, 2010

=> Wills is the secret of my energy.

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भारत में दिशाशूल (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on मई 29, 2010


नक्सलियों की कृपा से आजकल भारत में दिशाशूल योग चल रहा है । बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश जाने वाली रेलें नक्सलियों की कृपा से पटरी से बहक बहक उतर रही हैं । रेलों का बहकना देख कर मेंगलौर हवाई पट्टी पर एयर इंडिया का एक विमान लैंड करते करते बहक गया और 158 यात्रियों को दूसरे जहान की लंबी हवाई यात्रा पर ले उड़ा । रोड एक्सीडेंट का यह हाल है कि सड़क पर दुनिया में सबसे ज्यादा मौतें भारत में ही हो रही हैं ।

पहले सोच रहा था कि गरमी छुट्टी में बच्चों को गांव घुमा लाऊं । सिद्धार्थ जी और गिरिजेश राव जी दोनो अपनी पोस्ट में मार गांव की अमराई, छप्पर, पुआल, जोन्हरी, बजरी ठेलते रहते हैं । चलके हम भी गावं का लुत्फ उठा आयें । सवेरे सवेरे लोटा लेकर पड़ोसी के खेत में खाद सप्लाई करने का अपना ही आनंद है । पेट की सफाई भी हो जाती है और सवेरे सवेरे दान पुन्य भी हो जाता है । हर गांववासी सवेरे सवेरे पुण्य कर्म से ही दिन की शुरूआत करता है ।

मैं तेरे खेत में ।
तू मेरे खेत में ।
दोनो तिनके की ओट में ।

पर इत्ती सारी दुर्घटनाओं को देख कर अब कहीं आने जाने का मन नहीं कर रहा है । ज्ञान काका रेलवे के अस्पताल से वापिस आ जायें तो उनके साथ सुबह सुबह गंगा स्नान करने चला जायेगा ।

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