तू कैसा तेरा मैक़दा कैसा साकी,
तुझसे मिलकर भी है अब प्यास बाकी|
अब क्या करेगें मैक़दे का साकी|
न पीने की आरज़ू न अब तशनगी बाकी|
जब दो क़दम चलने को है मजबूर,
न सफरे शौक न अब मंज़िले तलब बाकी|
गुलिस्ताँ को लग गई खिजा की नज़र,
फूलों में शगुफ्तगी न अब ताज़गी बाकी|
खवाहिशे तो है फ़ित्रते नफस की तड़फ
न रंजो अलम न अब दर्दो सितम बाकी|
इस खुदपरस्त जहां में अब 'शकील',
न दोस्ती न किसी से अब दुश्मनी बाकी|
Wednesday, May 12, 2010
Friday, May 7, 2010
बिजलियाँ
हम पर ये ज़ुल्मत कहाँ तक,
ये जफ़ा ये सितम कहाँ तक|
ये तेरे हुस्न की अदाए है' शकील',
तेरा ग़म आख़िर उठाये कहाँ तक|
सितम है या करम आजमाए कहाँ तक,
ज़ख्मे दिल अपने गिनाये कहाँ तक|
तोहमत है हम पर बे-वफाई का तेरा,
गिला अपने दिल का सुनाये कहाँ तक|
ये हुस्नों अदायों की घटाए कहाँ तक,
ये बिजलियाँ हम पर गिरेगीं कहाँ तक|
ये जफ़ा ये सितम कहाँ तक|
ये तेरे हुस्न की अदाए है' शकील',
तेरा ग़म आख़िर उठाये कहाँ तक|
सितम है या करम आजमाए कहाँ तक,
ज़ख्मे दिल अपने गिनाये कहाँ तक|
तोहमत है हम पर बे-वफाई का तेरा,
गिला अपने दिल का सुनाये कहाँ तक|
ये हुस्नों अदायों की घटाए कहाँ तक,
ये बिजलियाँ हम पर गिरेगीं कहाँ तक|
Thursday, May 6, 2010
बेगाना
इश्क़ में लोग हमें दीवाना कहने लगे ,
आशिक़ों को कब बख्शा है ज़माने ने,
हर अदा को ही आशिक़ाना कहने लगे|
जो गुज़रे हम तेरे दर से जब एक दम,
तेरे दर को हमारा आस्ताना कहने लगे|
फ़ना है हर ज़र्रा इस कायनाते जहाँ का,
हमारे इश्क़ को क्यों अफसाना कहने लगे|
ख़ुदा महफूज़ रखे इश्क़ को हर दिल में,
हमारे दिल को क्यों आशियाना कहने लगे|
आखों में कशिश,सीने में तपिश है फित्रते दिल,
फिर क्यों'शकील' हमें सब दीवाना कहने लगे|
अपने ही खुद हमें बेगाना कहने लगे|
हर अदा को ही आशिक़ाना कहने लगे|
तेरे दर को हमारा आस्ताना कहने लगे|
इश्क़ तो फ़ित्रत है इंसा के मिज़ाज की,
क्यों सब हमें उनका दीवाना कहने लगे|
किसका ज़ोर चला है भला इश्क़ पर,
क्यों सब हमें उनका दीवाना कहने लगे|
किसका ज़ोर चला है भला इश्क़ पर,
मुहब्बत को क्यों ग़म उठाना कहने लगे|
हुस्न को है कहाँ तबो-ताब इश्क़ के बिना,
क्यों हमारे कलाम को सूफ़ियाना कहने लगे|
फ़ना है हर ज़र्रा इस कायनाते जहाँ का,
हमारे इश्क़ को क्यों अफसाना कहने लगे|
ख़ुदा महफूज़ रखे इश्क़ को हर दिल में,
हमारे दिल को क्यों आशियाना कहने लगे|
आखों में कशिश,सीने में तपिश है फित्रते दिल,
फिर क्यों'शकील' हमें सब दीवाना कहने लगे|
Wednesday, May 5, 2010
आवारगी
मै से सेर होती है हर रोज़ तशनगी मेरी,
खूब मज़े से गुज़र रही है अब ज़िंदगी मेरी|
पूजता हूँ बुतखाने में जाकर देवताओं को,
ख़ुदा वाहिद पर मुनहसिर कहाँ बंदगी मेरी|
जिससे चाहता हूँ तबियत बहलाता हूँ अपनी,
जिससे चाहता हूँ बुझा लेता हूँ दिल लगी |
मन्ज़िलों से भी आगे मन्ज़िले ज़िंदगी मेरी,
मन्ज़िल की जुस्तजू है अब आवारगी मेरी|
मै भी पीता हूँ और साकी भी है साथ मेरे ,
बड़ा ही लुत्फ़ देती है ज़िंदगी-ए-मैकशी मेरी|
पी के बदा अक्सर नशे में डूबा रहता हूँ,
कितनी महफूज़ है गर्दिशे दौरा से बेखुदी मेरी|
हशोखिरद को भी अब है ज़रूरत मेरी,
हसद है ज़माने को अब जिन्दज़ी मेरी|
मेरी परवाज़ में बलान्दियाँ है फ़लक की'शकील'
आसमाँ पर मुतमव्विज़ है अब दीवानगी मेरी|
(मै-शराब, तशनगी-शराब की प्यास, सेर-संतुष्टि, वाहिद-केवल एक, बदा- शराब,हशोखिरद- अक्ल और तमीज़, मुतमव्विज़- मौज मारता हुआ, हसद-ईर्ष्या
खूब मज़े से गुज़र रही है अब ज़िंदगी मेरी|
पूजता हूँ बुतखाने में जाकर देवताओं को,
ख़ुदा वाहिद पर मुनहसिर कहाँ बंदगी मेरी|
जिससे चाहता हूँ तबियत बहलाता हूँ अपनी,
जिससे चाहता हूँ बुझा लेता हूँ दिल लगी |
मन्ज़िलों से भी आगे मन्ज़िले ज़िंदगी मेरी,
मन्ज़िल की जुस्तजू है अब आवारगी मेरी|
मै भी पीता हूँ और साकी भी है साथ मेरे ,
बड़ा ही लुत्फ़ देती है ज़िंदगी-ए-मैकशी मेरी|
पी के बदा अक्सर नशे में डूबा रहता हूँ,
कितनी महफूज़ है गर्दिशे दौरा से बेखुदी मेरी|
हशोखिरद को भी अब है ज़रूरत मेरी,
हसद है ज़माने को अब जिन्दज़ी मेरी|
मेरी परवाज़ में बलान्दियाँ है फ़लक की'शकील'
आसमाँ पर मुतमव्विज़ है अब दीवानगी मेरी|
(मै-शराब, तशनगी-शराब की प्यास, सेर-संतुष्टि, वाहिद-केवल एक, बदा- शराब,हशोखिरद- अक्ल और तमीज़, मुतमव्विज़- मौज मारता हुआ, हसद-ईर्ष्या
Sunday, April 25, 2010
मिज़ाजे ग़म
मिज़ाजे ग़म की जिन्हें कोई ख़बर नही होती,
ख़ुशी में भी कही उन्हें ख़ुशी मय्यसर नही होती|
जो जलते है चिराग़ बन के तेरी महफिल में,
उनके घर में कभी चिरागे रौशनी नही होती|
ग़म-ऐ- इश्क में जब तक न हुस्न शामिल हो,
ग़म-ऐ- मोहब्बत में कभी दिलकशी नही होती|
बे-वफाई के इस जहाँ में वफ़ा का नाम न ले,
वफ़ा के नाम से अब हमें कोई ख़ुशी नही होती|
मेहरबनिया तो बड़ी चीज़ है दोस्ती के पहलू में,
दुश्मनी में भी तो अब कुछ शाइस्दगी नही होती|
शरीके ग़म बनाने चले हो जहाँ में किसे 'शकील'
शरीके ग़म ये दुनिया कभी किसी के नही होती|
ख़ुशी में भी कही उन्हें ख़ुशी मय्यसर नही होती|
जो जलते है चिराग़ बन के तेरी महफिल में,
उनके घर में कभी चिरागे रौशनी नही होती|
ग़म-ऐ- इश्क में जब तक न हुस्न शामिल हो,
ग़म-ऐ- मोहब्बत में कभी दिलकशी नही होती|
बे-वफाई के इस जहाँ में वफ़ा का नाम न ले,
वफ़ा के नाम से अब हमें कोई ख़ुशी नही होती|
मेहरबनिया तो बड़ी चीज़ है दोस्ती के पहलू में,
दुश्मनी में भी तो अब कुछ शाइस्दगी नही होती|
शरीके ग़म बनाने चले हो जहाँ में किसे 'शकील'
शरीके ग़म ये दुनिया कभी किसी के नही होती|
उम्रे हयात
उम्रे हयात की जब शाम आती है,
न नमाज़ न तौबा काम आती है|
तेरी रहबरी भी रहज़नी से कम नही,
मेरी आवारगी भी रहनुमाई के काम आती है|
उजाला ही नही सब कुछ राहे तमन्ना में,
तीरगी हो तो अक्सर बसीरत काम आती है|
समझ लेते है हम मुश्किलों को मुसीबत,
मुश्किलें ही अक्सर मुसीबतों के काम आती है|
वफ़ा की तो सब करते है उम्मीद 'शकील',
बे-वफाई भी तो दुश्मनी निभाने के काम आती है|
( हयात-ज़िंदगी,रहबरी-पथ-प्रदर्शन,रहज़नी-लूटेरापन,
तीरगी-अंधकार,बसीरत-दिल की नज़र/प्रतिभा,खुदगर्ज़ी-स्वार्थपरता )
न नमाज़ न तौबा काम आती है|
तेरी रहबरी भी रहज़नी से कम नही,
मेरी आवारगी भी रहनुमाई के काम आती है|
उजाला ही नही सब कुछ राहे तमन्ना में,
तीरगी हो तो अक्सर बसीरत काम आती है|
समझ लेते है हम मुश्किलों को मुसीबत,
मुश्किलें ही अक्सर मुसीबतों के काम आती है|
उनकी वादा खिलाफी पे है क्यो हंगामा बरपा,
खुदगर्ज़ी भी तो आज़माने के काम आती है|
वफ़ा की तो सब करते है उम्मीद 'शकील',
बे-वफाई भी तो दुश्मनी निभाने के काम आती है|
( हयात-ज़िंदगी,रहबरी-पथ-प्रदर्शन,रहज़नी-लूटेरापन,
तीरगी-अंधकार,बसीरत-दिल की नज़र/प्रतिभा,खुदगर्ज़ी-स्वार्थपरता )
Friday, April 23, 2010
यार
तुम दिल में यार बन के रहते हो,
तन्हाइयों में ख़याल बन के रहते हो|
दिलों की कशिश कहाँ है नुमायाँ,
जिगर में तुम दर्द बन के रहते हो|
चेनो-करार से तौबा मेरी तौबा ,
सकून में भी बेचेन बन के रहते हो|
नजरे मिले या झुके ज़मी पर,
तुम आँखों में नूर बन के रहते हो|
शब की तारिकियों में है सन्नाटा ,
गमे जुदाई हो या मिलन की ख़ुशी,
तुम दिल में लहू बन के रहते हो|
किस को सुनाये दास्ताँ-ए-दिल,
तुम कहीं रहो मगर नज़र में रहते हो|
यूँ तो तग़य्युराते ख़याल है बहुत,
मगर तुम तसव्वुर बन के रहते हो|
ये ज़रूरी नहीं'शकील' तुम कुछ कहो,
खामोश मगर तुम जुबां पर रहते हो|
( तग़य्युराते-बदलाव )
तन्हाइयों में ख़याल बन के रहते हो|
दिलों की कशिश कहाँ है नुमायाँ,
जिगर में तुम दर्द बन के रहते हो|
चेनो-करार से तौबा मेरी तौबा ,
सकून में भी बेचेन बन के रहते हो|
नजरे मिले या झुके ज़मी पर,
तुम आँखों में नूर बन के रहते हो|
शब की तारिकियों में है सन्नाटा ,
नींद में तुम ख्वाब बन के रहते हो|
गमे जुदाई हो या मिलन की ख़ुशी,
तुम दिल में लहू बन के रहते हो|
किस को सुनाये दास्ताँ-ए-दिल,
तुम कहीं रहो मगर नज़र में रहते हो|
यूँ तो तग़य्युराते ख़याल है बहुत,
मगर तुम तसव्वुर बन के रहते हो|
ये ज़रूरी नहीं'शकील' तुम कुछ कहो,
खामोश मगर तुम जुबां पर रहते हो|
( तग़य्युराते-बदलाव )
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