शनिवार, ९ जनवरी २०१०

अखबारों पर भरोसा बरकरार

उमेश चतुर्वेदी
अमेरिका और यूरोप में जैसे-जैसे इंटरनेट का प्रसार बढ़ता जा रहा है, अखबारों के प्रसार में गिरावट देखी जा रही है। इसके चलते वहां अखबारों के अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगा है। चार साल पहले ब्रिटेन की पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित कवर स्टोरी- हू किल्ड द न्यूजपेपर – के बाद ये सवाल जबर्दस्त तरीके से उछला। ऐसी हालत में प्राइसवाटर हाउसकूपर की ताजा रिपोर्ट अखबारी दुनिया को राहत दे सकती है। वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूज पेपर्स की पहल पर प्राइसवाटर हाउसकूपर ने हाल ही में अमेरिका और ब्रिटेन के 4900 पाठकों, तीस बड़े मीडिया घराने और दस बड़ी विज्ञापनदाता कंपनियों से सर्वे के बाद एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट से साफ हुआ है कि भले ही पश्चिमी दुनिया में अखबारों की बजाय इंटरनेट को ज्यादा तरजीह दी जाने लगी है। लेकिन अब भी ज्यादातर लोगों को प्रिंट पर ही भरोसा है। जबकि सिर्फ बासठ फीसदी लोग ही पैसे देकर इंटरनेट पर उपलब्ध या अखबारों के डिजिटल संस्करणों को पढ़ने के लिए तैयार हैं। पश्चिमी अखबारी जगत के लिए ये रिपोर्ट जहां चौंकाने वाली है, वहीं इंटरनेट के प्रति अखबारी संस्थानों के बढ़ते भरोसे को संतुलित करने के लिए भी काफी है। अखबारी प्रसार में गिरावट के बाद मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक के प्रकाशनों समेत द टाइम्स न्यूयार्क जैसे प्रकाशन भी अपने इंटरनेट संस्करणों की पाठकों के बीच मुफ्त पहुंच को सीमित करने के लिए जरूरी सॉफ्टवेयर के विकास में जुट गए हैं। ताकि इन प्रकाशनों के इंटरनेट संस्करणों तक उन्हीं पाठकों की पहुंच हो, जो इसके लिए कीमत चुकाने को तैयार हों। लेकिन प्राइसवाटर हाउसकूपर की इस रिसर्च रिपोर्ट से साफ है कि विकसित दुनिया के पाठकों में इंटरनेट के प्रति वैसा भरोसा नहीं है, जैसा कि प्रिंट के प्रति है। क्योंकि प्रिंट के लिए अब भी शत-प्रतिशत लोग कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं।
परंपरा की पूंजी के चलते चाहे पूरब का समाज हो या पश्चिम का, प्रिंट बड़ी ताकत बना हुआ है। यही वजह है कि पाठकों का उसमें भरोसा बना हुआ है। यही वजह है कि विज्ञापनदाताओं का भी उन पर भरोसा बरकरार है। इसकी तस्दीक प्राइसवाटर हाउस कूपर की रिसर्च रिपोर्ट भी करती है। रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल माध्यमों की ओर विज्ञापन का प्रवाह बढ़ रहा है। लेकिन विज्ञापनदाता गंभीर और भरोसेमंद पाठकों को लुभाने के लिए अखबारों पर ही ज्यादा भरोसा जता रहे हैं। इसमें उन अखबारों की संभावना ज्यादा बेहतर नजर आ रही है, जिन्होंने अपने डिजिटल या इंटरनेट या फिर दोनों तरह के संस्करण शुरू कर रखे हैं। यानी उन अखबारों पर विज्ञापनदाताओं का भरोसा बना हुआ है, जो बदलते दौर में नई तकनीक को आत्मसात करने में पीछे नहीं हैं। हालांकि इस रिपोर्ट में ये अफसोस भी जताया गया है कि यह चलन अभी ज्यादातर अखबार समूहों में शुरू नहीं हो पाया है। बहरहाल रिपोर्ट ने उम्मीद जताई है कि बाजार में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए देर-सबेर सभी प्रकाशनों को अपने डिजिटल या इंटरनेट संस्करणों को बेहतर बनाना ही पड़ेगा।
वैसे वैश्विक मंदी और आर्थिक संकट के चलते ये भी सच है कि अखबारों की राह कठिन हुई है। प्राइसवाटर हाउस कूपर की इस रिपोर्ट में भी अनुमान लगाया गया है कि समाचार पत्रों के ग्लोबल बाजार में इस साल 10.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जाएगी। और 2013 तक इसमें हर साल करीब दो प्रतिशत की गिरावट देखी जाएगी। प्राइसवाटर हाउसकूपर की रिपोर्ट ने विज्ञापनों में गिरावट की भी उम्मीद जताई है। यही वजह है कि अखबारों के लिए विज्ञापनों में कमी आई है। कूपर की रिपोर्ट के ही मुताबिक खुद मीडिया संस्थान ही मानते हैं कि वैश्विक मंदी और विज्ञापनों में गिरावट के चलते वे अपना घाटा 2011 में ही पूरा कर पाएंगे। यानी उम्मीद की किरणें बनी हुई हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि अखबार कैसे बचे रह सकते हैं। प्राइसवाटर हाउसकूपर की रिपोर्ट से साफ है कि पाठकों के भरोसे के चलते विज्ञापन उद्योग का प्रिंट पर भरोसा बना रहेगा। लेकिन यह भी सच है कि पाठकों के भरोसे को बनाए रखने के लिए प्रिंट को नए-नए प्रयोग भी करने होंगे। इसकी तस्दीक द इकोनॉमिस्ट को दिए अपने एक इंटरव्यू में मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक ने भी की थी। उन्होंने कहा था कि मीडिया हाउसों ने अपने प्रिंट संस्करणों के जरिए अकूत कमाई तो की, लेकिन अपने इन दुलारे प्रकाशनों के टिकाऊ विकास के लिए अनुसंधान और नये प्रयोगों पर पैसे खर्च करने के बारे में कभी नहीं सोचा। कहना ना होगा कि भारत के भी बड़े मीडिया संस्थान मर्डोक की इस बात से सहमत नजर आ रहे हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम आईएनएस के अध्यक्ष और बॉम्बे समाचार समूह के प्रमुख होर्म्सजी कामा को भी कहना पड़ा कि बदलते दौर के मुताबिक खुद को नए रूप में ढालने के लिए समाचार-पत्रों को तैयार होना पड़ेगा। इसके लिए शोधपरक अध्ययन भी करना होगा। और तो और उन्होंने माना कि वही अखबार बाजार में मजबूती के साथ खड़े रहेंगे, जो अपनी डिजाइन, ले-आउट और स्वरूप में नयापन लाने की सफल कोशिश करेंगे।
जब-जब कोई नया माध्यम आता है, पुराने की मौत की आशंका जताई जाने लगती है। रेडियो- टीवी के आने के दौरान भी ऐसा ही हुआ था। लेकिन नई चुनौतियों से जूझते हुए प्रिंट माध्यम ने खुद को मजबूती से खड़ा होने का रास्ता तलाश लिया था और आगे बढ़ते रहे। ये सच है कि एक बार फिर उनके सामने ऐसी चुनौती आ खड़ी हुई है, लेकिन यह भी सच है कि इससे निबटने और खड़ा होने का रास्ता तलाश ही लेंगे।

बुधवार, ६ जनवरी २०१०

टैम की माया के सामने खुलते जिंदगी के राज


उमेश चतुर्वेदी

मौजूदा प्रतिस्पर्धा में कुछ नया करके अपनी पहचान बनाए रखते हुए टीआरपी की दौड़ में अहम स्थान बनाए रखने की अंतहीन कवायद में मनोरंजन चैनल भी जुट गए हैं। इसके लिए हर चैनल नए-नए आइडिया को लेकर आगे आ रहा है। बुद्धू बक्से के पर्दे पर रियलिटी शो की भरमार इसी का नतीजा है। इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ा है एनडीटीवी इमैजिन के शो - राज पिछले जन्म का। पास्ट लाईफ रिग्रेशन सिस्टम यानी पिछली जिंदगी को याद करके पिछली जिंदगी के राज खोलने वाले इस शो की शुरूआत सात दिसंबर से हो गई है। इसकी शुरूआत में टीवी और फिल्म की दुनिया की प्रमुख और बिकाऊ चेहरों वाली हस्तियां मसलन शेखर सुमन, सेलिना जेटली, संभावना सेठ, मोनिका वेदी आदि भी अपनी जिंदगी के राज खोल चुकी हैं, लिहाजा इसकी चर्चा जमकर हो रही है। नए-नए आइडिया की बाजीगरी दिखाने वाली भारतीय टीवी की दुनिया में चूंकि ये बिल्कुल ताजा और अपनी तरह का अनूठा आइडिया है, लिहाजा इसकी ओर दर्शक आकर्षित भी हो रहे हैं। लेकिन इस शो और इसमें पेश किए जाने वाली तकनीक और उसके जरिए संयोगों को जोड़ने को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।
इसकी वजह बने हैं मशहूर हस्तियों के पूर्व जन्म के कथित खुलासे। मनोचिकित्सक डॉ. तृप्ती जेईन की मदद से मोनिका वेदी के पिछले जन्म का जो राज खुला, वह चौंकाने वाला है। ये पूरी दुनिया जानती है कि मोनिका वेदी को माफिया डॉन अबू सलेम से संबंधों के चलते सुर्खियों में रहीं। उन्हें पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के जरिए भारत लाया गया। उन पर अबू सलेम के साथ कई मामलों में मुकदमे भी चले। पूरी दुनिया जानती है कि उन्होंने अबू सलेम के साथ पुर्तगाल में शरण इसलिए ली थी, क्योंकि पुर्तगाल से भारत की प्रत्यर्पण संधि नहीं थी। फिर पुर्तगाल उन देशों में शामिल हैं, जहां भयंकर अपराधियों को भी मौत की सजा नहीं दी जाती। उन्हें और उनके पुराने दोस्त अबू सलेम को कानून की ये बारीकियां पता थीं। इसका फायदा वे उठाते रहे। ना जाने कितने पापड़ बेलने के बाद ही भारत सरकार उन्हें यहां लाने में कामयाब हो पाई। लेकिन राज पिछले जन्म में हिस्सा लेने के बाद उन्हें पता चला कि पूर्व जन्म में वह ईसाई थीं। इतना ही नहीं, उनके तीन बच्चे भी थे। जिनमें से एक बेटी का नाम नीमा था। उन्हें लग रहा है कि वह
ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हो रही हैं। मोनिका का दावा है कि पहले उन्हें इसकी वजह पता नहीं थी। लेकिन शो में आने के बाद उन्हें पता चला कि अपने पिछले जीवन में वह ईसाई थीं।
भोजपुरी फिल्मों की हेलन और बॉलीवुड की आइटम गर्ल के तौर पर विख्यात संभावना सेठ को इस शो में आने के बाद पता चला कि वह पूर्व जन्म में मुस्लिम लड़की थीं। उनका पिछला जन्म अच्छा नहीं था। उनके घरवाले उनपर काफी अत्याचार करते थे और बहुत कम उम्र में ही उनकी मौत भी हो गई। बाबा रामदेव को चुनौती देने वाली संभावना सेठ अपनी आक्रामक छवि के लिए भी जानी जाती हैं। अच्छी और बोल्ड डांसर के तौर पर विख्यात संभावना को अब अपनी असल जिंदगी के तार भी पिछली जिंदगी में दिखने लगे हैं। इस शो में पता चला कि वे पूर्व जन्म में बार डांसर थीं। जाहिर है कि इस जन्म के बोल्ड डांस के पीछे उनकी पूर्व जन्म की ये कहानी ही वजह नजर आ रही है।
टेलीविजन की दुनिया के सुपर स्टार शेखर सुमन भी इस शो के जरिए अपने पूर्व जन्म का राज जान चुके हैं। इसके मुताबिक पूर्व जन्म में वे ब्रिटिश नागरिक थे और उनके यहां जबर्दस्त आग लगी थी, जिसमें उनके बच्चों की मौत हो गई थी। यहां ये बता देना जरूरी है कि करीब पंद्रह साल पहले शेखर सुमन के एक बच्चे की हृदय की बीमारी के चलते मौत हो गई थी। इस शो में उन्हें इस मौत के पीछे भी पूर्व जन्म की वह आग ही नजर आई। ये तो हुई शो में शामिल हस्तियों की बात। चैनल का कहना है कि इस शो में नील नितिन मुकेश समेत कई और हस्तियां भी शामिल होंगी। इस शो में भोपाल की स्वाति सिंह भी शामिल हो चुकी हैं। जिन्हें 1966 में एक विमान हादसे से गुजरना पड़ा था। इसका डर उन पर इस कदर बैठ गया कि वे विमान में बैठने से ही घबराने लगीं। लेकिन इस शो में आने के बाद पता चला कि उनके पिछले जन्म की कई घटनाएं उनके व्यक्तित्व पर हावी रही हैं।
जिन्होंने महान मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड को पढ़ा है, उन्हें पता है कि फ्रायड ने करीब एक सदी पहले ही बता दिया था कि हर व्यक्ति का मन दरअसल दो स्तरों पर सक्रिय रहता है। एक चेतन, जिसमें व्यक्ति को पता होता है कि वह क्या कर रहा है या फिर क्या पढ़ रहा है। मन का एक स्तर होता है अवचेतन। इसमें व्यक्ति का मन अनजाने में ही अपनी जिंदगी और अपने आसपास की घटनाओं को रिकॉर्ड करते जाता है। फ्रायड कहते हैं कि सबकांशस या अवचेतन की जब भी अवस्था आती है या फिर व्यक्ति कभी सपने देखता है तो अवचेतन की ये घटनाएं ही उसे दिखाई पड़ती हैं। मनोचिकित्सक सम्मोहन के जरिए अवचेतन में बैठी धारणाओं को मनोरोगियों के मन से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। इस लिहाज से देखा जाय तो राज पिछले जन्म का – फ्रायड के उसी सिद्धांत के आधार पर काम कर रहा है। इस लिहाज से यह विषय नया तो नहीं है, लेकिन इसे अभी सार्वजनिक तौर पर पहले कभी पेश नहीं किया गया है, इस अर्थ में ये शो नया तो जरूर है। वैसे भी आज की शहरी जिंदगी में इतने उतार-चढ़ाव हैं, इतनी समस्याएं हैं कि अच्छे-भले लोग भी मानसिक विकारों के शिकार हो जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस देश में करीब दो करोड़ लोग मानसिक रोगों से परेशान हैं। जाहिर है, ऐसे में इस शो को लोगों की उत्सुकता की वजह तो बनना ही था और बना भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो इस शो में हिस्सा लेने के लिए अब तक आठ हजार लोग रजिस्टर्ड नहीं हो पाते। वैसे किसी की निजी जिंदगी में झांकना और उसे लेकर व्याख्याएं सबके सामने करना, उस व्यक्ति की निजीपन में सेंध का ही मामला है। लेकिन जब सामने वाला खुद ही अपनी जिंदगी के राज पूरी दुनिया के सामने खोलने को उतावला हो तो इस पर सवाल उठाना ही बेमानी है। लेकिन ये भी सच है कि कई लोग अब भी हैं, जो अपनी पुरानी या पिछली जिंदगी के राज खोलने को तैयार नहीं हैं। और तो और, इस कार्यक्रम को पेश कर रहे भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता रवि किशन अब तक इसके लिए तैयार नहीं हो पाए हैं। कहा तो ये जा रहा है कि वे अपनी पिछली जिंदगी के खुलासे को लेकर डरे हुए हैं। लेकिन एक सच तो ये भी है कि उन्हें कहीं ना कहीं ये लगता है कि उनके विगत के खुलासे से उनकी अब तक की बनी-बनाई छवि पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
चैनलों की आपसी गलाकाट प्रतियोगिता में अब पत्रकारिता की पुरानी मान्यताएं धूमिल पड़ती जा रही हैं। कीहोल यानी बेडरूम में झांकने वाली पत्रकारिता सभ्य समाज में अब भी स्वीकार्य नहीं है। लेकिन बाजार में बने रहने और टीआरपी वाली नांव की पहली सीट पर सवारी करने का दबाव इतना ज्यादा बढ़ गया है कि मान्यताओं की परवाह कोई नहीं करता। चैनल पर अपने अस्तित्व और आर्थिक संकट का दबाव काम करता है तो व्यक्ति की निजी जिंदगी में चमत्कार की उम्मीदें उसे सब कुछ करने के लिए मजबूर करती हैं। राज पिछली जिंदगी का जैसा शो भी दोनों तरह के दबावों के कोलाज से तैयार है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि अभी कुछ ही महीने पहले सच का सामना नाम का एक शो आया था। वहां सचाई का सामना करना और देखना तो शुरू में दर्शकों और प्रतिभागियों को अच्छा तो लगा, लेकिन अब उसकी चर्चा भी कभी-कभार ही हो पाती है। सच का सामना का मौजूदा हश्र इस बात का गवाह है कि अगर राज पिछले जन्म का में भी अगर समस्याओं का दुहराव होता रहा तो ताजा आइडिया वाला भी ये शो ज्यादा दिन तक लोगों को ड्राइंग रूम में साथ बैठने की वजह बना नहीं रह सकेगा।

शनिवार, ५ दिसम्बर २००९

भदेसपन की बुद्धू बक्से में प्रभावी दस्तक


उमेश चतुर्वेदी
बुद्धू बक्से के पर्दे पर बिहार और उत्तर भारतीय हिंदी भाषियों को अब तक दरबान, चपरासी और मजाक का पात्र बनते रहे उत्तर भारतीय हिंदीभाषी अब कहानियों के केंद्र में हैं और मजे की बात ये है कि इनकी उपस्थिति अब टीआरपी की दौड़ में सफलता की गारंटी भी मानी जा रही है। अगले जनम मोंहे बिटिया ही कीजौ, सबकी जोड़ी वही बनाता-भाग्यविधाता, तेरे मेरे सपने, ना आना इस देस लाडो और बैरी पिया जैसे धारावाहिक इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि बाजार के दबाव में भी कभी हंसोड़ और मजाक के पर्याय रहे उत्तर भारतीय छोटे शहरों की पृष्ठभूमि वाली कहानियां भी अब बुद्धू बक्से के ना सिर्फ केंद्र में हैं, बल्कि विज्ञापन के बाजार को नियंत्रित करने वाली टैम जैसी खालिस अंग्रेजी दां कंपनी की रेटिंग में भी अव्वल स्थान बनाने में कामयाब रही हैं।
पढ़े-लिखे होने का दावा करने वाले दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों में भले ही सत्ता विमर्श के केंद्र में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग आने लगे हैं, इसके बावजूद उन्हें लेकर इन महानगरों के साथ ही इनके आसपास के इलाकों के लोगों का आग्रह कम नहीं हुआ है। दिल्ली की सड़कों पर बिहारी शब्द आज भी सम्मान का पात्र नहीं है, मुंबई में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना को धूल चटाने की हैसियत रखने वाला पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का समाज उन कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की नजर में भी सम्मान हासिल नहीं कर पाया है। इसके बावजूद वह मायानगरी जैसे खालिस अंग्रेजी दां हाथों से संचालित होने वाले टेलीविजन धारावाहिकों की दुनिया में इस इलाके की देसज पृष्ठभूमि वाली कहानियां और देसज पात्र प्रमुख पात्र संभ्रांत वर्ग के ड्राइंग रूम तक प्रभावी असर बना पाए हैं तो हैरतभरे सवाल उठेंगे ही।
चाहे आजादी का आंदोलन रहा हो या फिर बाद के दौर में दिल्ली की गद्दी पर कब्जे की लड़ाई, उत्तर भारत की खास भूमिका रही है। अंग्रेजों से लोहा लेने में गंगा-घाघरा की उपजाऊ मिट्टी से निकले सपूतों ने अहम भूमिका निभाई। आजादी के बाद 1991 तक दिल्ली की गद्दी पर वही काबिज होता रहा, जिसने उत्तर भारत के सबसे बड़े इलाके उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकांश लोगों के दिलों पर राज किया। पीबी नरसिंह राव पहले प्रधान मंत्री रहे, जिनकी पार्टी को इन दोनों राज्यों से पहले की तरह सम्मान और प्यार हासिल नहीं हो पाया। इसके बावजूद इस इलाके के लोगों को सामाजिक विमर्श में वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसका वह हकदार था। लेकिन यह हालत अब बदल रही है। अंग्रेजी वर्चस्व वाली टेलीविजन की दुनिया में विमर्श और कहानी का केंद्र बन रहे इस समाज की भी स्वीकार्यता बढ़ने लगी है। यह स्वीकार्यता ही है कि चाहे अगले जनम मोहें बिटिया ही कीजौ हो या फिर सबकी जोड़ी वही बनाता-भाग्य विधाता, ठेठ उत्तर भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली कहानी और उसके देसज पात्र अब केंद्रीय भूमिका में हैं। अब उनकी कहानी भी संभ्रांत समझे जाने वाले परिवारों के लोगों की आंखों से भी आंसू लाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
पहले अंग्रेजों के खिलाफ जोरदार लड़ाई लड़ने वाले इस इलाके ने विकास की दौड़ में पिछड़कर काफी कीमत चुकाई। आजादी के बाद दिल्ली की गद्दी के दावेदारों ने इस इलाके के वोटों के लिए इस इलाके के लोगों की ताबेदारी तो की, लेकिन ये भी सच है कि उन्हें विकास की जैसी चिकनी और साफ-सफ्फाक सड़क मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली। इसके लिए इलाके के राजनेता भी ज्यादा जिम्मेदार रहे। खेती के साथ प्रधानमंत्री और असरदार मंत्रियों की भरपूज उपज यहां की धरती राजनीति और समाज को देती रही, लेकिन जो हरियाली यहां के चेहरों पर आनी चाहिए थी, उससे यहां के चेहरे हमेशा महरूम रहे। संविधान के संकल्प के मुताबिक आजादी के पंद्रह साल बाद भी अंग्रेजी इस देश के राजकाज और भाग्यविधाता की भूमिका से अलग होती नजर नहीं आई तो डॉक्टर राममनोहर लोहिया की अगुआई में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन में इसी इलाके ने जोरदार भूमिका निभाई। आज समाजवादी धारा की राजनीति में नीतीश कुमार, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे लोग असरदार बने हुए हैं, उसके पीछे भी कहीं ना कहीं लोहिया का ये आंदोलन भी रहा है। लेकिन दुर्भाग्य ये कि इस पीढ़ी के अधिकांश नेताओं ने सत्ता की सवारी करने के बाद अपने इस आंदोलन और आंदोलन की साथी रही अपनी जनता को भी भुलाने में देर नहीं लगाई। जब कर्णधार ही अपने लोगों का सम्मान नहीं करेंगे, दुनिया क्योंकर सम्मानित करती। दूसरी बात ये हुई कि अंग्रेजी विरोधी आंदोलन के बावजूद हिंदी का वर्चस्व राजकाज की दुनिया में नहीं बढ़ा तो अंग्रेजी को लेकर एक खास तरह की कट्टरता का भी विस्तार हुआ। इन कट्टरवादियों की नजर में अंग्रेजी ना जानने वाले लोग हंसोड़ और मजाक के साथ ही उपहास के ही पात्र बन गए। कहना ना होगा, फिल्मी दुनिया हो या फिर टेलीविजन का रूपहला संसार - वहां बिहार या उत्तर प्रदेश के लोग भदेस और देसज रूप में ही सामने आते रहे। बाद के दौर में भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच जब राजनीति विदूषक जैसी भूमिका में आ गई तो इस इलाके के लोग और भी ज्यादा मजाक और दया के पात्र बन गए। सही मायने में फिल्मी और टेलीविजन के पर्दे भी इसी दुनिया की ही कॉपी कर रहे थे।
यहीं पर याद आते हैं खुशवंत सिंह। भारतीय अंग्रेजी लेखन और पत्रकारिता में खुशवंत सिंह सम्मानित नाम है, लेकिन खांटी हिंदीभाषियों को उनकी कई टिप्पणियां चुभती रही हैं। हिंदी की दुनिया में भी सम्मान के साथ पढ़े जाने के बावजूद हिंदीवालों को लेकर उनके विचार आग्रही ही रहे हैं। एक बार उन्होंने हिंदी की संप्रेषणीयता पर यह कहते हुए सवाल उठाया था कि उसके पास रैट और माउस के लिए एक ही शब्द चूहा ही है। इसी तरह उनकी नजर में उत्तर भारतीयों ने चूंकि अंग्रेजी की पढ़ाई नहीं की – यही वजह है कि उन्हें ज्यादातर दरबान या चपरासी की नौकरियां ही करनी पड़ीं हैं। खुशवंत सिंह भी भारत के उसी अंग्रेजीदां तबके के ही प्रतिनिधि रहे हैं। जिनकी सोच हिंदीभाषियों और खासकर उत्तर भारतीयों को लेकर पूर्वाग्रही रही है।
हालांकि उत्तर भारत की तस्वीर का एक उजला पक्ष भी है। भदेसपन और देसज संस्कारों के साथ ही अंग्रेजी विरोध के चलते जो उत्तर भारत और बिहार कथित संभ्रांत भारतीयों के लिए आशंका की वजह रहे हैं, वहां पढ़ाई को लेकर भी खासतरह की भूख बढ़ी है। केंद्रीय सिविल सेवाओं के लिए यहां के छात्रों के उत्साह को देखिए कि ये परीक्षाएं आयोजित करने वाले संघ लोक सेवा आयोग की ही पिछले साल की एक रिपोर्ट बताती है कि 2015 तक देश के सभी तकरीबन छह सौ जिलों का डीएम या एसपी या फिर दोनों बिहारी ही होगा। इस बीच भदेसपन और जंगलराज का पर्याय रहे बिहार में भी बदलाव की बयार बह रही है। वहां भी सत्ता तंत्र को लेकर भरोसा बढ़ा है। हालांकि वह भरोसा भी अभी काफी नहीं है। लेकिन बदलाव की शुरूआत ने देश की सोच भी बदली है। लिहाजा अब बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग भी सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। उनकी चिंताओं और परेशानियों की ओर भी ध्यान जा रहा है। यही वजह है कि अब किसी चैनल का ध्यान तेरे मेरे सपने के जरिए अब खालिस उत्तर भारतीय गांवों के सपने बेचने का बहाना मिल गया है या फिर अगले जनम मोहें बिटिया ही कीजौ की लाली के बहाने बिहार की लड़कियों और जमींदारी प्रथा की कुरीतियों को बेचने का बाजार बनने लगा है।
यहां हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को अपनी यूएसपी अपना देसज स्वरूप ही नजर आती रही है। उसी देसज से देश का संभ्रांत किस्म का इलाका परहेज करता रहा है। परहेज ही क्यों हंसी भी उड़ाता रहा है। फिल्म और टेलीविजन की दुनिया भी इसका अपवाद नहीं रही है। प्रकाश झा, शत्रुघ्न सिन्हा और आशुतोष राणा जैसे खांटी हिंदी और देसज पृष्ठभूमि वाले लोगों के फिल्मी दुनिया में आने के बावजूद भी मायानगरी के नजरिए में खास बदलाव नहीं आया। लेकिन अब इसे लेकर बदलाव नजर आ रहा है तो इसकी एक मात्र वजह सिर्फ सियासी परिवर्तन का चक्र ही नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हंसी का पात्र रहे इस देसज इलाके में भी बाजार ने नए तरह से पैठ बनाई है। निश्चित तौर पर इसमें सियासी बदलाव की बयार ने यहां की खुशहाली में अहम भूमिका निभाई है। इसके साथ ही पिछले दो दशक से यह इलाका जिस तरह केंद्रीय राजनीति में भूमिका नहीं निभा पा रहा था, उसमें भी बदलाव आ रहा है। अब यह इलाका एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श की दुनिया में प्रभावी भूमिका निभाने की तैयारी में जुट गया है। इस इलाके के मानस में एक बदलाव ये भी आया है कि अब यह भूमिका खाली हाथ नहीं निभाई जाएगी, बल्कि इसकी कीमत भी वसूली जाएगी। जब समाज इस तरह उठ खड़ा होता है, उसे विमर्श के केंद्रों को भी उचित अहमियत देनी पड़ती है। कहना ना होगा- फिल्म और टेलीविजन की ये दुनिया भी वही कर रही है। इस समाज को सम्मानित कर रही है।

गुरुवार, ३ दिसम्बर २००९

ह्वाइट हाउस में हिंदी का जयघोष


उमेश चतु्र्वेदी
हिंदुस्तानी महानगरीय उपेक्षाबोध के बीच लगातार ताकतवर बन रही हिंदी ने ह्वाइट हाउस तक में दस्तक दे दी है। इस दस्तक का जरिया हमारे अपने राजनेता या हिंदीभाषी हस्तीन नहीं बने हैं। दुनिया के सबसे बड़े सत्ता के केंद्र ह्वाइट हाउस में हिंदी का ये जयगान दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी की जबान के जरिए हुआ है। ह्वाइट हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री के सम्मान में दिए भोज में पहुंचे मनमोहन सिंह का ठेठ हिंदी में ही स्वागत किया। उन्होंने भले ही सिर्फ एक लाइन – आपका स्वागत है- बोलकर अमेरिकी धरती पर सिर्फ भारतीय प्रतिनिधिमंडल का दिल ही नहीं जीता है, बल्कि ये साफ संदेश दे दिया है कि हिंदी और उसे बोलने वाले करीब पचास करोड़ लोगों को लेकर उसका नजरिया कैसे बदल रहा है। अमेरिकी धरती पर हिंदुस्तानी लोगों की धमक को महसूस करने के बाद उनकी मातृभाषा को इस तरह सम्मानित करने का भले ही ये पहला मौका है, लेकिन इससे साफ है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी राजनीति के लिए हिंदी और हिंदुस्तानी लोग कितनी अहम होने जा रही है।
बाजारवाद के बढ़ते दौर में भले ही हिंदी बाजार की एक बड़ी ताकत बन गई है। लेकिन यह भी सच है कि अब भी यह नीति नियंताओं और अभिजन समाज के नियमित विमर्श का जरिया नहीं बन पाई है। दूसरे देशों की कौन कहे, भारतीय अभिजन समाज और नीति नियंता अब तक अपनी सोच और विमर्श की भाषा के तौर पर हिंदी को सहजता से अपना नहीं पाए हैं। कहना ना होगा, उद्योग, समाज और राजनीति की दुनिया में नीतियों के प्रभावित करने वाला ये समाज ज्यादातर महानगरों में ही रहता है और उसकी दैनंदिन की भाषा वही अंग्रेजी है, जिसका अमेरिका और ब्रिटेन में सहज व्यवहार होता है। दरअसल हमारा आज जो अभिजन समाज है, उसके पैमाने अमेरिका और ब्रिटेन के सामाजिक चलन से ही प्रभावित होते हैं। यही वजह है कि रोजी और रोटी की भाषा के तौर पर हिंदी के बढ़ते कदम के बावजूद आज भी उसे लेकर महानगरों में एक उपेक्षाबोध बना हुआ है। कहना न होगा कि इस उपेक्षाबोध की शुरूआत उसी ब्रिटिश और अमेरिकी मानसिकता के ही जरिए हुई थी। ये बिडंबना ही है कि हिंदी को लेकर ये उपेक्षाबोध उसकी अपनी ही धरती पर बना हुआ है, लेकिन जहां से इस उपेक्षाबोध का बीज पनपा था, वहां की राजनीति इसे लेकर उदार होती नजर आ रही है।
ये सच है कि हिंदी को लेकर दुनिया की महाशक्ति का नजरिया बदल रहा है। इसके बावजूद उसने पिछले साल यानी 2008 में तीस सितंबर को अपनी रेडियो सेवा वॉयस ऑफ इंडिया की हिंदी सर्विस को बंद कर दिया। ये सच है कि वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा भारत में बीबीसी की तरह लोकप्रिय नहीं रही है। इसके बावजूद उसे चाहने वालों की कमी नहीं रही है। यही वजह है कि तब हिंदी सर्विस की आवाज बंद होने की खबर ने हिंदी प्रेमियों के एक बड़े तबके में मायूसी भर दी थी। जॉर्ज बुश ने जाते-जाते हिंदुस्तानी लोगों को जोरदार झटका दिया था। लेकिन ओबामा का नजरिया बदला नजर आ रहा है। ऐसी खबर है कि ओबामा की सरकार एक बार फिर से हिंदी सेवा को शुरू करने जा रही है। ये सच है कि 54 साल पहले जब हिंदी सर्विस की शुरूआत हुई थी, तब शीतयुद्ध का जमाना था और इस सर्विस के जरिए अमेरिकी सरकार का उद्देश्य अपनी नीतियों को लेकर प्रोपेगंडा करना था। लेकिन 1990 में सोवियत संघ के बिखराव के बाद से शीतयुद्ध का दौर खत्म होता चला गया। इसी बीच भारत और अमेरिकी संबंधों ने नया इतिहास रच दिया। बुश के ही दौर में भारत और अमेरिका के बीच एटमी समझौता हुआ। इस समझौते के साथ ही हिंदी – अमेरिकी भाई-भाई की नई इबारत लिखी गई। लेकिन इसी बुश के लिए हिंदी सर्विस बेगानी होती चली गई। लेकिन अब अमेरिका का नजारा बदल रहा है। यही वजह है कि हिंदी सर्विस की शुरूआत की खबरें और ह्वाइट हाउस में हिंदी का जयगान को घोष तकरीबन साथ-साथ सुनाई पड़ा है।
वैसे हिंदी को लेकर महाशक्ति का नजारा यूं ही नहीं बदला है। साठ करोड़ के विशाल मध्य वर्ग के सहारे भारत दुनिया के लिए बड़ा बाजार बनता नजर आ रहा है। वैश्विक आर्थिक मंदी के इस दौर में भी टिके रहकर भारतीय अर्थव्यवस्था ने साबित कर दिया है कि अमेरिकी बाजारवाद के दौर में भी उसमें काफी दमखम है। यही वजह है कि दुनिया के सबसे ताकतवर सत्ता केंद्र की नजर में ना सिर्फ हिंदुस्तानी लोग, बल्कि उसकी भाषा सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत जानती है कि भारतीय भूमि पर अंग्रेजी भले ही विमर्श की आज भी मजबूत भाषा बनी हुई है। लेकिन ये सच है कि आम लोगों से सहज संवाद और उन तक अपनी बात पहुंचाने का जरिया हिंदी ही बन सकती है। करीब पचास करोड़ लोगों का दिल अंग्रेजी की बजाय हिंदी के जरिए ही जीता जा सकता है। उसे ये भी पता है कि बाजार आज हिंदी की इस ताकत को पहचान गया है और उसका मौका-बेमौका इस्तेमाल भी कर रहा है। इसी हफ्ते आई एक खबर ने विकसित सरजमीं पर हिंदी की बढ़ती पहुंच और पकड़ को ही जाहिर किया है। ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर (जीएलएम) के मुताबिक ऑस्कर विजेता फिल्म 'स्लमडॉग मिलिनेयर' के एक गीत के बोल में शामिल जुमला 'जय हो' दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय शब्दों की लिस्ट में 16वें नंबर पर आ गया है। जबकि हिंदी फिल्मों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द 'बॉलिवुड' 17वें पायदान पर है। साफ है कि हिंदी को लेकर विकसित दुनिया के आम मानस का भी नजारा बदल रहा है। ऐसे में दुनिया का सबसे बड़ा सत्ता केंद्र मनमोहन सिंह का हिंदी में स्वागत करके दरअसल विकसित दुनिया में हिंदी को लेकर आए बदलाव को ही रेखांकित कर रहा है।
ह्वाइट हाउस तक हिंदी ने दस्तक दे दी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या विकास और ताकत के साथ ही सभ्यता और सलीके के लिए अमेरिका को अपना पैमाना बना चुके भारतीय महानगरीय मानस को हिंदी का ये जयघोष झकझोर पाएगा ।

शुक्रवार, २३ अक्तूबर २००९

अंधेरे खोह में भटकती पत्रकारिता शिक्षा


उमेश चतुर्वेदी
तकनीकी शिक्षण का अपना एक अनुशासन होता है, उसकी अपनी जरूरतें होती हैं। यही कारण है कि इंजीनियरिंग और मेडिकल की ना सिर्फ शिक्षा हासिल करना, बल्कि उनकी शिक्षा देना बेहद चुनौतीभरा काम माना जाता रहा है। अब प्रबंधन की शिक्षा के साथ भी वैसा ही हो रहा है। क्योंकि प्रबंधन भी एक तरह से तकनीक ही है, सिर्फ अकादमिक शिक्षण या पढ़ाई भर नहीं है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि पत्रकारिता की पढ़ाई और उसका शिक्षण तकनीकी शिक्षण-प्रशिक्षण के दायरे में आता है या नहीं। जाहिर है ज्यादातर लोग इसका जवाब हां में ही देंगे। पत्रकारिता की पढ़ाई करने आ रहे छात्र और उनके अभिभावक कम से कम इसे तकनीकी शिक्षण और प्रशिक्षण के दायरे में मान रहे हैं। शायद यही वजह है कि मीडिया विस्फोट के इस दौर में हजारों-लाखों रूपए की मोटी फीस देकर छात्रों की भारी भीड़ पत्रकारिता के शिक्षण संस्थानों का रूख कर रही है। लेकिन डीम्ड विश्वविद्यालयों के साथ ही स्ववित्तपोषित विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में जिस तरह पत्रकारिता की पढ़ाई हो रही है, उससे साफ है कि अपनी तरह से खास इस अनुशासन की पढ़ाई को लेकर छात्रों और उनके अभिभावकों में ठगे जाने का भाव बढ़ा है। इसका असर भावी पत्रकारों की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है। वैचारिक बहसों में जिस तरह पत्रकारिता इन दिनों निशाने पर है, उसके पीछे पत्रकारिता शिक्षण के मौजूदा ढर्रे की कितनी भूमिका है, इसे लेकर सवाल नहीं उठ रहे हैं। लेकिन अब वक्त आ गया है कि पत्रकारिता शिक्षण को प्रोफेशनल जरूरतों के निकष की बजाय तकनीकी अनुशासन के साथ ही वैचारिक धरातल पर भी परखा जाय।
उदारीकरण के बाद आए मीडिया विस्फोट के इस दौर में जिस तरह तकनीक पर पत्रकारिता अवलंबित होती गई है, इससे साफ है कि बाजार में तकनीकी कसौटी पर खरे उतरने वाले भावी पत्रकारों की मांग बढ़ गई है। सिर्फ इसी एक आधार के चलते खबरनवीसी के शिक्षण को इंजीनियरिंग और मेडिकल की तरह तकनीकी अनुशासन का शिक्षण और प्रशिक्षण माना जा सकता है। चूंकि पत्रकारिता इंजीनियरिंग और मेडिकल की तरह कोरा तकनीक ही नहीं है, बल्कि यहां वैचारिकता ना सिर्फ पूंजी है, बल्कि एक बड़ा औजार भी है। हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष राजेंद्र माथुर भले ही कहते रहें कि पत्रकार इतिहास निर्माता नहीं, बल्कि उसके ऐसे दर्शक होते हैं, जो अपनी पैनी निगाह के जरिए आम लोगों को इन घटनाओं से परिचित कराते हैं। लेकिन ये भी सच है कि अपनी वैचारिकता की पूंजी के जरिए हासिल नजरिए के चलते वे मौजूदा घटनाओं के प्रति लोगों को सचेत या फिर उत्साहित भी करते हैं। ताकि आने वाला कल जब विगत के कल का इतिहास के तौर पर मूल्यांकन करे तो उसे कोई पछतावा ना रहे। जाहिर है ये दृष्टि किसी विश्वविद्यालय या पत्रकारिता शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान के क्लासरूम से हासिल नहीं किए जा सकते। अगर ऐसा होता तो भारतीय पत्रकारिता के शुरूआती पुरूष चाहे जेम्स ऑगस्टस हिक्की हों या अंबिका प्रसाद वाजपेयी या फिर बाबू राव विष्णुराव पराड़कर, उन्हें पत्रकारिता की दुनिया में याद भी नहीं किया जाता। क्योंकि उन्होंने किसी संस्थान से खबरनवीसी या वैचारिकता की ट्रेनिंग हासिल नहीं की थी। आज के दौर में भी प्रभाष जोशी, अच्युतानंद मिश्र, प्रणय रॉय या विनोद दुआ जैसे कई चमकते नाम हैं, जिनकी पत्रकारिता का प्रशिक्षण किसी विश्वविद्यालय या संस्थान में मिला हो। बहरहाल आज के दौर में बिना खास शिक्षण या प्रशिक्षण के किसी पत्रकार की उम्मीद नहीं की जाती, जैसे बिना किसी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के इंजीनियर या मेडिकल की पढ़ाई के डॉक्टर की उम्मीद की जाती है। अगर ऐसा होगा तो उस पर सवाल उठने लाजिमी हैं। हकीकत में आज का पत्रकारिता शिक्षण अपने उहापोह से मुक्त नहीं हो पाया है। उसकी कोशिश या खुला ध्येय है प्रणय रॉय और प्रभाष जोशी जैसा पारंपरिक और श्रेष्ठ वैचारिक पत्रकार बनाना है, जो आज की तकनीक पर भी खरा उतरे। लेकिन उसका सबसे बड़ा संकट ये है कि वह अब तक ये तय नहीं कर पाया है कि पत्रकारिता का प्रशिक्षण तकनीकी है या वैचारिक। इसके लिए जितना पत्रकारिता के संस्थान जिम्मेदार हैं, उतना ही दोषी सरकार भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज तक पत्रकारिता का एकनिष्ठ पाठ्यक्रम तैयार हो चुका होता। इंजीनियरिंग और दूसरे तकनीकी संस्थानों की मान्यता के लिए बाकायदा तकनीकी शिक्षा परिषद है, मेडिकल की पढ़ाई पर निगाह रखने के लिए मेडिकल कौंसिल है। लेकिन इतिहास पर निगाह रखने वाली पढ़ाई के लिए ऐसी कोई रेग्युलेटरी संस्था नहीं है। यही वजह है कि कुकुरमुत्तों की तरह उगे डीम्ड विश्वविद्यालयों और कथित तकनीकी संस्थानों के साथ पत्रकारिता पढ़ाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं। इस कड़ी में स्ववित्त पोषित योजना के तहत जाने-माने विश्वविद्यालय भी शामिल हो चुके हैं। इसका असर है कि अधिकांश संस्थानों के पास किताबों और लैब का जबर्दस्त टोटा है। लेकिन पढ़ाई चालू है। निजी संस्थान मोटी फीस के बदले ढेरों सब्जबाग दिखा रहे हैं। वहीं स्ववित्तपोषित विभागों के नाम पर विश्वविद्यालयों या पुराने कॉलेजों में पत्रकारिता विभाग कम फीस ले रहे हैं। लेकिन सुविधाओं के मामले में उनकी भी वही हालत है, जो चमकती बिल्डिंग वाले निजी संस्थानों की है।
अव्वल तो अधिकांश संस्थानों या विश्वविद्यालयों में कोई मानक पाठ्यक्रम ही नहीं है। रही बात उन्हें पढ़ाने वालों की तो योग्यता की कसौटी पर खरे उतरने वाले कम ही लोग भावी पत्रकारों को पढ़ाने में जुटे हैं। स्ववित्तपोषित संस्थानों के तौर पर जिन विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में पत्रकारिता की पढ़ाई हो रही है, वहां पत्रकारिता विभाग या तो हिंदी विभाग की दासी है या फिर अंग्रेजी विभाग का दोयम दर्जे का साथी। हिंदी या अंग्रेजी विभाग के ठस्स विद्वान अपने को पत्रकारिता का पुरोधा भी मान बैठे हैं। उन्हें बाजार और तकनीक से कुछ लेना-देना नहीं है। उनके लिए पत्रकारिता का शिक्षण शेक्सपीयर के नाटकों या प्रेमचंद की कहानियों की पढ़ाई जैसा ही है। उन्हें ये भी पता नहीं है कि पत्रकारिता शिक्षण की दुनिया में क्रॉफ्ट और अकादमिक नजरिए को लेकर कोई बहस भी चल रही है। भारतीय पत्रकारिता खास तौर पर तकनीक और कंटेंट के साथ पहुंच के स्तर पर किस पायदान पर जा पहुंची है, इसका साफ अंदाजा अधिकांश पत्रकारिता संस्थानों और वहां पढ़ा रहे लोगों को नहीं है। जाहिर है इसका खामियाजा वह पीढ़ी भुगत रही है, जो जेम्स हिक्की या अंबिका प्रसाद वाजपेयी ना सही, प्रभाष जोशी और प्रणय रॉय बनने के लिए पत्रकारिता की पढ़ाई के समंदर में कूद पड़ी है।
जहां ठीक-ठाक पत्रकारिता शिक्षण हो रहा है, वहां क्रॉफ्ट और अकादमिक जोर को लेकर रस्साकशी जारी है। जिन अध्यापकों का प्रोफेशनल पत्रकारिता से साबका नहीं पड़ा है, वे संचार के सिद्धांतों के पारायण और पाठ से छात्रों को जोड़ना अच्छा लगता है। लेकिन विजिटिंग फैकल्टी के नाम पर प्रोफेशनल जब क्लास रूम में आते हैं तो वे तकनीक पर ही जोर देते हैं। जाहिर है उनके शिक्षण का मुख्य फोकस तकनीकी जानकारी और तकनीक के आधार पर कंटेंट को कसना सिखाना होता है। अगर वे अखबार से हुए तो उनकी दुनिया जनसत्ता और टाइम्स ऑफ इंडिया के न्यूज रूम के इर्द-गिर्द ही घूमती है। अगर टेलीविजन की दुनिया से हुए तो जी न्यूज, एनडीटीवी या आजतक का न्यूजरूम ही उनका आदर्श होता है। इस असर से पत्रकारिता प्रशिक्षण पाने के बाद प्रोफेशनल संस्थानों में ट्रेनिंग के लिए जाने वाले छात्र बच नहीं पाते। उन्हें मुंह बिचकाकर उनकी सैद्धांतिक पढ़ाई का मजाक उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। क्रॉफ्ट और अकादमिक को लेकर अतिवादी जोर दरअसल एक तरह का अतिवाद ही है। हर तकनीक और क्रॉफ्ट का अपना एक सिद्धांत भी होता है। अकादमिक दुनिया को इस सैद्धांतिकता के आधार को खोजना और उसकी कसौटी पर क्रॉफ्ट को विश्लेषित करना होता है। इस तरह से पढ़े और गुने छात्रों में जो दृष्टि विकसित होती है, उसमें मौलिकता की गुंजाइश ज्यादा होती है। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है। जिसका असर आज पत्रकारिता की प्रोफेशनल जिंदगी में खूब दिख रहा है। सवालों के घेरे में पत्रकारिता रोज आ रही है। नई पीढ़ी के पत्रकारों में मौलिक दृष्टि का अभाव साफ नजर आता है। अगर मौलिकता दिखती भी है तो उन्हें प्रयोग करने के लिए जरूरी समर्थन देने वाले साहसी सीनियर की भी कमी साफ नजर आती है।
साफ है तकनीक और अकादमिक के झंझट से मुक्त हुए बिना पत्रकारिता की अपनी वैचारिक जरूरत पर आधारित पत्रकारिता शिक्षण के इंतजाम नहीं किए जाएंगे, सवाल तो उठते ही रहेंगे। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने पत्रकारिता शिक्षण की इसी कमी को ध्यान में रखते हुए प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से पत्रकारिता पाठ्यक्रम में एकरूपता लाने और संस्थानों के साथ ही पढ़ाने वाले लोगों और संस्थानों के मानकीकरण की दिशा में कदम उठाया है। जरूरत इस बात की है कि प्रोफेशनल दुनिया की जरूरतों के मुताबिक पत्रकारिता शिक्षा ढले, लेकिन अकादमिकता को भी नजरंदाज ना किया जाए। जड़ नजरिए वाली अकादमिकता के बोझ तले दबा पत्रकारिता शिक्षण ना तो अकादमिक दुनिया के लिए मुफीद होगा ना ही अखबारी और टीवी संस्थान को ही फायदा पहुंचा पाएगा। और पत्रकारिता की मेधा का जो नुकसान होगा, उसका आकलन तो आने वाली पत्रकारीय पीढ़ियां ही कर पाएंगी।

मंगलवार, १५ सितम्बर २००९

नहीं रूक पाएगा हिंदी का कारवां


उमेश चतुर्वेदी
सितंबर के महीने जैसे-जैसे नजदीक आता जाता है, सरकारी दफ्तरों के उस खास विभाग की रौनक बढ़ाने की कवायद शुरू हो जाती है, जिसे हिंदी अथवा राजभाषा विभाग कहा जाता है। ऐसे माहौल में हिंदी के पाखंड दिवस के करीब एक पखवाड़ा पहले केंद्र सरकार का मंत्री हिंदी की पढ़ाई को जरूरी बनाने की हिमायत करता हुआ बयान दे तो हैरत होना स्वाभाविक ही है। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के इस बयान पर शक की गुंजाइश भी इसलिए ज्यादा है, क्योंकि हिंदी ऐसे बयानों के जरिए करीब उनसठ साल से ठगी जाती रही है। राजभाषा को हकीकत में वह हक अब तक नहीं मिल पाया, जिसकी वह स्वाभाविक तौर पर हकदार है।
राजनीतिक बयानों की गंभीरता को हमेशा इतिहास और विगत के कदमों के आधार पर परखा जाता रहा है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि कपिल सिब्बल अंग्रेजी के धुआंधार वक्ता हैं। कांग्रेस पार्टी का प्रवक्ता रहते उन्होंने प्रेस को अपनी पार्टी से संबंधित जितनी जानकारियां अंग्रेजी के जरिए दी थीं, शायद ही हिंदी में दी होंगी। संसद में भी चाहे विपक्षी सदस्य के तौर पर बहस में हिस्सेदारी रही हो या फिर मंत्री के तौर पर बहसों का जवाब देना, कपिल सिब्बल अंग्रेजी को ही सहज मानते रहे हैं। ऐसे कपिल सिब्बल अगर देशभर के स्कूलों में हिंदी पढ़ाए जाने की वकालत कर रहे हैं तो इसे सामान्य बयान भर मानकर उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए।
दरअसल कपिल सिब्बल के इस सुझाव की वजह जो चिंताएं हैं, उसी पखवाड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रमुख कुप सी सुदर्शन ने जाहिर किया है। कांग्रेस के एक मुखर नेता के साथ संघ के पूर्व प्रमुख के बयानों को जोड़ना कुछ लोगों को भले ही गलत लग सकता हो। लेकिन हकीकत यही है। सुदर्शन ने कहा है कि अंग्रेजियत इस देश की संस्कृति को बिगाड़ तो रही ही है, देश में एकता की भावना पर भी असर डाल रही है। कपिल सिब्बल ने भी जब हिंदी पढ़ाने की वकालत की तो उनका भी यही कहना था कि हिंदी की पढ़ाई के जरिए देशभर के बच्चे एकता के सूत्र में बंध सकेंगे।
ये कड़वी सचाई है कि सरकारी कोशिशों के जरिए हिंदी अपना असल मुकाम हासिल नहीं कर पाई। दूसरे शब्दों में कहें तो हिंदी को उसके असल मुकाम पर पहुंचाने में सरकारी खेल ने ज्यादा अड़ंगा लगाया। हिंदी को दासी बनाए रखने की सरकारी कवायद की शुरूआत 1965 में ही हो गई थी, जब भाषा संबंधी संसद के संकल्प में ये तय कर दिया गया कि जब तक एक भी राज्य सरकार हिंदी के राजभाषा होने का विरोध करती रहेगी, उसे व्यवहारिक तौर पर राजभाषा नहीं बनाया जा सकेगा। सच तो ये है कि ये संकल्प बाद में आया, लेकिन उसकी पूर्व पीठिका 21 नवंबर 1962 को ही बन गई थी। इस दिन गठित नगालैंड राज्य की राजभाषा ही अंग्रेजी है। जाहिर है कि नगालैंड जैसे राज्य हिंदी को क्योंकर अपनाने लगे। साठ के दशक में तमिलनाडु में उभरे हिंदी विरोध के लिए गुलजारी लाल नंदा के एक आदेश को जिम्मेदार माना जाता है। मशहूर पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी पुस्तक स्कूप में इस घटना का जिक्र किया है। दरअसल संवैधानिक प्रावधानों के चलते 26 जनवरी 1965 से हिंदी को राजभाषा के तौर पर अंग्रेजी का स्थान ले लेना था। इसे देखते हुए ही बतौर राजभाषा विभाग के इंचार्ज मंत्री के नाते नंदा ने ये आदेश दिया था। लेकिन पहले से जारी केंद्रीय सत्ता में हिंदी विरोध की मानसिकता के चलते तमिलनाडु के नेताओं को ये प्रचारित करने का मौका मिल गया कि केंद्र सरकार गैरहिंदी भाषी राज्यों पर जबर्दस्ती हिंदी थोपना चाहती है। नंदा जी को अपनी गलती का अहसास हुआ और यह आदेश वापस ले लिया गया। लेकिन जो गलती होनी थी, वह हो गई थी। जिसका खामियाजा तमिलनाडु में खूनी संघर्ष के तौर पर दिखा। आंदोलन की रिपोर्टिंग करने दिल्ली से पहुंचे पत्रकारों को तब के मद्रास और अब के चेन्नई में ऑटो वालों से अपने हिंदी सवालों के जवाब में हिंदी में ही सुनने को मिला – हम हिंदी नहीं जानता। यानी हिंदी जानने वाला भी अपनी क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय राष्ट्रवाद को बचाने के नाम पर हिंदी का विरोधी हो गया था। इस आंदोलन ने तमिलनाडु में सरकारी तौर पर ना सिर्फ हिंदी को लागू नहीं होने दिया, बल्कि केंद्र सरकार को हिंदी की उसकी असल जगह पर बैठाने के अपने संकल्प को अनंत काल तक टालने का मौका जरूर दे दिया।
सरकारी षडयंत्र के चलते हिंदी व्यवहार में राजभाषा भले नहीं बन पाई, लेकिन 1991 में शुरू हुए उदारीकरण के दौर ने हिंदी को नई पहचान दिलाई। बेशक यह नीति बनाने वालों की भाषा नहीं बन पाई है, लेकिन बाजार की सबसे प्रमुख भाषा जरूर बन गई। और तो और जिस राज्य ने हिंदी विरोध के नाम पर खून बहाया, बसें जलाईं और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, अब उस तमिलनाडु के लोग भी अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। पिछले दिनों एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक के चेन्नई संवाददाता ने खबर दी कि साठ के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलनकारी पीढ़ी भी अब अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाने के लिए बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। तमिलनाडु में बदलाव की ये बयार की असल वजह उदारीकरण ही है। इसी के चलते 1995 में दुनिया की जिन पांच भाषाओं को स्टार समूह के मालिक रूपर्ट मर्डोक ने भविष्य की ताकतवर भाषाएं बताया था, उसमें हिंदी भी थी। मर्डोक जानते थे कि हिंदी में बाजार को दुहने की अकूत ताकत है। यही वजह है कि स्टार समूह के चैनलों का भारतीय आसमान पर हमला हुआ और देखते ही देखते स्टार समूह भारत की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्रांति का अगुआ बन गया। हमारे शासक भले ही हिंदी को नकारते रहे, लेकिन जिनकी बदौलत हिंदी अपने अहम स्थान से दूर हुई, उसी शासक वर्ग अंग्रेज कौम के ही एक प्रभावी शख्स ने हिंदी की ताकत को पहचानने में भूल नहीं की।
आज अगर कपिल सिब्बल हिंदी की वकालत कर रहे हैं तो इसकी वजह ये नहीं है कि उनकी पार्टी के पहले के कर्ताधर्ताओं ने जो किया, उसे लेकर उनके मन में कोई पश्चाताप है। या फिर वे उस भूल को सुधारना चाहते हैं। हकीकत तो यही है कि अंग्रेजियत के वर्चस्व के इस दौर में भी हिंदी अपनी ताकत बढ़ाती जा रही है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, गुजरात से लेकर उस नगालैंड तक, जिसकी राजभाषा अंग्रेजी है, हिंदी को जानने-बोलने, समझने और गुनगुनाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। सर्वोच्च अदालतों तक में उसे लागू करने के लिए मांग बढ़ती जा रही है। दिल्ली हाईकोर्ट में हिंदी में सुनवाई और इंसाफ को लेकर तीन हजार से ज्यादा वकीलों का मैदान में कूद पड़ना कोई कम नहीं है। जाहिर है, अपने विस्तार में हिंदी का सहारा लेकर ताकतवर बना बाजार अब हिंदी को भी ताकतवर बना रहा है। ये ताकत ही है कि हिंदी को लेकर अंग्रेजी दां लोगों तक का रवैया बदलता नजर आ रहा है। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में हिंदी की जयजयकार बढ़ती ही जाएगी। जरूरत इस बात की है कि खांटी हिंदी वाले भी इस तथ्य को समझें और अपनी ताकत को सकारात्मक तरीके से इस नेक काम में लगाएं।

रविवार, २३ अगस्त २००९

अंदरखाने में भी हुई डील


उमेश चतुर्वेदी
यह लेख प्रथम प्रवक्ता के 01 सितंबर 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ है।
भारतीय लोकतंत्र में इस बात पर शक नहीं है कि इस देश का सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री का पद है। जाहिर है उन्हें नियंत्रित करने वाली पार्टियों के अध्यक्ष की ताकत भी कम नहीं होगी। इस देश में शायद ही कोई मानेगा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके निर्देशन में काम करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मीडिया के सामने कमजोर होंगे। लेकिन ये सोलह आने सही है कि पिछले आम चुनावों में देश की सत्ता संभाल रहे ये दोनों दिग्गज भी कमजोर साबित हुए। चुनावी समर के दौरान सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को भी मीडिया को अंदरखाने में पैकेज देना पड़ा। नाम ना छापने की शर्त पर कांग्रेस पार्टी के ही एक रसूखदार नेता को इस तथ्य को स्वीकार करने से गुरेज नहीं है।
चुनाव के दौरान प्रत्याशियों के पक्ष में खबर छापने और पैसे या पैकेज डील ना करने वाले प्रत्याशियों की खबरों को सिरे से नकार देने का आरोप तो मीडिया पर लग ही रहा है। पैसे कमाने की इस बहती गंगा में हाथ धोने में देश के कई बड़े मीडिया घरानों के बारे में खुलेआम सवाल-जवाब हो ही रहे हैं। इसे लेकर आरोपी मीडिया को भी बचाव में उतरना पड़ा है। लेकिन ये भी सच है कि एक-एक वोट के जुगाड़ में लगी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टियों ने मीडिया के एक बड़े धड़े की इस जायज-नाजायज मांग के आगे घुटने टेकने में ही अपनी भलाई समझी। भारतीय जनता पार्टी के सांसद और वरिष्ठ पत्रकार चंदन मित्रा देश के बड़े खबरिया चैनलों पर आरोप लगा ही चुके हैं कि उन्होंने एक संगठन बनाकर पार्टियों से विज्ञापन बटोरे। लेकिन कांग्रेस नेता का खुलासा इससे आगे की बात बता रहा है। उन्होंने कहा कि कई बड़े चैनलों ने अंदरखाने में उनसे बिना किसी रसीद और पक्की खाता-बही के भी पैसे लिए। इसमें कई बड़े और नामी पत्रकार भी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश के एक नेता ने भी नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि एक चैनल ने तो बाकायदा बीएसपी के नेताओं से भी अंदरखाने में डीलिंग की। जिसमें उसके संपादक का ही बड़ा हाथ रहा।
वैसे स्थानीय और जिला स्तर पर ऐसे आरोप पहले भी लगते रहे हैं। कुछ तथ्यों में सच्चाई भी रही है। कुछ एक लोग राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा करते रहे होंगे। लेकिन आमतौर पर पत्रकारिता के मूल मानदंडों का खयाल रखा जाता था। लेकिन इस बार इसे खुलकर स्वीकार किया गया, यही वजह है कि इस बार सवाल भी ज्यादा उठ रहे हैं। वैसे सच तो ये है कि मध्य प्रदेश के एक अखबार ने 1996 के स्थानीय चुनावों में अपनी जिला यूनिटों को प्रत्याशियों से कमाई का लक्ष्य दिया था। जिसने नहीं दिया, उनका अखबार ने बॉयकाट किया और इसकी कीमत उन प्रत्याशियों को चुकानी पड़ी थी। लेकिन कमाई का ये रास्ता चल निकला तो इसे मीडिया घरानों ने अपनाने में देर नहीं लगाई।
धीरे-धीरे ये रोग पूरे देश में फैलने लगा। पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के एक प्रचार प्रभारी को इस नई परिपाटी से पहली बार साबका पड़ा। अब तक वे जानते थे कि प्रचार के लिए राज्य या राष्ट्रीय मुख्यालय से अपने लक्ष्य समूह वाले अखबारों और टीवी चैनलों को विज्ञापन जारी किया जाता है। लेकिन उस विधानसभा चुनाव में पहली बार उन्हें पता चला कि मीडिया घरानों ने अपनी जिला यूनिटों को लक्ष्य दे रखे थे। अब मरता पत्रकार क्या ना करता, लिहाजा दो-दो तीन-तीन संस्थानों के स्थानीय पत्रकारों ने आपस में गुट बनाकर खुद की मार्केटिंग की और दबाव बनाकर उनसे विज्ञापन की मांग की। इसके कुछ महीनों बाद गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए। जब वे गुजरात के चुनाव प्रचार के समंदर में उतरे तो वहां भी पत्रकारीय भ्रष्टाचार की इस गंगा से साबका पड़ा। रही-सही कसर लोकसभा चुनावों में पूरी हो गई। लिहाजा अब तो वे मान के चलते हैं कि हर राज्य में उन्हें ऐसा ही अनुभव होने वाला है।
जिस तरह से मीडिया के एक वर्ग की जायज-नाजायज मांगों के सामने बड़े – बड़े दलों के बड़े नेताओं तक को झुकना पड़ा, उससे साफ है कि आज मीडिया कितना ताकतवर हो गया है और एक-एक वोट की जुगत में जुटे नेताओं के लिए ऐसे मीडिया को नकारना भी उनके लिए आसान नहीं रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने की ताकत रखने वाले मीडिया संस्थान इस परिपाटी के बाद क्या सरकार और नेताओं पर उसी आक्रामकता से सवाल उठा सकेंगे। इसका जवाब पाना फिलहाल आसान नहीं लगता। लेकिन इसके साथ ये भी सच है कि जो पार्टी या उसके ताकतवर नेता मीडिया की इस नाजायज मांग के सामने झुक सकते हैं, क्या गारंटी है कि वे देश के उन अहम मसलों को शिद्दत से हल कर पाएंगे, जिनके लिए मजबूती और दृढ़ता की जरूरत होती है।
साफ है कि ये मान्यताओं और उसूलों पर संकट का दौर है। लेकिन ये भी सच है कि संकट के दौर ही नए उसूलों, मजबूत परंपराओं और मानवीय मूल्यों की स्थापना की नई राह भी सुझाते हैं। जब हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष और नौजवान पत्रकारों की टोली इसके खिलाफ आवाज उठाने में नहीं हिचक रही है तो नई उम्मीद का दीया जलाना गलत नहीं होगा।