रविवार, २२ अगस्त २०१०

साहित्यिक पत्रकारिता- सवाल सिर्फ पाठकों का नहीं


उमेश चतुर्वेदी
पचास करोड़ हिंदी भाषियों के देश में अगर हिंदी की सबसे लोकप्रिय पत्रिका हंस बारह हजार के आसपास ही बिकती हो तो, हिंदीभाषियों के साहित्यिक संसार पर सवाल उठेंगे ही। किसी भी भाषा की रचनाशीलता की सबसे बेहतर प्रतिनिधि उसकी साहित्यिक पत्रिकाएं ही होती हैं। निश्चित तौर पर इस मोर्चे पर हिंदी का पूरा परिदृश्य निराशाजनक है। हिंदी की लोकप्रिय पत्रकारिता में जिस तरह दैनिक अखबारों की भूमिका बढ़ती जा रही है, वह निश्चित तौर पर हिंदी के लिए बेहतर संकेत तो है। लेकिन इस लोकप्रियता के बरक्स हिंदी में कम से कम साहित्यिक पत्रकारिता को लेकर पाठकों में संस्कार विकसित नहीं हो पाए हैं। हिंदी में जब भी इसकी तरफ ध्यान दिया जाता है, सबसे पहला ध्यान राजभाषा को लेकर सरकारी उदासीनता की ओर ही जाता है। राजभाषा बनने के बावजूद नीति नियंताओं और सत्ता विमर्श में हिंदी की भूमिका वैसी नहीं हो पाई है, जैसी अंग्रेजी की है। रचनाशीलता और रचनात्मकता से जुड़े विमर्श को लेकर हिंदीभाषी राज्यों को छोड़ दें तो केंद्रीय स्तर पर हिंदी सापेक्ष माहौल अभी बनना बाकी है। लेकिन सिर्फ इसी वजह से यह मान लिया जाय कि हिंदी के लिए साहित्यिक पत्रकारिता का माहौल नहीं रहा तो यह निष्कर्ष अधूरा ही माना जाएगा।
हिंदी में आज भी लोकप्रिय किताबों का संस्करण हजार से दो हजार तक ही होता है। साहित्यिक पत्रकारिता पर चर्चा के वक्त हिंदी प्रकाशन जगत की उदासीनता पर भी ध्यान जाना सहज ही है। यह सच है कि हिंदी की कमाई खाने वाले प्रकाशकों ने भी हिंदी के साहित्यिक संस्कार को विकसित करने में कोई खास योगदान नहीं दिया। आजादी के तत्काल बाद चूंकि माहौल राष्ट्रीयता से ओतप्रोत था, लिहाजा उस वक्त हिंदी के लिए सोचने-मरने वाले लोग थे। उस माहौल का ही असर था कि उस वक्त हिंदी में साहसिक पहल करने की जिद्द का बोलबाला था। लेकिन जैसे-जैसे उदारीकरण की तरफ हमारे कदम बढ़ते गए, हिंदी की रचनाशीलता को लेकर जिद्दीपन में कमी आती गई। साहसिक पहल तो अब सिर्फ अंग्रेजी की ही बात है। यह कहना कि सिर्फ इसके चलते ही हिंदी में लोकप्रिय साहित्यिक पत्रकारिता के क्षितिज का फैलाव नहीं हुआ तो यह भी अतिशयोक्ति ही होगी। हालांकि यह भी एक कारण जरूर हो सकता है।
आज हिंदी के कुछ उत्साही कार्यकर्ता तर्क देते नहीं थक रहे हैं कि जब भास्कर, जागरण, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, सरस सलिल, प्रतियोगिता दर्पण, गृहशोभा लाखों की संख्या में बिक सकते हैं तो हिंदी की कोई साहित्यिक पत्रिका क्यों सात से दस हजार की संख्या तक भी नहीं पहुंच पाती। लेकिन यह तर्क भी एकांगी ही है। क्योंकि जो सामग्री सरस सलिल में छप सकती है, वह किसी साहित्यिक पत्रिका की सामग्री नहीं हो सकती। दरअसल हर प्रकाशन और विषय विशेष का अपना अनुशासन होता है। बच्चों की पत्रिका में समोसे बनाने की विधियां या फिर लिपस्टिक लगाने के तरीके की जानकारी नहीं दी जा सकती। वैसे ही महिला पत्रिकाओं में राजनीतिक भंडाफोड़ की सामग्री देना भी अटपटा ही लगेगा। कुछ यही हालत साहित्यिक पत्रकारिता की भी है। वहां हर तरह की सामग्री देना संभव ही नहीं होगा। ऐसे में किसी साहित्यिक पत्रिका की किसी लोकप्रिय पत्रिका से तुलना ही बेमानी होगा। लेकिन दिल्ली में हाल ही में हुई ऐसी एक गोष्ठी में ऐसी तुलना की गई तो हंगामा मच गया।
हिंदी में साहित्यिक पत्रकारिता के सामने आज प्रसार का जो संकट दिख रहा है, उसके दो कारण हैं। पहला तो विचारशीलता को भौतिक यानी आर्थिक प्रश्रय देने वाले उदार हाथों की कमी हो गई है। उदारीकरण के दौर में इस तथ्य पर गौर फरमाने की कहीं ज्यादा जरूरत है। वैचारिकता से ओतप्रोत साहसिक पहल करने वाले लोगों की कमी भी हमारे इस पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार है। वैसे तो हर तरह की पत्रकारिता पाठक केंद्रित ही होती है। लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता पर पाठक को संस्कारित करने और वैचारिकता से लैस करने की जिम्मेदारी भी होती है। वैसे यह काम क्षेत्र विशेष के नियंताओं और भाषा की कमाई खाने वाले वर्ग का भी है, ताकि वे अपनी भाषा को जिम्मेदार और वैचारिक रचनाशीलता का वाहक बना सकें। दुर्भाग्य से इस मोर्चे पर कोई काम नहीं हुआ है। जाहिर है कि पाठकीय संस्कारहीनता भी आज साहित्यिक पत्रकारिता की राह में रोड़ा बनकर खड़ी है। जिस अंग्रेजी में किताबों की बिक्री के आंकड़े गिनाते हम अपनी हिंदी में ऐसे भविष्य की चिंता करते रहते हैं, पैसा, पाठकीयता और उदारीकरण के बावजूद वहां भी साहित्यिक पत्रकारिता की कोई बहुत ज्यादा बेहतर स्थिति नहीं है। वहां भी अगर कला अकादमियां या ट्रस्ट और विश्वविद्यालय मदद नहीं करते तो ग्रांटा या न्यूयार्कर जैसी पत्रिकाओं के सहज प्रकाशन का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। जबकि भारत में ही अंग्रेजी की किसी किताब का पांच हजार से ज्यादा का संस्करण निकलता है।
तो क्या यह मान लिया जाय कि हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता में सर्वत्र घटाटोप अंधेरा ही अंधेरा है। फिलहाल भले ही ऐसा लग रहा हो, लेकिन सच तो यह है कि एक बार फिर हिंदी की कमाई खा रहे लोगों पर ही इस अंधेरे से बाहर निकलने की जिम्मेदारी है। बड़े अखबार समूह, संस्थानिक घराने और विश्वविद्यालय अगर पूंजी का आधार मुहैया कराएं तो हिंदी साहित्यिक पत्ररकारिता में रचनाशीलता को नया आयाम मिलेगा। तब शायद हमें पाठकों का रोना न रोने का कोई कारण भी नहीं रह पाएगा।

रविवार, ८ अगस्त २०१०

भला हो हम हिंदी वालों का

उमेश चतुर्वेदी
राजधानी दिल्ली में इन दिनों तकरीबन रोज ही कहीं हलकी और तेज बारिश हो जाती है। बरसाती फुहारों के बीच मौसम में ठंडक का अहसास होना स्वाभाविक है। लेकिन यहां राजभाषा के साहित्यिक गलियारे में इन दिनो गरमी की तासीर कुछ ज्यादा ही महसूस की जा रही है। गरमी की वजह बना है देश के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थान भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका नया ज्ञानोदय में प्रकाशित शहर में कर्फ्यू के उपन्यासकार विभूति नारायण राय का एक इंटरव्यू। जिसमें उन्होंने हिंदी की कुछ लेखिकाओं की आत्मकथाओं के बहाने असंसदीय किस्म की टिप्पणी कर दी है। चूंकि विभूति नारायण राय गांधी जी के नाम पर बने अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति और उत्तर प्रदेश कैडर के पूर्व पुलिस अधिकारी हैं, इसलिए उनकी लानतें-मलामतें का दौर तेज हो गया है। हिंदी के अतिजनवादी एक्टिविस्ट पत्रकारों, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों का ग्रुप राय को हिंदी विश्वविद्यालय से बर्खास्त कराने को लेकर अभियान जारी रखे हुए है।
इस लड़ाई को लेकर बहसबाजियों का दौर तेज है। क्या गलत है और क्या सही, इस पर विचार किया जाना यहां उद्देश्य भी नहीं हैं। इस पूरे बहस में एक तथ्य पर ध्यान नहीं दिया गया कि यह मसला उछला कैसे। दरअसल राय के इंटरव्यू को लेकर सबसे पहले अपनी आक्रामकता के लिए मशहूर अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने खबर बनाई। अगस्त महीने के पहले दिन इस खबर के छपने से करीब हफ्ताभर पहले से नया ज्ञानोदय का अंक बाजार में मौजूद था। लेकिन उसे किसी ने नोटिस नहीं लिया, नोटिस लिया भी गया तो तब, तब एक्सप्रेस में यह खबर साया हुई। तब से देश के अति जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक खेमे का हरावल दस्ता विभूति नारायण राय के खिलाफ पिल पड़ा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि हिंदी में एक्टिविस्ट की भूमिका निभा रहे इस हरावल दस्ते के किसी सदस्य की नजर मूल हिंदी में हिंदी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में शुमार नया ज्ञानोदय पर नहीं पड़ी होगी। उनकी नजर में विभूति का इंटरव्यू विवादास्पद तभी बना, जब एक्सप्रेस में इसकी खबर हुई। यहां इस तथ्य पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि क्या एक्सप्रेस का रिपोर्टर हिंदी की पत्रिकाओं से उतने ही सहज तरीके से बाबस्ता होते हैं, जितना वे अंग्रेजी प्रकाशनों के साथ होते हैं। अगर ऐसा है तो हिंदी के लिए यह सुखद बात है। लेकिन इसकी उम्मीद कम ही नजर आती है। जाहिर है ऐसे में शक की सूई ज्ञानपीठ के आकाओं पर भी उठती है कि कहीं पत्रिका को चर्चा में लाने के लिए उन्होंने ही इस इंटरव्यू की कॉपी एक्सप्रेस रिपोर्टर को मुहैया कराई हो।
इस मसले पर पूरी बहसबाजी और उठाने-गिराने की साहित्यिक-सांस्कृतिक पहलवानी में हिंदी-अंग्रेजी का मुद्दा शामिल करना प्रगतिवादियों को बुरा लग सकता है। लेकिन हकीकत यही है। इस मुद्दे ने अंग्रेजी मानसिकता को हिंदी वालों का मजाक उड़ाने का बैठे-बिठाए मौका ही दे दिया है। जैसा की टेबलायड पत्रकारिता का चरित्र है, अंग्रेजी के एक नवेले टेबलायड अखबार ने इस पूरे मसले को चटखारे लेकर तफसील से प्रकाशित किया। अगर इतना ही होता तो गनीमत थी। लेकिन लगे हाथों उसने टिप्पणी भी कर दी कि हिंदी वालों के इसी चरित्र के ही चलते हिंदी की यह हालत बनी हुई है। यानी हिंदी आज भी अगर चेरी की भूमिका में है तो उस अंग्रेजी अखबार के मुताबिक विभूति जैसे लोगों की सतही टिप्पणियां और उस पर बवाल मचाने वाले प्रगतिवादियों की आपसी जोरआजमाइश का भी हाथ है। लगे हाथों उस अखबार ने हिंदी वालों को सुझाव भी दे डाला कि हिंदी को आगे ले जाना है तो ऐसी ओछी हरकतों से बचो। हिंदी वाले चाहे जितना क्रांतिकारी बनने का दावा करें, अपने भाषाई स्वाभिमान की चर्चा करें, लेकिन हकीकत यही है कि आपसी सिरफुटौव्वल में उस्तादी की तुलना में भाषाई स्वाभिमान कम ही है। चूंकि अंग्रेजी ठहरी देश के असल राजकाज की भाषा - नीति नियंताओं के सोचने-विचारने की भाषा, लिहाजा उन्हें अंग्रेजी के उस टेबलॉयड अखबार के सुझावों से कोई परेशानी नहीं है। उलटे उन्हें ये सुझाव अच्छे लग रहे हैं। भला हो हम हिंदी वालों का ....
साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में जब भी किसी समस्या की चर्चा होती है, राजनीति को दोषी ठहराने का खेल चालू हो जाता है। राजनीति दोषी है भी, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चलते राजनीति पर सवाल खड़े करना आसान है। इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ दें, तो राजनीति हमारी जिंदगी में इतना स्पेस मुहैया जरूर कराती है कि आप उसकी आलोचना कर सकें। लेकिन क्या इतना स्पेस हमारे सांस्कृतिक और साहित्यिक हलकों में है...निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। संस्कृति और साहित्य के मसले पर अगर किसी की ओर उंगली उठती है तो उसके पीछे अधिकांश वक्त नितांत निजी स्वार्थ और अपना बदला चुकाने की भावना होती है। साहित्यिक कृतियों की आलोचना के पीछे भी यही धारणा काम कर रही होती है। साहित्यिक और सांस्कृतिक आलोचनाओं को स्वस्थ अंदाज में लिया भी नहीं जाता। स्वस्थ आलोचक से दुश्मन की तरह व्यवहार किया जाने लगता है। ऐसे में फिर कैसे होगा अपनी हिंदी का विकास....सोचना तो हमें ही पड़ेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम ऐसी वैचारिक मुठभेड़ों के लिए तैयार हैं। हिंदी में इन दिनों जारी पहलवानी के खेल से ऐसा तो नहीं ही लग रहा।

शनिवार, ३ जुलाई २०१०

प्रथम चंद्रयान पुरस्कार कथाकार शेखर जोशी को


हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार शेखर जोशी को मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा ट्रस्ट के प्रथम चंद्रयान पुरस्कार- 2010 से नवाजा जायेगा। एक प्रेस विज्ञप्ति में प्रबंध न्यासी धनराज दफ्तरी ने बताया है कि नयी कहानी में सामाजिक सरोकारों का प्रतिबद्ध स्वर जोड़ने वाले शेखर जोशी को पुरस्कार स्वरुप 31000 रुपये की राशि भेंट की जाएगी। पुरस्कार समोराह कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद् में रविवार 18 जुलाई को आयोजित होगा। इस समारोह की अध्यक्षता भारतीय भाषा परिषद् के निदेशक डाक्टर विजय बहादुर सिंह करेंगे जबकि जाने-माने आलोचक डॉक्टर शिवकुमार मिश्र मुख्य वक्ता के तौर पर कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। इस अवसर पर शेखर जोशी की प्रचलित कहानी दाज्यू का पाठ पत्रकार प्रकाश चंडालिया करेंगे। सितम्बर १९३२ में अल्मोड़ा जनपद के ओजिया गाँव में जन्मे शेखर जोशी की प्रारंभिक शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुई। कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले जोशी हिंदी के सुपरिचित कथाकार हैं। उन्हें उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार-1987, साहित्य भूषण-1995, पहल सम्मान-1997 से सम्मानित किया जा चुका है। शेखर जोशी की कहानियों का तमाम भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, चेक, रूसी, पोलिश और जापानी भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। कुछ कहानियों का मंचन और दाज्यू नामक कहानी पर बाल फिल्म सोसायटी ने फिल्म भी बनाई है। शेखर जोशी की प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं- कोशी का घटवार, साथ के लोग, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, मेरा पहाड़, प्रतिनिधि कहानियां और एक पेड़ की याद। दाज्यू, कोशी का घटवार, बदबू, मेंटल जैसी कहानियों ने न सिर्फ शेखर जोशी के प्रशंसकों की लम्बी जमात खडी की बल्कि नयी कहानी की पहचान को भी अपने तरीके से प्रभावित किया है। पहाड़ी इलाकों की गरीबी, कठिन जीवन संघर्ष, उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध, उम्मीद और नाउम्मीद्दी से भरे औद्योगिक मजदूरों के हालात, शहरी-कस्बाई और निम्नवर्ग के सामाजिक-नैतिक संकट, धर्म और जाति की रूढ़ियाँ उनकी कहानियों का विषय रहे हैं।

बुधवार, ९ जून २०१०

भारतीय भाषाओं के जरिए बनता नया इतिहास

उमेश चतुर्वेदी
1994-95 की बात है। दिल्ली के तब के मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना विदेश दौरे पर थे। उनकी गैरमौजूदगी में तब के शिक्षा और विकास मंत्री साहब सिंह वर्मा कार्यकारी मुख्यमंत्री की भूमिका निभा रहे थे। इस दौरान उन्होंने तय किया कि पब्लिक स्कूलों में पहली कक्षा से ही अंग्रेजी की पढ़ाई पर रोक लगा दी जाय और उन्होंने उसे रोक दिया। इसे लेकर राजधानी के अंग्रेजीभाषी समाज में भूचाल आ गया। अंग्रेजी मीडिया और पब्लिक स्कूलों ने सुर में सुर मिलाकर तर्क देना शुरू कर दिया था कि अंग्रेजी की पढ़ाई के बिना तकनीकी पढ़ाई का क्या होगा। यहां यह बताना बेकार है कि मदनलाल खुराना के विदेश से लौटने तक अंग्रेजी के खेवनहार जीत गए थे और साहब सिंह वर्मा का गंवई मन मसोस कर अपने ही फैसले को वापस होता देखता रह गया। लेकिन इस साल आईआईटी की परीक्षा के जो नतीजे आए हैं, उसने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है कि हिंदी माध्यम वाले बच्चे देश की इस सबसे बेहतर तकनीकी संस्थान में दाखिला नहीं ले सकते और बेहतरीन विद्यार्थी नहीं हो सकते।
इस साल आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा में कुल 13,104 उम्मीदवार सफल हुए हैं। जिसमें हिंदी माध्यम से पास होने वाले छात्रों की संख्या 554 है। तेरह हजार से ज्यादा कामयाब छात्रों के बीच हिंदी वाले छात्रों की इतनी संख्या छोटी हो सकती है। लेकिन पिछले रिकॉर्ड पर जब नजर जाती है तो यह कामयाबी कहीं ज्यादा बड़ी नजर आती है। खुद आईआईटी के ही मुताबिक पिछले साल हिंदी माध्यम से सिर्फ 184 प्रतियोगी सफल रहे थे। इसकी तुलना में तो इस साल की कामयाबी करीब तीन गुना ज्यादा बैठती है। जाहिर है कि इससे हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाले नए प्रतियोगी और उत्साहित होंगे और अगली बार कामयाबी में उनकी भागीदारी और भी ज्यादा होगी।
1835 में जब मैकाले ने मिंट योजना लागू की थी तो उसका एक मात्र उद्देश्य अंग्रेजी सरकार के लिए बाबुओं को तैयार करना था। मैकाले की आत्मा जहां भी होगी, वह अपनी कामयाबी का अब तक जश्न मनाती रही है। क्योंकि भारत में अंग्रेजी का व्यवहार अंग्रेजी की अपनी ब्रिटिश धरती की तुलना में कहीं ज्यादा रहा है। लेकिन आईआईटी में हिंदी माध्यम वालों की कामयाबी ने कम से कम मैकाले की आत्मा को भी अब जरूर परेशान करना शुरू कर दिया होगा। अपने देश में जब भी अंग्रेजी के खिलाफ कोई तर्क दिया जाता है, तुरंत हिंदी के विरोध में भी कहा जाने लगता है कि हिंदी में ज्ञान-विज्ञान की पढ़ाई के लिए न तो किताबें हैं और न ही उसमें इतनी क्षमता है कि वह अंग्रेजी की तरह तकनीकी और ज्ञान-विज्ञान की चीजों को अभिव्यक्त कर सके। इसके खिलाफ चीन और जापान की तकनीकी क्रांति और दुनिया में आर्थिक महाशक्ति बनते जाने का उदाहरण भी दिया जाता रहा है। लेकिन भारतीय मानसिकता यह है कि वह अपनी सनातनी पद्धति के गौरव का जिक्र तो करती है, लेकिन भारतीयता के प्रतीक माने जाते रहे दो शब्दों गंगा और सिंदूर को देने वाली धरती की ओर नहीं झांकती। भारतीयता के प्रतीक ये दोनों ही शब्द पड़ोसी देश चीन से आए हैं। चीन की प्रगति की हम अब बात तो करने लगे हैं, लेकिन वहां जारी अपनी भाषाओं और अंग्रेजी के खिलाफ बढ़ते माहौल को लेकर हम उदासीन ही रहते हैं। आर्थिक उदारीकरण के दौर में चीन और जापान की तकनीकी क्रांति अब हमें भी लुभा रही है, हम उन्हीं की तरह आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर आगे बढ़ने की बात तो करने लगे हैं, लेकिन हमें उनकी तरह अपनी भाषाओं से प्यार का ककहरा सीखने में झल्लाहट और हिचक जारी है।
देश में बढ़ते अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के पीछे एक बड़ा तर्क यह भी है कि हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाले लोग क्लर्क और चपरासी तो बन सकते हैं, लेकिन इंजीनियर, डॉक्टर और आईएएस नहीं बन सकते। यही वजह है कि देश के दूरदराज तक के इलाकों में अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों की बाढ़ आ गई है। लोगों में यह भावना घर कर गई है कि चाहे भूखे रहेंगे, आधी रोटी खाएंगे, लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही पढ़ाएंगे। हालांकि इस प्रवृत्ति की मुखालफत साठ के दशक में डीएस कोठारी की अध्यक्षता वाला कोठारी कमीशन से लेकर आज के दौर के मशहूर शिक्षाशास्त्री और वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल तक कर चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह कि दोनों ही विद्वान अंग्रेजी के भी वैसे ही जानकार हैं, जैसे भारतीय अंग्रेजी दां हैं। देश की तकरीबन हर सरकार भी इन विद्वानों की राय का आदर करती रही हैं, लेकिन अंग्रेजी समर्थक लॉबी के दबाव में बच्चों से अंग्रेजी का दबाव हटाने की दिशा में कभी इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाईं।
भारत के अपने लोग और अपने अगुआ भले ही जिस काम को नहीं कर पाए, आर्थिक उदारीकरण के बाद बढ़ते भारत के विशाल मध्यवर्ग ने वह कर दिखाया है। आज भारत में माना जा रहा है कि करीब चालीस करोड़ लोगों का विशाल मध्यवर्ग है, जिसकी खरीद क्षमता बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि दुनिया के बड़ी कंपनियां तक कमाई के लिए भारत का रूख कर रही हैं। उन्हें पता है कि इस बाजार का दोहन हिंदी और भारतीय भाषाओं के जरिए ही किया जा सकता है, यही वजह है कि वे हिंदी में काम को बढ़ावा दे रही हैं। इस तरह हिंदी नए सिरे से प्रतिष्ठापित हो रही है। हिंदी और भारतीय भाषाओं के इस जयगान में भारतीय लोकतंत्र का भी बड़ा हाथ है। लोकतंत्र में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों के लोगों की ऐतिहासिक कारणों से अंग्रेजी तक वह पहुंच नहीं बन पाई है, जो हिंदी और भारतीय भाषाओं की है। कोई सरकार भले ही राजभाषा के मंच पर प्रतिष्ठित राजभाषा की उपेक्षा कर दे, लेकिन सत्ता विमर्श में उभर कर सामने आ रही इन जातियों और इन वर्गों की अनदेखी नहीं कर सकती। इसलिए उन्हें हिंदी और भारतीय भाषाओं को आईआईटी और संघ लोकसेवा आयोग तक प्रवेश देना पड़ रहा है, जहां हिंदी अब तक चेरी या दोयम भूमिका में रही है। इसका नतीजा दिख रहा है कि अब हिंदी माध्यम के परीक्षार्थी आईआईटी और सिविल सर्विस तक में कामयाब होने लगे हैं। कार्मिक मंत्रालय ने सिविल सर्विस परीक्षा की जो रिपोर्ट जारी की है, उसके मुताबिक पिछले साल आईएएस के लिए जिन 111 लोगों का चयन हुआ, उनमें से हिंदी माध्यम के सफल प्रतियोगी 19 थे। संघ लोकसेवा आयोग के ही मुताबिक इस साल कामयाब टॉप 25 में चार प्रतियोगियों ने हिंदी माध्यम में परीक्षा दी थी। इन छात्रों की कामयाबी का जश्न इसलिए भी ज्यादा हो जाता है, क्योंकि खुद आईआईटी की आर्गेनाइजिंग कमेटी की रिपोर्ट ही मानती है कि हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वाले छात्रों के लिए आईआईटी परीक्षा में पास होना आसान नहीं है।
जाहिर है इसका असर सामाजिक तौर पर भी पड़ रहा है। संघ लोकसेवा आयोग के सदस्य और हिंदी के जाने-माने विद्वान पुरुषोत्तम अग्रवाल भी मानते हैं कि हिंदी माध्यम ने सिविल सर्विस की परीक्षाओं में ग्रामीण इलाकों के छात्रों के लिए भी दरवाजे खोले हैं। जाहिर है इसका असर इंजीनियरों और सिविल सेवा अधिकारियों की मानसिकता पर भी पड़ेगा। अब तक इन सेवाओं को सिर्फ शहरी नजरिए से ही देखा जाता रहा है। भारत के गांवों के पिछड़ेपन को लेकर अब तक जितने भी आरोप लगते रहे हैं, उसमें एक बड़ा कारण यह भी माना जाता रहा है कि जो भी योजनाएं बनती हैं, उन्हें बनाने वाले ज्यादातर लोगों को गांवों से परिचय सिर्फ निबंध लेखन तक ही होता है। लेकिन हिंदी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से जो छात्र इंजीनियरिंग या सिविल सर्विस में आ रहे हैं, उनका नजरिया जाहिर है कुछ अलग ही होगा। उनकी सोच अपने धूल भरी गांवों की गलियों के उत्थान के लिए भी होगा। तो क्या हम ये मानने लगें कि भारत की 65 प्रतिशत ग्रामीण आबादी में बदलाव की नई बयार बहने वाली है। आईआईटी और सिविल सर्विस में हिंदी और भारतीय भाषाओं की यह कामयाबी कम से कम ऐसी उम्मीद तो जरूर जताती है।

शुक्रवार, ४ जून २०१०

वितंडा का ब्लॉग



उमेश चतुर्वेदी
ब्लॉग यानी वेब लॉग के बारे में माना जाता है कि इससे आम अभिव्यक्ति को नया आयाम मिला है। वर्चुअल दुनिया के इस अपूर्व माध्यम ने उन लोगों को भी अभिव्यक्ति के लिए ऐसा स्पेस मुहैया कराया है, जिनके विचारों और समस्याओं को आधुनिक मीडिया के पारंपरिक माध्यमों में जगह नहीं मिल पाती। इससे मुक्त अभिव्यक्ति को नया आयाम मिला है। ऐसा माना जा रहा है कि हिंदी में इन दिनों कम से पंद्रह हजार ब्लॉग सक्रिय हैं। जिन पर लोग अपने विचारों, अपनी रचनाधर्मिता को मुक्त भाव से अभिव्यक्त कर रहे हैं। ये ब्लॉग तमाम तरह के विषयों पर केंद्रित हैं- धर्म, समाज, साहित्य, राजनीति, संस्कृति, अर्थ व्यवस्था, विज्ञान और सेक्स समेत तमाम तरह की चर्चाएं आज ब्लॉगिंग के केंद्र में हैं। इस लिहाज से देखें तो इंटरनेट की दुनिया में हिंदी नए तरह से करवट ले रही है।
लेकिन दुख की बात यह है कि अभिव्यक्ति का सबसे नया यह जनमाध्यम भी पारंपरिक मीडिया के रोगों से ग्रस्त हो चुका है। खबरिया चैनलों को इन दिनों हर दूसरा व्यक्ति उनकी कंटेंट और भाषा को लेकर गाली देता मिल जाएगा। खबरिया चैनलों पर आरोप है कि वे टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी के लिए कंटेंट और भाषा से खिलवाड़ कर रहे हैं। अफसोस की बात यह है कि ब्लॉगिंग की दुनिया के कुछ अहम खिलाड़ी भी इन दिनों सनसनीखेज पत्रकारिता की ही राह पर चल पड़े हैं। जिनके लिए अपनी हिट बढ़ाने का एक ही तरीका नजर आ रहा है, कंटेंट और भाषा के साथ परोसे जाने वाले विषयों के साथ खिलवाड़ करो। ताकि उनकी चर्चा हो और वर्चुअल दुनिया के यायावर उनके पास चले आएं और उनकी हिट को बढ़ाएं ताकि वे वर्चुअल दुनिया में अपनी बादशाहत को साबित कर सकें। यह कुछ वैसे ही हो रहा है, जैसे हाल के दौर तक हिंदी के खबरिया चैनल नाग-नागिन को नचाने से लेकर एलियन के हाथों गायों को धरती से अंतरिक्ष की दुनिया में भिजवाते रहे हैं। ब्लॉगिंग की दुनिया में इतना अतिवाद नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि सतही विषयों को सनसनी की चाशनी में जमकर परोसा जा रहा है। और हमारी जो मानसिक बुनावट है, हमारा जो सामाजिक ढांचा है, उसमें तात्कालिक तौर पर सनसनी की चाशनी बेहद मीठी और लुभावनी लगती है। लिहाजा इस चाशनी को परोसने वाले ब्लॉग इन दिनों हिट हैं।
इंटरनेट के खोजकर्ता देश अमेरिका में ब्लॉगिंग की दुनिया इससे कहीं आगे निकल गई है। वहां तो सही मायने में वर्चुअल दुनिया का यह माध्यम आज मुख्यधारा के मीडिया से कम से कम मुक्त और जिम्मेदार अभिव्यक्ति के माध्यम के तौर पर जबर्दस्त टक्कर दे रहा है। पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की ताजपोशी में जिन कारकों की प्रमुख भूमिका रही, उसमें एक बड़ा कारक वहां के जिम्मेदार ब्लॉगर और ब्लॉगिंग ही रही। वहां का मुख्यधारा का मीडिया जार्ज बुश जूनियर के बारे में तकरीबन वही लिख या दिखा रहा था, जो वे चाहते थे। अफगानिस्तान और इराक युद्ध की हकीकत से आम अमेरिकी का एक बड़ा वर्ग अनजान था। लेकिन जिम्मेदार और सक्रिय ब्लॉगरों ने उसे अनजान नहीं रहने दिया। अमेरिकी सेनाओं की अफगानिस्तान और इराक में करतूत और इससे हो रहे नुकसान को ब्लॉगरों ने बखूबी बयान किया। इसके चलते रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेनन को अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद हार का मुंह देखना पड़ा। क्योंकि वे उस जार्ज बुश के उत्तराधिकारी बनने चले थे, जिनकी नीतियों की वजह से अमेरिकी सेनाएं इराक और अफगानिस्तान में फंसी पड़ी हैं।
हिंदी की ब्लॉगिंग की दुनिया अभी इतना परिपक्व नहीं हो पाई है। यह कहना भी एक तरह का अतिवाद ही होगा। यहां कानून, भाषा, सिनेमा, रेडियो और विभिन्न दार्शनिक और राजनीतिक विचारों को लेकर ब्लॉगिंग की दुनिया में महत्वपूर्ण काम हो रहा है। लेकिन वितंडावादी ब्लॉगिंग के चलते उनकी पहुंच बेहद सीमित है। उनके बारे में कम ही लोग जान पाते हैं। लेकिन ये तय है कि जिस तरह भारत के दूसरे और तीसरे दर्जे तक के शहरों से लेकर गांवों की चौपाल तक इंटरनेट की पहुंच बढ़ती जा रही है, मुक्त अभिव्यक्ति का यह जनमाध्यम और सशक्त बनकर उभरेगा। तब सनसनी की चाशनी की मिठास कड़वे स्वाद में बदलती नजर आएगी।
( यह लेख भोपाल से प्रकाशित अखबार पीपुल्स समाचार में छप चुका है। )

बुधवार, १९ मई २०१०

बदलाव की आहट


उमेश चतुर्वेदी
अपने यहां जब भी किसी को प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं से इंसाफ नहीं मिलता, तो उसके पास अदालत का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई चारा नहीं होता। अदालतों से उन्हें इंसाफ भी मिलता है। संवैधानिक ताकत और रसूख रखने वाले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर आज देश के नागरिकों का भरोसा कहीं ज्यादा बढ़ गया है। जाहिर है कि इस भरोसे की वजह वहां न्याय की अमोल कुर्सी पर बैठे न्यायाधीशों का आचरण और उनके इंसाफपसंद फैसले ही रहे हैं। लेकिन आम लोगों को कम ही पता होगा कि उपरी अदालतों के न्यायमूर्तियों की नियुक्ति में भी राजनीति होती है और अक्सर वही राजनीतिक सत्ता आखिरकार हावी हो जाती है, जिनके खिलाफ कई बार उन जजों को ही सुनवाई करनी पड़ती है। भारत के किसी हाईकोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश लीला सेठ की आत्मकथा से गुजरते हुए इस राजनीति के दर्शन बार-बार होते हैं। अंग्रेजी के मशहूर उपन्यासकार विक्रम सेठ की मां लीला सेठ की घर और अदालत नाम से आई यह आत्मकथा छह साल पहले अंग्रेजी में ऑन बैलेंस के नाम से प्रकाशित हो चुकी है। तब इसे अंग्रेजी में हाथोंहाथ लिया गया था। लेकिन अदालती नियुक्तियों की राजनीति से हिंदी पाठकों का दस्तावेजी साबका अब जाकर पड़ा है, जब पेंगुइन इंडिया ने यह किताब हिंदी में अनूदित करके प्रकाशित की है। इस राजनीति को जानने और समझने के लिए पाठकों को किताब के शब्दों से गुजरना होगा। जिसमें लीला सेठ ने बेबाकी से लिखा है कि राजनीति के चलते वे सुप्रीम कोर्ट की जज नहीं बन पाईं और सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जस्टिस होने का गौरव केरल की जस्टिस फातिमा बीवी हासिल करने में सफल रहीं। इस पूरी कहानी को जानना और समझना इस किताब के ही जरिए हो सकता है। इतना ही नहीं, ये आत्मकथा एक ऐसी महिला के आत्मसंघर्ष की कहानी भी है, जिसके पिता की उसके बचपन में ही मौत हो जाती है। मां उसे संघर्षों में पालपोस कर बड़ा करती है और वह लड़की अपनी जिंदगी की शुरूआत रेलवे के एक अधिकारी की स्टेनो और टाइपिस्ट के तौर पर करती है। लेकिन अध्यवसाय नहीं छोड़ती और वकालत पास करके वकील बनती है और इतनी सफल वकील बनती है कि उसे यही व्यवस्था हाईकोर्ट का जस्टिस और फिर चीफ जस्टिस बनाने के लिए मजबूर हो जाती है। इस किताब में अ सूटेबल ब्वॉय के लेखक विक्रम सेठ की शब्दों की दुनिया में उतरने और कामयाब बनने की पूर्वपीठिका का भी दर्शन कराने में यह कहानी सफल रहती है।
इस स्तंभ में इस किताब की चर्चा का मकसद पारंपरिक समीक्षा नहीं है। बल्कि हिंदी प्रकाशन की दुनिया में आ रहे बदलावों को भी रेखांकित करना है। पुस्तकालयों के लिए खरीद पर केंद्रित रही हिंदी प्रकाशन की दुनिया में पेंगुइन वाइकिंग धीरे-धीरे क्रांति लाने की तैयारियों में जुट गया है। अन्यथा पारंपरिक प्रकाशन की दुनिया आज भी जुगाड़ और उसी पारंपरिक कहानी-कविता की ही दुनिया में खोयी-सिमटी है। लेकिन पेंगुइन हिंदी प्रकाशन की दुनिया के नए दरवाजों पर दस्तक दे रहा है। वैचारिकता और विमर्श से लेकर पारंपरिक खांचे से बाहर की हिंदी की दुनिया में झांकने की कोशिशें और बाजार की जरूरतों के मुताबिक मार्केटिंग के साथ उतरे पेंगुइन हिंदी प्रकाशन का चेहरा बदल रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए जब से पता चला है कि हिंदी का विशाल मध्यवर्ग बाजार की बड़ी ताकत बन कर उभरा है। उस बाजार पर कब्जा जमाने की कोशिशों में उदारीकरण वाली अर्थव्यवस्था वाली ताकतें जोरशोर से कूद पड़ी हैं। माल कल्चर के जरिए कब्जा जमाने की इस होड़ को समझा जा सकता है, जिसकी प्रक्रिया महानगरों से लेकर दूसरी श्रेणी के शहरों तक में दिखने लगी है। हिंदी के इस बाजार की चर्चा कीजिए तो पारंपरिक प्रकाशक आज भी मायूस और रोते हुए से दिखेंगे। इस रूदन के बावजूद उनकी समृद्धि बढ़ती जा रही है। लेकिन पाठकीय समृद्धि के साथ ही लेखकीय गौरव और समृद्धि की ओर उनका ध्यान नहीं है। लेकिन इस ओर ध्यान पेंगुइन ने दिया है। भारत में उदारीकरण के बाद आ रही विदेशी कंपनियों की मंशा पर अब तक न जाने कितने सवाल उठाए जा चुके हैं। लेकिन पेंगुइन पर सवाल नहीं उठ रहे हैं। जबकि वह भी हिंदी के बाजार से ही कमाई करने के लिए उतरी है। इसकी वजह यह है कि वह हिंदी के इस विशाल बाजार को प्रोफेशनल और सांस्कृतिक नजरिए से समृद्ध करने की कोशिश में ही जुटी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय और खासकर हिंदी के प्रकाशक भी ऐसे ही नजरिए से बाजार में उतरने की कोशिश करेंगे और अब तक दीनहीन समझी जाती रही हिंदी प्रकाशन की दुनिया का चेहरा बदल सकेंगे।
(यह आलेख पीपुल समाचार भोपाल में प्रकाशित हो चुका है)

सोमवार, ३ मई २०१०

एफ एम चैनल के कर्मचारी संघर्ष को तैयार


एफ एम सहित आकाशवाणी दिल्ली के विभिन्न चैनलों में काम करने वाले सैकड़ों उदघोषकों और कर्मियों में अधिकतर कलाकारों को पिछले ग्यारह महीनों से भुगतान नहीं किया गया है। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्हें इससे भी अधिक समय से पैसे नहीं मिले हैं। इसके लिए श्रोताओं, कलाकारों व समाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर इन कर्मचारियों ने अपना रेडियो बचाओं अभियान शुरू किया है। अभियान का मानना है कि रेडियो के निजी चैनलों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से आकाशवाणी की स्थिति बदत्तर बनाई जा रही है।

राजधानी में अपना रेडियो बचाओं अभियान में लगे श्रोताओं, कलाकारों व समाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेडियो की भी वैसी ही स्थिति बनाई जा रही है जैसा कि टेलीविजन के निजी चैनलों के लिए जगह बनाने के लिए वर्षों पूर्व दूरदर्शन की बनाई गई थी। निजी चैनलों के शुरू होने से पहले मैट्रों चैनल को सबसे ज्यादा लोकप्रिय बनाने की कोशिश की गई। उसके जरिये दर्शकों की रूचि को मसलन भाषा और विषय वस्तु आदि हर स्तर पर बदलने की पूरी कोशिश शुरू की गई। दूरदर्शन के कर्मचारियों की भी शिकायतें उन दिनों काफी बढ़ रही थी और उन पर ध्यान देने की जरूरत सरकार महसूस नहीं कर रही थी। इन दिनों रेडियों के पर्याय के रूप में एफएम चैनलों को जाना जाता है। खासतौर से मनोरंजन के लिए श्रोताओं की बड़ी तादाद एफ एम चैनलों के कार्यक्रमों को सुनती है। लेकिन आकाशवाणी के एम एम चैनलों की जो स्थिति है उसे देखकर आश्चर्य ही नहीं होता है बल्कि ये एक भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि रेडियों के निजी चैनलों के विस्तार के लिए आकाशवाणी के आला अधिकारी काम कर रहे हैं। याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि टेलीविजन के निजी चैनलों की शुरूआत में दूरदर्शन को छोड़कर उसके कई बड़े अधिकारी निजी चैनलों की सेवा में उंची तनख्वाह पर चले गए थे।

एक तरफ तो रेडियो का तेजी से विस्तार हो रहा है और दूसरी तरफ आकाशवाणी पर वर्षों से नई नियुक्तियां नहीं हुईं हैं और यहाँ प्रोग्राम प्रजेंटेशन का काम आकस्मिक प्रस्तोता ही करते हैं। काम के घंटे अधिक और पारिश्रमिक कम, इस पर भी भुगतान में वर्ष भर की देरी । जबकि संसद की एक समिति ने आकाशवाणी में अस्थायी कलाकारों की बदतर स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए उनकी स्थायी नियुक्तियां करने की सिफारिश की थी।

रेडियो के सबसे लोकप्रिय एम एफ चैनलों के लिए काम करने वाले कलाकारों ने दो महीने के दौरान सम्बंधित उच्चाधिकारियों से मिलकर इन स्थितियों से अवगत कराया है लेकिन स्थितियां जस की तस हैं । "अपना रेडियो बचाओ " मंच के तत्वावधान में लगभग बीस सक्रिय प्रज़ेन्टरों का एक प्रतिनिधिमंडल आकाशवाणी महानिदेशक को पहले १७ फरवरी और फिर २६ अप्रेल २०१० को ज्ञापन दे चुका है । इस ज्ञापन में कार्यक्रमों के गिरते स्तर, भुगतान में अभूतपूर्व विलम्ब के और ध्यान दिलाया गया है और एफ़ एम गोल्ड चैनेल में चल रही गडबडियों के लिए एफ़ एम गोल्ड चैनल की कार्यक्रम अधिशासी MrsMmmmmmmmm Mrs. Ritu Rajput को जिम्मेवार बताया गया है। लम्बे समय तक यह चैनल देश के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनेल्स में रहा है और इसके सूझबूझ से भरे मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम व्यापक जनहित का काम करते रहे हैं और श्रोताओं का जीवन प्रकाशित करते रहे हैं.

अपना रेडियो बचाओ मंच इस सन्दर्भ में सूचना और प्रसारण मंत्रालय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करता है और तुरंत भुगतान कर के कैजुअल प्रज़ेन्टरों के नियमितीकरण की प्रक्रिया आरम्भ करने की भी मांग करता है। साथ ही संसदीय समिति की सिफारिशों के आलोक में तत्काल कदम उठाने का आग्रह करता है। इस मंच के सदस्यों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि आकाशवाणी को बर्बाद करने की जो साजिश चल रही है उसका पर्दापाश करने के लिए मंच राजधानी और देश के दूसरे शहरों में अभियान चलाएगा।