पचमेल...यानि विविध... जान-पहचान का अड्डा...पर आपका बहुत-बहुत स्वागत है.

Thursday, 4 February 2010

कितने लोगों को चिन्ता रहती है अपने नाम की

नाम से काम होता हो या काम से नाम, यह तो तय मानना ही चाहिए कि नाम है तो उसका कुछ मतलब भी है। जन्म के बाद नाम मिलता है। जीवन के साथ और जीवन के बाद भी कुछ रह जाता है तो यही नाम। नाम से ही व्यक्ति और उसके व्यक्तित्व का निर्धारण होता है, नाम का इतना महत्व होते हुए भी हम में ज्यादातर लोग नाम को लेकर गम्भीर नहीं रहते जबकि घर में पाले डॉग को भी अपने नाम की अहमियत पता होती है। आंख मून्दे डॉग का धीरे से भी नाम पुकारें तो उसके कान खड़े होने के साथ ही पूंछ भी हरकत करने लगती है। सड़क से गुजर रही गाय को हम दूसरी मंजिल से गाय-गाय कहकर पुकारते हैं, वह गर्दन घुमाकर आवाज वाली दिशा में देखने लगती है।किसी सार्वजनिक समारोह में एक ही नाम के बीस लोग ही क्यों न जुटे हों लेकिन बात जब काम से जुड़े नाम की हो तो कोई एक आदमी ही प्रतिक्रिया देता है। आखिर ऐसा क्यों है कि कोई एक तो नाम से पहचान पा जाता है और उसी नाम वाले अन्य लोग या तो पहचान नहीं बना पाते या भीड़ का हिस्सा होकर रह जाते हैं। क्या हम अपने नाम की सार्थकता को लेकर वाकई प्रयासरत रहते हैं? कहने को तो कह सकते हैं नाम में क्या रखा है, मन समझाने को यह भी कह सकते हैं बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ! जन्म के बाद अनाम होने तक तो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन नाम जुड़ने और समझदारी विकसित होने के साथ ही हमारी एकमात्र चिन्ता रहती है बदनाम न हो जाएं। जिस सन्तान का हम नामकरण करते हैं उसे भी बात-बात पर उलाहना देते रहते हैं हमारा नाम मत डुबा देना। बदनाम होने पर नाम होना तभी अच्छा है जब हमारी बदनामी मीरा, राधा, सूर, कबीर, सुकरात जैसी हो जाए। यूं तो लैला-मजनूँ का भी नाम है लेकिन प्रेम की वैसी पवित्रता अब रही नहीं लिहाजा चाहे जिसे लैला-मजनूं कह कर इस नाम को भी हल्का बना दिया गया है।नाम को लेकर चिन्तित रहने वाले इस शब्द को पलट कर देखें तो मना बन जाता है जिसका सहज अर्थ है जिसे समाज स्वीकृति न दें या जिसे मन ना कहे वह काम न करें। इस मना का यदि हमेशा ध्यान रखें तो हमें नाम को लेकर तनाव में नहीं रहना पड़े। चौबीस घंटे में से कुछ वक्त नाम जप करके भी तनाव मुक्त रहा जा सकता है नानक से लेकर नरसी मेहता तक का नाम भी नाम जप से हुआ है।आगे निकलने की होड़ में जब मन की नहीं सुनते तो फिर नाम का ध्यान भी कहां रख पाते हैं।जितने भी इंसान हैं सबका कोई नाम है और वही नाम उनकी पहचान भी है। इतिहास की बात करें तो अकबर के नाम को जितना सम्मान मिल पाया उतना औरंगजेब को नहीं मिल पाया। शाहजहां के नाम से ज्यादा उनके कराए काम से ताजमहल का ज्यादा नाम हो गया। फिल्मों में शुरुआती भूमिका में सात हिन्दुस्तानी के एक कलाकार अमिताभ की पहचान कवि हरिवंशराय बच्चन के पुत्र के रूप में ज्यादा थी और आज अ अनार का नहीं अ अमिताभ का हो गया है।हम अपने आसपास तो नज़र डालें समाज, संस्थान, कार्य क्षेत्र में जितने भी लोग रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़े हैं उनमें से कितने अपने नाम को सार्थक कर पा रहे हैं। किसी को जल्दी तो किसी को देर से ही सही जो जिस क्षेत्र में है वहां काबिलियत दिखाने का अवसर तो हम सभी को मिलता ही है, लेकिन कितने लोग अवसर को झपटकर अपना नाम और अपनी पहचान बना पाते हैं। पूर्वजों द्वारा संचित संपत्ति कई लोगों को विरासत में मिलती है लेकिन मुकेश, अनिल अंबानी की तरह कितनी संताने खानदान के नाम की शान बनाए रख पाती हैं।अनाम जन्मते हैं और राम-नाम सत्य के उद्घोष के साथ शून्य में विलीन जरूर हो जाते हैं लेकिन श्मशान से चुनी जाने वाली अस्थियों, नदी में प्रवाहित की जाने वाली राख के साथ भी नाम ज़िन्दा रहता है। यही नहीं परदादा, दादा और पिताजी के चित्रों पर झूलते चन्दनहार से नहीं नाम से ही इन पूर्वजों को भावी पीढ़ी जानती है। अच्छा करें या बुरा नाम तो होना ही है। बुरे से नाम कमाने के लिए हिम्मत या बेशर्मी जरूरी होती है लेकिन अच्छे काम से नाम कमाने के लिए न धन चाहिए, न हिम्मत, बेशर्मी तो बिल्कुल नहीं चाहिए। अच्छा करके देश में नाम कमाने का सपना भी तभी साकार हो सकता है जब हम, जिस भी क्षेत्र में हैं वहां, कुछ अच्छा करने की शुरुआत करें। कुछ न करने वालों का सिर्फ मृत्यु प्रमाणपत्र में नाम होता है और जो कुछ प्रेरणादायी करके दिखाते हैं उनका नाम इतिहास में दर्ज हो जाता है।
अगले हपते फैरूं, खम्मा घणी-सा...

Thursday, 28 January 2010

एक न बन पाएं तो जीरो हो जाएं

शब्द और अंकों में कितना फर्क है इसका गहराई से अनुभव हाल ही में हुआ जब हिसाब-किताब में उलझना पड़ा। किसी को सम्मानित करना हो, उसके कार्य की प्रशंसा करनी हो तो लंबी चौड़ी बात की अपेक्षा काम करने के मामले में नंबर वन कहने से ही काम चल जाता है और सारी कमियां गिनानी हों तो बिल्कुल जीरो है कह कर भी राहत पाई जा सकती है। वैसे शून्य होना कितना पीड़ादायी है, कोई इस अकेले जीरो से पूछे इसमें असुरक्षा का भाव भी इतना ज्यादा कि अंकों की भीड़ में अकेला रह ही नहीं सकता। पहली फिल्म से ही कोई दर्शकों का दिल जीत ले तो वह जीरो से हीरो हो जाता है, लेकिन जब आप बडे तीसमार खां कहलाने के बाद भी अपने साथ वालों का विश्वास नहीं जीत पाते तो ऐसे हीरो की असलियत भी जीरो ही होती है। अकेला एक अकड़कर खड़ा रहे तो अन्त तक अकेला ही रहता है, उसे पता होता है, एक से एक जुड़कर ही दो या ग्यारह हो सकते हैं। अकेले एक बने रहना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, इसके लिए कितना संघर्ष करना होता है, यह नंबर एक पर रहने वालों को देखकर ही समझा जा सकता है। एक नंबर यह भी सिखाता है कि हम अनेक होकर भी एक हो सकते हैं। लेकिन इस अकेले एक को भी जीरो की मदद बिना पूर्णता नहीं मिल पाती या कहें कि एक-दूसरे के मान-सम्मान में वृद्धि के लिए दोनों में आपसी समझ बनी होती है। नौ में एक जुड़ते ही शून्य दस में बदल जाता है। निन्यानवे में एक जुड़ते ही दो जीरो सौ होने का मान बढ़ा देते हैं और कभी एक हजार के आगे शून्य तो दूर छोटा सा पॉइंट (दशमलव) लग जाए तो हजार होने के गुरूर पर पानी फिर जाता है। शब्द की तरह अंक भी हमें बहुत कुछ सिखाते हैं। एक से दस के अंकों में अरब-खरब छुपे हैं, लेकिन इन अंकों में अपने एक, दो, तीन होने पर न तो हीन भावना न ही जीरो में अरब-खरब की क्षमता वाला घमण्ड नज़र आता है। मुझे लगता है हम सब एक की तरह अपनी अकड़ में रहने से मुक्त हो नहीं पाते, इसलिए जीरो जैसी महानता का मर्म भी नहीं समझ पाते। हम दोस्त तो जीरो जैसा चाहते हैं जो अपने सुख-दुख भुलाकर हमारा मान बढ़ाता रहे, जो मिले मुझे ही मिले। हम बाकी लोगों के लिए एक से अनेक होना नहीं चाहते। हम अपने लिए तो हमेशा दो का भाव रखते हैं, लेकिन जब लोग हमसे सात की अपेक्षा रखते हैं, तब साथ देने के बदले हम नो की मुद्रा में आ जाते हैं। नौ को हम नो (इंकार) की तरह अपना लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि एक से आठ तक का कड़ा संघर्ष करने के बाद ही नौ पहुंच पाता है दस की सीढ़ी पर। ये सारे अंक जानते हैं कि एक-दूसरे के साथ, सहयोग, समर्पण भाव से ही सफलता के शिखर तक पहुंचा जा सकता है। दस की गिनती हम सबने सीखी तो बचपन में ही है, तब गुरुजनों ने अंकों की इस एकजुटता का रहस्य बताया भी हो तो हमें याद नहीं। क्योंकि वह वक्त रटने का था।वैसे अंकों के इस गणित को जीवन में उतारने के लिए जितना भी समय मिले उसी में हमें सन्तोष करना चाहिए। कालिख का एक जरा सा छींटा सफेद कागज पर अलग से ही नज़र आ जाता है। इसे हम समझते तो हैं लेकिन अंजाने में ही अपने जीवन की इस गिनती में कितने दशमलव लगाते रहते हैं हमें ही पता नहीं होता। जीवन भर हम नंबर वन के लिए दौड़ते हैं, कुछ सफल होते भी हैं, तो अहं की चिकनाई के कारण लंबे समय खडे नहीं रह पाते। एक न बन पाने की सत्यता समझ आने के बाद भी हम अन्य किसी के लिए सहयोगी नहीं बनते। यदि हमारा शून्य की तरह स्वभाव हो जाए तो न सुखी होने पर दंभ होगा न मुसीबतों में घिरे रहने का मलाल कितना दुर्भाग्य जुड़ा है हम सब के साथ, बचपन में जोड़-घटाव सीख तो लिया लेकिन समझ नहीं पाए और एक, दो, नौ से शून्य का अर्थ समझने की उम्र में पहुंचते-पहुंचते हम में से ज्यादातर की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। दस...नौ...तीन...दो...एक...

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Thursday, 21 January 2010

छोटे होकर तो देखिए बहुत बड़े हो जाएंगे

बड़े लोगो का अपनों से छोटों, सहकर्मियों के प्रति विन्रम व्यवहार हम देखते तो हैं लेकिन कई लोगों को यह नाटक लगता है। कभी सम्बंधित लोगों से बात करें तो पता चलेगा वे इस विनम्रता के बदले कितना सम्मान देते हैं। किसी दिन अपने कार्य-व्यवहार में हम भी छोटे होने का प्रयोग करके देखें तो सही, हम सच में अपनों की नज़र में बड़े हो जाएंगे। याद रखें प्रकृति ने बरगद को अन्य वृक्षों के मुकाबले बड़े होने की सुविधा दी है लेकिन यह दुर्भाग्य भी उसी के साथ जोड़ दिया है कि छोटे पौधे उसके नीचे नहीं पनपते जबकि कडुवे नीम को कार्य व्यवहार में प्रणरक्षक का सम्मान मिला हुआ है। छोटे पौधे, तेजी से पनपने वाली बेल सहारा पाकर नीम से ऊंची निकल जाएं तो भी उसका प्राणवायु वाला व्यवहार नहीं बदलता। तय हमें करना है बरगद बनें या नीम। एक निजी संस्थान में शाखा प्रबंधक स्तर के एक अधिकारी से मुलाकात के लिए सुबह पहुंचा तो मुझे एक रोचक अनुभव हुआ। कुछ पल बैठने का इशारा करके वे विभाग के अन्य वरिष्ठ-कनिष्ठ साथियों से रामा-श्यामा करने लगे। लगभग हर सहकर्मी के पास जाकर उन्होंने मुस्कुराते हुए गुडमोरिंग की, सहकर्मी ने और अधिक प्रसन्नता दर्शाते हुए जवाब दिया।पांच-सात मिनट में वे अपने सभी सहकर्मियों से मिलकर लौट आए और बोले आज का दिन भी अच्छा ही गुजरेगा। मेरे चेहरे पर क्यों के भाव देखकर उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उनका रोज का नियम है। सबके पास जाकर गुडमोरिंग करते हुए मिलते हैं। सुबह की यह हंसी शाम तक पॉजिटिव एनर्जी का काम करती है। अगली सुबह फिर गुडमोरिंग से बैटरी रिचार्ज कर लेते हैं।अमूमन कार्यालयों में आठ घंटों की वोर्किंग तो होती ही है और पॉजिटिव एनर्जी में इस तरह की किसी पहल में दस मिनट भी नहीं लगते, लेकिन कार्यालयों, फ्रेण्ड सर्कल या परिवार में कितने लोग पॉजिटिव एनर्जी बनाने में सहयोग करते हैं? जबकि यह एनर्जी जुटाने के लिए पॉवर कट जैसी समस्या से भी नहीं जूझना पड़ता।मेरा मानना है बड़ा होना या बड़े पद पर बैठना आसान है लेकिन उस बड़े पद की गरिमा के मुताबिक काम करना ज्यादा चुनौतिपूर्ण है। शासकीय कार्यालयों में तो वरिष्ठ अधिकारियों के दो-तीन साल में ट्रांसफर होते ही रहते हैं। शासकीय कार्यालयों में तो पूर्व में कौन-कौन अधिकारी पदस्थ रहे बोर्ड पर सभी के नाम भी लिखे होते हैं। ऐसा क्यों होता है कि ढेरों नामों की सूची में गिने-चुने अधिकारियों के नाम ही विभागीय कर्मचारियों या शहर के लोगों को याद रहते हैं? बड़ी कुçर्सयों पर बैठने वाले कितने लोग अपने से छोटे लोगों का दिल जीत पाते हैं? खुद बॉस टेबल टू टेबल जाकर अपने मातहत साथियों से गुडमोरिंग नहीं भी करें तो बॉस या स्टॉफ की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, फिर कुछ ही लोग क्यों ऐसे होते हैं! शायद इसीलिए कि याद रखने योग्य भी तो कम ही लोग होते है!दस लाख की गाड़ी खरीदने वाला तो इस हकीकत को जानता है कि जब अचानक बीच रास्ते में गाड़ी रुक जाएगी तो धत लगाने के लिए ठेला धकाने, पंचर पकाने वाले का भी सहयोग लेना पड़ सकता है। अचानक नहर-तालाब फूटने के हालात बनने पर रेत का एक कण हमें अनुपयोगी लग सकता है लेकिन इन्हीं सारे रेतकणों वाली बोरियां तबाही मचाने को आतुर पानी को कुछ देर में असहाय कर देती हैं।काम बड़ा हो या छोटा सिर्फ बोलते रहने से ही हो जाए तो सारे लोग घरों में रट्टू तोते ही न पाल लें! कोई भी काम को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए सामूहिक सहयोग जरूरी होता है और यह टीम वर्क से ही सम्भव होता है। मैच जीतने पर कप्तान को ट्रॉफी, युद्ध जीतने पर सेनाध्यक्ष की पीठ जरूर थपथपाई जाती है लेकिन इन सभी को पता रहता है बिना टीम एफर्ट के जीत सम्भव नहीं थी। जब आपसी समझ ही नहीं बन पाएगी तो साथ काम करते हुए भी कोई क्यों एक-दूसरे को सहयोग करेगा। बड़े पद वाले यदि अपनी कुर्सी, मोटी तन्खवाह के अहं से घिरे रहेंगे तो नुकसान उन्हीं का होना है क्योंकि छोटे लोगों का प्रतिशत घर-कार्यालय में अधिक होता है।मुझे तो लगता है बड़े पदों वाले अपने कार्य-व्यवहार से जितने छोटे हो जाएं अपने कार्यक्षेत्र में उतने ही बड़े हो सकते हैं। खजूर और बरगद की तरह बड़ा होना किसी काम का नहीं क्योंकि न तो किसी को छांव मिल पाती है और न ही बाकी पौधे पनप पाते हैं। वैसे अब तो बरगद का दंभ भी टूटने लगा है। कई घरों में बोंसाई बरगद छोटे से गमले में देखा जा सकता है। बोंसाई बरगद, उन घरों-कार्यालयों में जरूर होने चाहिए जहां ओहदे, तनखवाह, संपन्नता की धुंध, भीषण गर्मी में भी नहीं छंट पाती। छोटे बनकर हम और बड़े हो सकते हैं यह सूत्र याद रखलें तो घर-बाहर, हमारे व्यवहार में जो बदलाव आएगा निश्चित ही वह पॉजिटिव एनर्जी ही बढ़ाएगा।