रविवार, ७ फरवरी २०१०

पक्षपात

उस समय लाल बहादुर शास्त्री गृह मंत्री थे एक बार उन्होंने इलाहाबाद स्थित अपना निवास स्थान इसलिए खाली कर दिया क्योंकि मकान मालिक को उसकी आवश्यकता थी उन्होंने किराए पर दूसरा मकान लेने के लिए आवेदन पत्र भरा। काफी समय हो गया लेकिन लाल बहादुर शास्त्री को मकान नहीं मिल सका। लाल बहादुर शास्त्री के मित्रों ने अधिकारियों से पूछताछ की अधिकारियों ने बताया,''शास्त्री जी का कड़ा आदेश है कि जिस क्रम में उनका आवेदन पत्र दर्ज है उसी क्रम के अनुसार मकान दिए जाएं कोई पक्षपात किया जाए। '' यह सच था और उनसे पहले 176 आवेदकों के नाम दर्ज थे

बुधवार, ३ फरवरी २०१०

उत्तम

देश के सुप्रसिद्ध कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को बनावटीपन बिल्कुल पंसद नहीं था। जो चीज सीधी और सरल होती थी, उन्हें अच्छी लगती थी । एक बार उनकी पुत्री की शादी हुई । विदाई के समय उसे बिना साज श्रृंगार के ले जाने लगे । उनके संबंधी उनकी निन्दा करने लगे । इस पर उन्होंने सरलता से उत्तर दिया,''जिस सम्मान को पाने के लिए अच्छी वेशभूषा होना जरूरी हो, उस सम्मान को न पाना ही उत्तम है।''


रविवार, ३१ जनवरी २०१०

इंसानियत

यह घटना उन दिनों की है, जब लालबहादुर शास्त्री हमारे प्रधानमन्त्री थे । एक दिन वह अपनी पत्नी ललिता शास्त्री के साथ एक साड़ी के कारखाने का दौरा करने गए । उनकी पत्नी को कुछ साड़ियां पंसद आईं । शास्त्री जी ने उन्हें बांधने को कहा और पैसे देने लगे । लेकिन मालिक ने पैसे लेने से इन्कार कर दिया । तब शास्त्री जी ने कहा, ''आज मैं प्रधानमंत्री हूं, इसलिए मुझे इतनी मूल्यवान साड़ियां मुफ्त में दे रहे हो, लेकिन जब मैं प्रधानमंत्री नहीं रहूंगा, तब भी क्या ऐसी साड़ियां आप मुझे मुफ्त दे सकेंगे?'' यह सुन कर मिल मालिक कुछ न बोल सका । उसने चुपचाप पैसे ले लिए ।

गुरुवार, २८ जनवरी २०१०

विद्वता

एक बार स्वामी विवेकानंद काशी में थे । वहां उनकी विद्वता की चर्चा बहुत फैल गई थी । अनेक लोगों ने उनसे अनेक कठिन प्रश्न किए थे । जिन का जवाब उन्होंने ऐसा दिया कि सब ने उनकी विद्वता का लोहा मान लिया था। एक दिन एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, ''संत कबीर दास जी ने दाढ़ी क्यों रखी थी।'' स्वामी जी ने उत्तर दिया, ''भाई, अगर वह दाढ़ी नहीं रखते तो आप पूछते कि कबीर दास जी ने दाढ़ी क्यों नहीं रखी ।'' यह जवाब सुनकर वह व्यक्ति लज्जित होकर चुपचाप वहां से खिसक गया ।

सोमवार, २५ जनवरी २०१०

संत

स्वामी दयानंद का एक शिष्य नाई था । एक बार वह स्वामी दयानंद के लिए अपने घर से भोजन लाया । स्वामी दयानंद ने उसे बड़े चाव से खा लिया। उनका दूसरा शिष्य उस घटना को देख रहा था । उसने स्वामी दयानंद से कहा,'' स्वामी जी, आप ने यह क्या किया ? आपने आज नाई की रोटी खा ली ।'' इस बात पर स्वामी दयानंद खिलखिला कर हँसने लगे । शिष्य बोला,''हाराज, क्षमा करें । यदि कोई धृष्टता गई हो क्षमा करें |'' स्वामी दयानंद बोले, ''त्स, रोटी तो गेहूं की थी, नाई की नहीं।'' यह सुन कर शिष्य निरुतर हो गया|

शुक्रवार, २२ जनवरी २०१०

पेट

एक सज्जन के बहुत आग्रह पर प्रसिद्ध साहित्यकार बर्नाडे शा ने उन का निमंत्रण स्वीकार कर लिया । लेकिन शा ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वह मांसाहारियों के साथ भोजन नहीं खा पाएंगे । सज्जन ने उनकी पंसद का ध्यान रखने का आश्वासन दिया था । भोज वाले दिन शा शाकाहारी मेज पर रखे सलाद को खाने लगे । एक मांसाहारी सज्जन ने उस पर चोट करते हुए कहा, ''आप घास-फूस क्यों खा रहे हैं मुर्गा खाइए ना।'' शा ने जवाब दिया, ''जनाब मेरा पेट कोई कब्रिस्तान नहीं है कि मैं उसमें मुरदे डालता रहूं।''यह जवाब सुनकर वह निरुतर हो गया।

गुरुवार, २१ जनवरी २०१०

जाति

गांधीवादी नेता आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी ट्रेन में सफर कर रहे थे, उसमें एक महिला व एक पुरुष यात्री भी था । वे आचार्य कृपलानी को नहीं पहचानते थे । बातों ही बातों में उन्होंने उनसे पूछा, ''आप किस जाति के हैं?'' प्रश्न सुनकर कृपलानी तत्काल बोले, '' मैं तो कई जातियों का हूं।'' यह सुन कर लोग आश्चर्य में पड़ गए । एक बोला, ''वह कैसे?'' इस पर आचार्य कृपलानी बोले, ''जब मैं सुबह अपना जूता साफ करता हूं तब शूद्र हो जाता हूं, महाविद्यालय में पढ़ाने जाता हूं तो ब्राह्मण हो जाता हूं, वेतन का हिसाब करता हूं तो बनिया हो जाता हूं । अब आप ही बताइए मेरी क्या जाति है?'' आचार्य कृपलानी का यह उत्तर सुन कर उन यात्रियों को लज्जित हो जाना पड़ा ।