शुक्रवार, ३ सितम्बर २०१०

निर्देश

अमरीका के प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन के घर में एक बार चोरी हो गई । उसके बाद उन्होंने अपने घर के बाहर एक बोर्ड लगा दिया जिस पर लिखा - ''इस घर में अब एक ही वस्तु चुराने लायक रही है, वह है चांदी की तश्तरी जो रसोईघर में रखी अलमारी के सब से उपरी खाने में रखी है । पास ही में एक डलिया में बिल्ली के बच्चे हैं । यदि कोई सज्जन डलिया भी ले जाना चाहे तो बिल्ली के बच्चों को किसी कपड़े से ढक जाए । लेकिन किसी प्रकार का शोर न मचाए, अन्यथा घर के लोगों को असुविधा होगी । बाद में उसे भी हो सकती है ।'' यह बोर्ड टंगने के बाद पिफर कभी उनके यहां चोरी नहीं हुई ।

रविवार, १५ अगस्त २०१०

प्रेरणा

आजादी की ६३वीं वर्षगाठ पर आपको हार्दिक शुभकामनांए।
स्वतंत्रता संग्राम के उन दिनों की बात है, जब जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने हजारों निर्दोष भारतीयों पर गोलियां चलवाई थीं और धरती खून से लाल हो गई थी । जब भगतसिंह ने यह सुना, उस समय उनकी उम्र केवल 12 वर्ष थी । अगले दिन वह घर से स्कूल जाने के लिए निकले, पर स्कूल न जाकर जलियांवाला बाग गए। वहां धरती अभी तक लाल थी । वह वहीं बैठ गए और एक शीशी में खून से सनी मिट्टी भरने लगे । मिट्टी भर कर शीशी जेब में रख ली और वहीं बैठ कर घंटों सोचते रहे । जब उन का ध्यान टूटा तो शाम घिर आई थी । स्कूल में कब की छुट्टी हो चुकी थी ।
                                        जब वह देरी से घर पहुंचे तो बहन ने पूछा, ''इतनी देर कहां लगा दी ?'' '' जलियांवाला बाग गया था,'' फिर उन्होंने शीशी जेब से निकाली । बहन ने पूछा, ''इस में क्या है?'' '' यह शहिदों का खून है।'' ''इससे क्या होगा?'' भगतसिंह ने शीशी को मजबूती से पकड़ते हुए दृढ़ता से कहा,''मुझे प्रेरणा मिलेगी।'' उसी प्रेरणा का परिणाम था कि समय आने पर वह हंसते हंसते मातृभूमि के लिए शहीद हो गए ।

शुक्रवार, ३० जुलाई २०१०

प्रसिद्ध लेखक

अंग्रेजों का जमाना था । अंग्रेज गवर्नर ने प्रसिद्ध लेखक प्रेमचंद को रायसाहब की उपाधि देने की घोषणा की। प्रेमचंद यह सुनकर परेशान हो गए । उनकी पत्नी ने कहा,'' इसमें परेशान होने की क्या बात है? जब उपाधि मिल रही है तो लेनी चाहिए ।''
प्रेमचंद ने कहा, ''अभी तक मैं जनता के लिए लिखता था । लेकिन फिर सरकार के पक्ष में लिखना होगा।''
उन्होंने गवर्नर को लिखा, ''मुझे जनता का रायसाहबी मंजूर है, सरकार का नहीं ।''

बृहस्पतिवार, ८ जुलाई २०१०

निश्चय

वल्लभ भाई पटेल का बचपन गांव में बीता था । वह जिस गांव में रहते थे, वहां कोई अंग्रेजी स्कूल नहीं था । इसलिए  अंग्रेजी पढ़ने वाले विद्यार्थी नित्य 10-11 किलोमीटर पैदल चल कर दूसरे गांव जाते थे । गर्मियों में सुबह 7 बजे स्कूल लगता था । इसलिए सूर्योदय से पहले ही घर से निकल कर खेतों से होते हुए जाना पड़ता था । एक खेत की मेड़ पर लगे पत्थर से अकसर किसी न किसी को ठोकरे लग जाती थी । एक दिन उसी खेती की मेड़ पार करने के बाद छात्रों की एक टोली ने देखा कि उनमें से एक साथी कम है । दरअसल वल्लभ भाई पटेल पीछे छूट गए थे । टोली मुड़ कर लौटी तो देखा कि वल्लभ भाई पटेल की खेत की मेड़ पर किसी चीज से जोर आजमाइश कर रहे हैं । साथियों ने आवाज दी, ''तुम पीछे क्यों रूक गए ?'' ''बस यह पत्थर हटा लूं ।'' वल्लभ भाई पटेल ने वह पत्थर हटाया और साथियों के साथ चलते हुए बोले, ''रास्ते के इस पत्थर से अकसर अड़चन पड़ती थी । अंधेरे में जाने कितनों के पैरों में चोटें आई होंगी । आते जाते चोट लगे और रूकावट पड़े, ऐसी चीज को हटा देने के सिवा कोई चारा नहीं । मैंने निश्चय किया था कि आज इसे हटा कर ही आगे बढूंगा । इसलिए रूक गया था ।''

बुधवार, २३ जून २०१०

हौंसला

रूस के एक वायुयान इंजीनियर की पहले महायुद्ध में एक टांग कट गई थी। दूसरे महायुद्ध के दौरान वह अस्पतालों में घायलों को देखने पहुंचे । उन्होंने मरीजों को हौंसले बनाए रखने के लिए कहा, ''नकली टांग का फायदा यह है कि चोट लगने पर महसूस नहीं होती ।''
यह सुनकर उन्होंने अपना बेंत एक आदमी को दे कर कहा कि इसे जोर से मेरी टांग पर मारो । उसने बहुत जोर से बेंत मारी, इंजीनियर ने हंसते हुए कहा,'' देखो, मुझे कोई असर नहीं हुआ।'' इस पर सब हंस पड़े । कमरे से बाहर निकलते ही उनके मुख पर पीड़ा के चिन्ह उभर आए । उनके साथी अफसर ने कारण पूछा तो उन्होंने कहा, ''उसने गलत टांग पर बेंत मार दिया था।''

बृहस्पतिवार, १७ जून २०१०

स्पष्टवादिता

बालगंगाधर तिलक बचपन से ही सत्यवादी एवं निर्भीक स्वभाव के थे । बचपन में उनकी कक्षा के कुछ विद्यार्थियों ने मूंगफली खाकर छिलके फर्श पर इधर-उधर फैक दिए । अध्यापक ने आ कर देखा कि फर्श पर छात्रों ने कूड़ा फैलाया हुआ है । उन्होंने छात्रों को डांटते हुए कहा, ''यह मूंगफली के छिलके किस-किस ने फेंके हैं ?'' सब लड़के चुप रहे । किसी ने भी अपनी भूल कुबूल नहीं की तो अध्यापक ने गुस्से में लड़कों से हाथ खुलवाए और दो-दो डंडे लगाए ।
जब बाल गंगाधर तिलक की बारी आई तो वह नम्रतापूर्वक स्पष्ट शब्दों में बोले, ''सर, मैंने मूंगफली नहीं खाई । अतः छिलके फेंकने का सवाल ही पैदा नहीं होता । मैं अपराधी नहीं हूं । इसलिए मैं मार नहीं खाउंगा ।'' फिर बताओ, ''मूंगफली किसने खाई है ?'' ''सर, मुझे चुगलखोरी की आदत पंसद नहीं है । इसलिए मैं किसी अन्य छात्रा का नाम भी नहीं लूंगा ।'' लेकिन मार भी नहीं खा सकता ।'' उनकी स्पष्टवादिता ने उन्हें स्कूल से निकलवा दिया । लेकिन उनके इसी गुण ने उन्हें आगे चल कर भारत माता का महान् सपूत बना दिया ।

शनिवार, १२ जून २०१०

अहिंसा का पुजारी

गांधी जी हमेशा अपने साथ लाठी रखा करते थे । एक बार जवाहर लाल नेहरू अपने पिता मोतीलाल नेहरू के साथ गांधी जी से मिलने गए । शाम हो चुकी थी । गांधी जी के कमरे में एक दीया जल रहा था । जैसे ही वे दोनों कमरे में घुसे, दीया बुझ गया । नेहरू दरवाजे के पास पड़ी लाठी से टकरा गए। नेहरू ने पूछा, ''बापू आप तो अंहिसा के पुजारी हैं । फिर आप यह लाठी अपने साथ क्यों रखते हैं?'' ''तुम्हारे जैसे उद्दंड लड़कों को सीधा करने के लिए |'' गांधी जी ने जवाब दिया ।

मंगलवार, ८ जून २०१०

लगन

टामस एलवा एडीसन एक महान् वैज्ञानिक थे । उन दिनों वह स्टोरेज बैटरी बनाने में लगे हुए थे । पच्चीस बार उन्होंने प्रयत्न किया, पर वह अपने उद्देश्य में सफल न हो सके ।
जब उन्होंने छब्बीसवीं बार प्रयत्न करना प्रारम्भ कर दिया तो एक आदमी ने उनसे पूछा, ''आप इसे बनाने की 25 बार कोशिश कर चुके हैं और असफल रहे हैं । इतना समय और परिश्रम आपने व्यर्थ में ही गंवाया । इससे आप को क्या मिला?''
एडीसन मुस्कराते हुए तपाक से बोले, ''25 ऐसे ‘तरीके’ जिनसे स्टोरेज बैटरी किसी हालत में नहीं बन सकती ।''